कवर स्टोरी

भारत में अब सहमति का एक चार्टर क्यों है जरूरी
इंडिया टुडे-रेकिट का सर्वे दिखाता है कि परस्पर सम्मान की संस्कृति गढ़ने के लिए सहमति, गरिमा और आपसी समझ का एक साझा राष्ट्रीय ढांचा क्यों है आवश्यक

अभी चाहिए और अधिकार
महिलाओं में जागरूकता बढ़ी है लेकिन सार्वजनिक जगहों, कार्यस्थलों और डिजिटल स्पेस में गैर-सहमति वाले यौन व्यवहार को खत्म करने के लिए हमें सुरक्षा का बोझ महिलाओं के शरीर से हटाकर पितृसत्ता की संस्थाओं पर डालना होगा.

हर कदम पर डोलता खतरा
सार्वजनिक जगहों, कार्यस्थलों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा का दायरा लांघने में कसर नहीं छोड़ी जाती. ऊपर से उत्पीड़न, सत्ता की ताकत का डर, निजता हनन और जबरन थोपी चुप्पी का अटूट सिलसिला.

कब एडजस्ट न करें
महिला सशक्तीकरण के दशकों बाद भी अगर हम पुरुषों की हिंसा से सुरक्षित नहीं तो कहीं कुछ बड़ी खामी है. हमें रणनीतियां बदलनी होंगी और व्यक्तिपरक से सामुदायिक सोच की ओर बढ़ना होगा. इसमें पुरुषों की भी भागीदारी जरूरी.

आवाज जोर जबरदस्ती के खिलाफ
किस तरह परिवार, रिश्तेदारों का नेटवर्क और घर ऐसे स्थान बन जाते हैं जहां महिलाओं की इच्छाओं, असहमतियों और आजादी की निगरानी होती है, समझाइश होती है या उन्हें दबा दिया जाता है.

जानने और करने के बीच का फासला
जागरूकता ने सार्वजनिक विमर्श का नक्शा बदला. लेकिन सार्थक बदलाव के लिए सहमति की समानता और गरिमा में गहरी रची-बसी संस्कृति बनाने की दरकार.

ना कहने का अधिकार
महिलाएं अब यह बात अच्छी तरह समझने लगी हैं कि सहमति उनका अधिकार है. लेकिन सामाजिक अपेक्षाएं, भावनात्मक दबाव और 'लोग क्या कहेंगे’ का डर सबसे निर्णायक मौके पर आज भी उनके मुंह पर लगा देते हैं ताला.

सेक्स और सहमति
ना कहने पर महिलाओं को अपने संगी, परिवार और समाज से किस-किस तरह की चुनौतियों का करना पड़ता है सामना: इंडिया टुडे-रेकिट सर्वे ने इसी को बनाया आधार.

अयोध्या का असुंदर कांड
राम मंदिर में आई दान की रकम को मिलकर किस तरह से ठिकाने लगाया गया. मंदिरों के प्रबंधकों-प्रशासकों के पास क्या हो सकते हैं इन धर्मस्थलों की संपत्ति की रक्षा के उपाय.

खेती-किसानी का संकट
खाद, दालों और खाने के तेल के मामले में भारत किस हद तक आयात पर निर्भर है, ईरान युद्ध ने इस सच को उघाड़कर रख दिया. इनके आयात का खर्च 56 अरब डॉलर यानी कुल आयात बिल के छह फीसदी तक पहुंचने वाला है. अपनी थाली के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए आखिर हमें क्या करना होगा.

जकड़बंदी से महामुक्ति
नरेंद्र मोदी ने नौकरशाही और नियम-कायदों के मकड़जाल को जिस तरह से साफ किया, उसकी अंदरूनी कहानी.

साइबरकॉन्ड्रिया नए जमाने का मर्ज
एआइ सिम्प्टम चेकर और ऑनलाइन हेल्थ कंटेंट लोगों को अपने रोग का खुद निदान या पहचान करने की आदत डाल रहे, इससे बेचैनी भी बढ़ रही और इलाज में देरी भी, लिहाजा, बिना डॉक्टर की सलाह खुद दवा लेने का चलन भी बढ़ा.

बार-बार फेल
मेडिकल सीटों की खातिर मची दौड़ ने पेपर लीक, भ्रष्टाचार और सुधारों के प्रति बेरुखी का पूरा माहौल रचा. इसी के चलते नीट परीक्षा रद्द होने से 23 लाख छात्रों का भविष्य अधर में लटका आखिर क्या है समाधान.

कमर कसने का वक्त
तेल की कीमतों और आपूर्ति के झटकों से देश की अर्थव्यवस्था पर खतरा मंडराया, तो प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी ने की हर खर्च में किफायत की अपील. आने वाले दिन कैसे होंगे आखिर?

अब जोर समावेशी विकास पर
सियासी वर्चस्व स्थापित कर लेने के बाद अब अपने दूसरे कार्यकाल में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व शर्मा के सामने रोजगार सृजन और आर्थिक तरक्की के अलावा समावेशी शासन देने की कहीं बड़ी चुनौती.

बड़ी चुनौती कर्ज और बेरोजगारी की
कांग्रेस के नए मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन के लिए एक बड़ा काम यह है कि पार्टी के धड़ों और सहयोगियों के बीच तालमेल बैठाएं, साथ ही खाली खजाने की मुश्किल से निबटें.

अब दिखाना होगा असली नायकत्व
विजय ने अब जो रोल चुना है, उसमें सिर्फ स्टारडम से काम नहीं चलने वाला. बदलाव लाने संबंधी अपने वादे पूरे करने के लिए उन्हें अपनी टीम, व्यवस्था का पूरा एक तंत्र और राजकाज का नया मॉडल तैयार करना होगा.

बने अब उद्योग की जमीं
चुनावी अभियान की तल्ख और दो-फाड़ करने वाली बयानबाजी खत्म होने के बाद शुभेंदु अधिकारी अब राज्य में उद्योग लाने और रोजगार पैदा करने के साथ समावेशी शासन देने की चुनौतियों से निबटने में जुटे

उल्टे पांव चलता 'इंडिया’
संसद में डटकर खड़ा रहने वाला गठबंधन राज्यों में लगातार जमीन खोता जा रहा. इसके सिकुड़ते नक्शे ने रणनीति, नेतृत्व और पहचान को लेकर मतभेदों को उघाड़कर रख दिया.

यहां तो रंगासामी सदाबहार
पुदुच्चेरी में मतदाताओं के बीच एन. रंगासामी की लोकप्रियता के बूते पर NDA ने कांग्रेस की अगुआई वाली चुनौती को ध्वस्त किया.
