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आज और कल होली है. फागुन अपने अंतिम उच्छ्वास में है और चैत (चैत्र) देहरी पर आ खड़ा हुआ है. उत्तर भारत की धरती इन दिनों किसी गुप्त साधना के पूर्ण होने जैसी दीप्ति से भरी रहती है. गेहूं की बालियां हवा में झूमती हैं, सरसों का पीला रंग धीरे-धीरे स्मृति में बदल रहा है, आम की गाछी से गंध की महीन रेखाएं निकलती हैं और कोयल की पहली कूक समय की घोषणा करती है.
ऋतुएं केवल मौसम नहीं होतीं. वे भारतीय जीवन में अर्थ की तहों को खोलती हैं. फागुन और चैत का संधिकाल तो विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. यह वह क्षण है जब शीत की संकोचिता विदा लेती है और ग्रीष्म का तेज अभी दूर क्षितिज पर है. इस बीच जो ठहराव है, वही बसंत है. वही रंग का पहला संकेत है.































