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डार्क मोड

निवाले स्वाद और सियासत के

किसी देश की संस्कृति को जानने के लिए उसका खाना खाना जरूरी है. पीएम मोदी वैसे सादा खाने के लिए ही जाने जाते हैं, खासकर खिचड़ी

द प्राइम मिनिस्टर्स टेबल: डेलिकेसीज़ ऐंड डिप्लोमेसीज़ फ्रॉम द एरा ऑफ़ नेहरू टु मोदी
अपडेटेड 29 सितंबर , 2026

तीन मूर्ति भवन में सुबह की मेज पर दो से ज्यादा कुर्सियां बमुश्किल लगती थीं क्योंकि बातचीत को सांस लेने की जगह मिलनी चाहिए. यह नियम किसी प्रोटोकॉल की किताब में नहीं, पं जवाहरलाल नेहरू के अपने स्वभाव में लिखा था.

डॉ. कर्ण सिंह के अनुसार, नेहरू उन्हीं लोगों को नाश्ते पर बुलाते जिनकी संगत उन्हें भाती. राजनयिक के. शंकर बाजपेई बताते हैं कि कभी नाश्ते की मेज पर यहूदी मेनुहिन बैठे मिलते तो कभी यूनेस्को के पहले महानिदेशक जूलियन हक्स्ले.

सोचिए, एक देश जो बंटवारे से उबर रहा था, वहां के पीएम की सुबह अलग-अलग बुद्धिजीवियों के बीच हो रही थी. आलोचक इसे विलासिता कहते हैं लेकिन यह देश के लिए जरूरी डिप्लोमेसी का रास्ता था जो डाइनिंग से होकर गुजर रहा था.

पुरबी श्रीधर और संहिता सिंह की किताब द प्राइम मिनिस्टर्स टेबल: डेलिकेसीज़ ऐंड डिप्लोमेसीज़ फ्रॉम द एरा ऑफ़ नेहरू टु मोदी इसी तरह के दृश्यों से बुनी गई है. किताब थाली से शुरू होकर धीरे-धीरे इतिहास और व्यक्तित्व में उतरती जाती है. किस्सों, चित्रों से भरी. प्रधानमंत्रियों की पसंदीदा खाने की रेसिपी खोलती. शोधपरक.

जैसे, नेहरू उम्र बढ़ने के साथ शाकाहारी खाना पसंद करने लगे थे. भारत के पहले पद्मश्री शेफ इम्तियाज कुरैशी बताते हैं, एक बार उन्होंने लखनऊ में नेहरू के लिए लौकी फिश मुसल्लम और कटहल मुर्ग मुसल्लम बनाया. इसकी वजह थी कि इम्तियाज वेज बनाते नहीं थे और नेहरू को नॉन वेज खाना नहीं था. इसलिए इम्तियाज ने चिकन लेग की जगह काले बैंगन इस्तेमाल किए. नेहरू चौंके. उन्होंने इम्तियाज से कहा, आज तुमने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए.

इसी तरह इंदिरा गांधी ज्यादातर परिवार के साथ खाना खातीं. मोहसिना किदवई बताती हैं कि इंदिरा घर पर एकदम घरेलू थीं. एक बार यूपी चुनाव के दौरान गाड़ी रेलवे क्रॉसिंग पर फंस गई थी. भीड़ ज्यादा थी लेकिन इंदिरा गांधी को कुल्हड़ की चाय और लड्डू चाहिए थे. उन्हें लोकल खाना पसंद था. उनकी खाने की मेज कभी बर्नाड शॉ की तरफ मुड़ जाती तो कभी विश्व राजनीति और छोटे आमों के रस में डूब जाती. उन्हें फालसे का शरबत पसंद था.

इन सबके विपरीत लाल बहादुर शास्त्री और चरण सिंह की मेज लगभग देश के अधिकांश लोगों जैसी थी. दाल, रोटी, कद्दू की सब्जी, साबूदाना, लौकी आदि से सजी. ऐसे ही इंद्र कुमार गुजराल का घर ब्रंच के लिए जाना जाता.

मनमोहन सिंह, जो तब पाकिस्तान के गाह में जन्मे, एक ऐसी चिकन रेसिपी का जिक्र करते हैं जो उनके चाचा के साथ ही खो गई. उन्हें मूंगबड़ी वाले चावल, प्याज टमाटर की सब्जी, सूजी हलवा और चीट मील के तौर पर चना भटूरा और पीत्जा पसंद था.

प्रथमदृष्ट्या यह किताब पुरानी यादों का पुलिंदा-सा लगती है लेकिन गौर से देखें तो यह थाली के कूटनीति की गुप्त भाषा बनने की ओर इशारा करती है. साल 2015 के यूएई भोज में शेफ संजीव कपूर ने एक भव्य भारतीय-अरबी दस्तरख्वान सजाया था.

उसके बीचोबीच एक शाही गुजराती थाली रखी थी पर पीएम मोदी चुपचाप वहीं का सादा शाकाहारी खाना चखते रहे. संजीव के अनुसार पीएम ने कहा, ''किसी देश की संस्कृति को जानने के लिए उसका खाना खाना जरूरी है.'' पीएम मोदी वैसे सादा खाने के लिए ही जाने जाते हैं, खासकर खिचड़ी.

यह किताब पठनीय और दर्शनीय है लेकिन इसके अधिकांश अध्याय दूसरों के बयानों और स्मृतियों पर टिके हैं, जिनमें से कई अब जीवित नहीं. इसलिए इसमें नॉस्टैल्जिया की मिठास ज्यादा है.

पत्रकार पुरबी और संहिता के श्रम को जीवनी की तरह भी पढ़ा जा सकता है जिसमें खाने से अधिक बहुत कुछ है. प्रधानमंत्रियों की थाली में वैसे भी लोगों की रुचि बढ़ने लगी है. बढ़े भी क्यों न! किसी देश की भूख, विस्थापन, विकास और सत्ता की पूरी कहानी उसके प्रधानमंत्रियों की थाली से भी पढ़ी जा सकती है.

द प्राइम मिनिस्टर्स टेबल:
डेलिकेसीज़ ऐंड डिप्लोमेसीज़ फ्रॉम द एरा ऑफ़ नेहरू टु मोदी
प्रकाशकः एमेरिलिस
कीमतः 1,499 रुपए

 

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