हर पुस्तक की अपनी एक जन्मकथा होती है लेकिन बहुत कम किताबों का जन्म बेटे की उस जिद से होता है जिसमें वह अपने पिता से कहता है कि अब केवल व्याख्यान देना काफी नहीं, अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाइए.
डॉ. रतन लाल की संकलित-संपादित पुस्तक आंबेडकर और संसदीय लोकतंत्र की शुरुआत कुछ ऐसी ही आत्मीय घटना से होती है. मार्च 2020 में जब पूरी दुनिया अचानक ठहर गई थी, दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहासकार डॉ. रतन लाल के बेटे ईशान ने उनके हाथ में मोबाइल थमाया और मानो कहा, अब कैमरे से बात कीजिए. इसी छोटे-से आग्रह से आंबेडकरनामा नामक यूट्यूब चैनल की शुरुआत हुई. देखते ही देखते एक सप्ताह के भीतर हजारों लोग उससे जुड़ गए और अंततः उसी संवाद की निरंतरता इस पुस्तक के रूप में सभी के सामने आई.
यह प्रसंग महज एक भूमिका नहीं, इस पुस्तक की मूल प्रेरणा भी है. वर्षों के अध्यापन और सार्वजनिक संवाद के अनुभव से डॉ. रतन लाल ने एक विचित्र विडंबना देखी कि डॉ. भीमराव आंबेडकर का नाम लगभग हर कोई लेता है लेकिन उन्हें पढ़ने वाले बहुत कम हैं.
सोशल मीडिया पर स्वयंभू आंबेडकरवादी दूसरों को यह प्रमाणपत्र बांटते दिखाई देते हैं कि कौन 'सच्चा आंबेडकरवादी' है और कौन नहीं, जबकि आंबेडकर के भाषणों, लेखों, ज्ञापनों और गवाहियों का विशाल संसार लगभग चालीस खंडों में फैला और प्रायः अनछुआ पड़ा है. इसी विडंबना ने रतन लाल को इस काम के लिए प्रेरित किया.
उन्होंने आंबेडकर की समस्त रचनाओं और वक्तव्यों में से उन अंशों का चयन किया, जिनमें संसदीय लोकतंत्र पर उनके विचार व्यक्त हुए हैं. फिर उन्हें 1919 से 1956 तक कालक्रमानुसार इस प्रकार संयोजित किया कि एक सामान्य पाठक भी नारे और उद्धरणों से आगे बढ़कर समझ सके कि आंबेडकर का लोकतांत्रिक चिंतन समय के साथ किस प्रकार विकसित हुआ.
यह एक सुविचारित, व्यवस्थित और जीवंत दस्तावेज-संकलन है जिसकी शुरुआत 1919 में साउथबरो समिति के समक्ष युवा आंबेडकर की उस ऐतिहासिक गवाही से होती है, जिसमें वे शासन प्रणाली को और अधिक लोकतांत्रिक बनाने की जरूरत पर जोर देते दिखाई देते हैं. समापन 1956 में उनके व्याख्यान भारत में लोकतंत्र की संभावनाएं से होता है, जो उन्होंने 20 मई 1956 को वॉयस ऑफ अमेरिका के लिए दिया था.
इन दोनों पड़ावों के बीच पाठक आंबेडकर के राजनीतिक और वैचारिक विकास की पूरी यात्रा का साक्षी बनता है. साइमन कमीशन के दौर की बहसें, जुलाई 1942 में नागपुर में दिए तीन प्रमुख भाषण, ग्राम पंचायतों के निर्माण में चिंताएं, अनुसूचित जातियों की शिकायतें, बौद्ध धर्म और 1949 में संविधान सभा में दिया गया वह ऐतिहासिक चेतावनी भरा भाषण जिसमें उन्होंने लोकतंत्र, संविधान, संवैधानिक संस्थाओं पर आने वाले संकट की ओर आशंकाएं व्यक्त की थीं, ये सभी इस पुस्तक में क्रमबद्ध रूप से उपस्थित हैं.
इसी तरह 22 दिसंबर 1952 के एक भाषण में उन्होंने लोकतंत्र के सफल संचालन की पूर्व शर्तों पर बात की. उन्होंने पूछा कि लोकतंत्र से हमारा क्या आशय है? फिर वाल्टर बेगहॉट की संविधान की पुस्तक का जिक्र किया जिसमें लोकतंत्र को 'विमर्शों द्वारा चुनी हुई सरकार' बताया गया है. इसके बाद आंबेडकर अब्राहम लिंकन का उदाहरण देते हैं और अपनी परिभाषा सामने रखते हैं, ''सरकार का वह स्वरूप और पद्धति जिससे लोगों के आर्थिक और सामाजिक जीवन में बिना रक्तपात किए क्रांतिकारी परिवर्तन लाएजा सकते हैं.''
बाबासाहेब का मानना था, "सरकार केवल लोगों के पांच वर्ष के दीर्घकालीन वीटो के अधीन न हो बल्कि एक तात्कालिक वीटो भी होना चाहिए. संसद में तत्पर रूप से ऐसे लोग होने चाहिए जो सरकार को वहीं के वहीं चुनौती दे सकें."
इस पुस्तक के आरंभ और अंत में दिए गए दो महत्त्वपूर्ण आलेख इसे केवल दस्तावेजी संग्रह बनने से बचाते हैं. आनंद तेलतुंबड़े की प्रस्तावना इस तथ्य को रेखांकित करती है कि आंबेडकर उन विरले व्यक्तित्वों में थे जिन्होंने एक साथ गंभीर चिंतक और जननेता दोनों भूमिकाएं निभाईं. उनके जनवादी विचार जड़भूत सिद्धांत नहीं बने बल्कि प्रतिबद्धता और राजनीतिक तजुर्बे की रोशनी में विकासशील रहे.
डॉ. रतन लाल की भूमिका पुस्तक को समकालीन संदर्भों से जोड़ती है. 2024 के आम चुनावों की पृष्ठभूमि में लिखी गई यह भूमिका उस समय की राजनीतिक बहसों का उल्लेख करती है, जब संविधान में कथित संशोधन के लिए 'चार सौ पार' जैसे नारे दिए जा रहे थे लेकिन चुनाव परिणामों ने ऐसी परिस्थिति पैदा की कि अंततः उसी संविधान के प्रति सार्वजनिक निष्ठा व्यक्त किए बिना सत्ता का संचालन संभव नहीं रहा.
लेखक के अनुसार, यही वह बिंदु है जहां संसदीय लोकतंत्र के विषय में आंबेडकर के विचारों को पढ़ना प्रासंगिक हो जाता है. यह जानना जरूरी है कि संविधान या संवैधानिक संस्थाओं से उनकी क्या अपेक्षाएं और उनको लेकर क्या शंकाएं-चिंताएं थीं. शिक्षा व्यवस्था को लेकर हुए हाल के आंदोलन में हमने जय भीम के नारों की गूंज सुनी. ऐसे में उस भाषण का जिक्र करना जरूरी है जहां आंबेडकर जाति और शिक्षा के सवाल को उठाते हैं और कहते हैं कि शिक्षा जाति को समाप्त कर भी सकती है और नहीं भी.
पुस्तक की संरचना भी उल्लेखनीय है. प्रत्येक अध्याय बाबासाहेब के भाषण या व्याख्यान से ली गई पंक्ति और तिथि से शुरू होता है. फिर लेखक उसका संक्षिप्त विवरण देते हैं ताकि पाठक उसका परिप्रेक्ष्य समझ सके. परिणामस्वरूप पाठक किसी एक स्थिर लोकतांत्रिक सिद्धांत को नहीं पढ़ता बल्कि एक ऐसे विचारक की बौद्धिक यात्रा का साक्षी बनता है जो समय-समय पर तर्क देता है, अपने विचारों को विस्तार देता है और कभी-कभी स्वयं से असहमति भी व्यक्त करता दिखाई देता है.
पुस्तक में दिए गए विस्तृत संदर्भ और टिप्पणियां मूल स्रोतों तक पहुंचने का रास्ता देती हैं और आंबेडकर के लोकतांत्रिक चिंतन का एक सुगम और व्यवस्थित प्रवेश द्वार बन जाती हैं.
पढ़ते हुए बहुतेरी बातों से सहमति-असहमति होती है लेकिन बहुतेरे ऐसे सवाल हैं जो साथ रह जाते हैं जैसे, लोकतंत्र सरकार का स्वरूपभर है या सामुदायिक जीवन की पद्धति? क्या सरकारों में लोकतंत्र की जड़ें वाकई होती हैं? क्या हम यह मान बैठे हैं कि जहां गणतंत्र होगा, वहां लोकतंत्र होगा ही? एक राष्ट्र के भीतर असमानता और असमरसता के लिए कौन जिम्मेदार है?
राजपाल ऐंड संस से छपी यह पुस्तक अपने आवरण पर संसद भवन की पृष्ठभूमि में डॉ. आंबेडकर के चित्र के माध्यम से ही अपना उद्देश्य स्पष्ट कर देती है कि लक्ष्य केवल एक और पुस्तक प्रकाशित करना नहीं बल्कि डॉ भीमराव आंबेडकर के अपने शब्दों और तर्कों को पुनः सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में स्थापित करना है.
पुस्तक : आंबेडकर और संसदीय लोकतंत्र
लेखक : डॉ. भीमराव आंबेडकर
संकलन : रतन लाल
प्रकाशन : राजपाल एण्ड संस
कीमत : 799 रुपए

