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बीती काशी की तलाश में

‘काशीस्थ’ अर्थात काशी में रहने वाला या काशी में लीन. दिलचस्प यह है कि जो काशी से बाहर है और काशी होकर आया है वह भी काशीस्थ हो जाता है. हर व्यक्ति की अपनी काशी है.

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काशी पर एकाग्र निबंघ
अपडेटेड 2 अगस्त , 2026

जिस समय यह लेख लिख रहा हूं, काशी में नागरीप्रचारिणी सभा का शताब्दी वार्षिकोत्सव चल रहा है. 1893 में हिंदी भाषा साहित्य और देवनागरी लिपि की उन्नति और प्रचार-प्रसार के लिए नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना का विचार क्वींस कॉलेज बनारस के तीन छात्रों, बाबू श्याम सुंदर दास, रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह के भीतर पनपा. सभा के प्रथम अध्यक्ष भारतेंदु हरिश्चंद्र के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास रहे. उतार-चढ़ावों के बीच 133 बरसों से संस्था अपनी भूमिका निभा रही है.

प्रकाशन भी इसका एक हिस्सा है. करीब 400 ग्रंथों का प्रकाशन हो चुका है जिसमें से एक है, काशीस्थ.

‘काशीस्थ’ अर्थात काशी में रहने वाला या काशी में लीन. दिलचस्प यह है कि जो काशी से बाहर है और काशी होकर आया है वह भी काशीस्थ हो जाता है. हर व्यक्ति की अपनी काशी है. फाह्यान से लेकर फिलिप लुत्गेनडॉर्फ तक और भारतेंदु युग से लेकर वर्तमान तक. 

यह पुस्तक काशीस्थ मूर्धन्यों के उन अनुभवों का संकलन है जिनकी बौद्धिकता काशी से संसार की अंजुलि तक पहुंची.

नागरीप्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री और काशीस्थ  के संपादक व्योमेश शुक्ल ऐसी अज्ञात और दुर्लभ सामग्री यहां देते हैं जो लेखक की रचनावली में भी अनुपलब्ध है. काशी में विद्याध्ययन की परंपरा पर चिन्मय विश्वविद्यालय काशी  नामक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का निबंध प्रथमतः सामने आता है जिसमें दारा शुकोह के एक पत्र का पठनीय जिक्र है. हालांकि इस लेख का अधिकांश आधार उक्ति व्यक्ति प्रकरण  है, इसलिए आचार्य द्विवेदी यहां कम दिखते हैं, दामोदर भट्ट और अन्य संदर्भ अधिक.

यूं बनारस है भी संदर्भों से भरा. यहां हुए अनेक राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद बनारस अपनी परंपराओं पर टिका रहा. इसके बहुतेरे संदर्भ हमें युवान च्वांग, अल-बरूनी के यहां मिलते हैं. काशी की प्राचीन शिक्षा पद्धति निबंध में डॉक्टर मोतीचंद, शतपथ ब्राह्मण से लेकर जोनाथन डंकन तक के संदर्भों में इस सवाल का जवाब खोजते हैं कि जिस काशी की शिक्षा पद्धति को एक समय संदेह की दृष्टि से देखा जाता था, आखिर वह तत्वज्ञान का प्रसिद्ध केंद्र कैसे बन गई?

इसी तरह काशी का स्वभाव, काशी के लोगों से है या लोगों का स्वभाव, काशी से है, यह जानने के लिए गोपीनाथ कविराज, डॉ. राजबली पांडेय और विद्यानिवास मिश्र के निबंध पुस्तक की तात्त्विक दृष्टि से पुस्तक की वस्तुशक्ति हैं.

ऐसे ही काशी के विलक्षण व्यक्तित्वों जैसे भारतेंदु, आचार्य रामचंद्र शुक्ल और जयशंकर प्रसाद पर अन्य विलक्षण व्यक्तित्वों राय कृष्णदास, आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र और कृष्णदेव प्रसाद गौड़ के निबंध पठनीय तो हैं पर भक्तिभाव में अत्यधिक डूबे हैं.

पुस्तक पढ़ते हुए पता चलता है कि डूबे तो वे स्थान भी हैं जो कभी काशी की पहचान थे और जिसका जिक्र शिव प्रसाद मिश्र 'रुद्र' ने अष्ट कूप नौ बावली  में किया है. वे बताते हैं कि गोदौलिया नामक स्थान पर कभी गोदावरी तीर्थ था जिसकी सीढ़ियां मारवाड़ी अस्पताल के नीचे बताई जाती हैं.

इसी बदलती रही काशी को पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' कुरूप कहते हैं. उन्हें रांड़, सांड़, सीढ़ी, संन्यासी अब नजर नहीं आते लेकिन संगीत के मामले में वे आश्वस्त दिखते हैं क्योंकि बनरसिये हैं तो कनरसिये.

यह पुस्तक विभिन्न रसों के लिए पढ़ी जानी चाहिए. इतिहास और भूगोल पर साहित्यिक दृष्टि के लिए पढ़ी जानी चाहिए. इसे बनारसी आनंद के लिए, प्रेम के लिए, अक्खड़पन महसूस करने के लिए और आमोद-प्रमोद के लिए भी पढ़ा जा सकता है और बामनों के अहंकार और तेग अली की ग़ज़लों की अमरदपरस्ती और भजन, कजरी, चैती, बिरहा के लिए भी.

इसका महत्व इसलिए नहीं है कि यह अज्ञात लेखों को सामने ला सुलभ बनाती है, दरअसल इसे पढ़ते हुए काशी के बदलते स्वरूप की पहचान में मदद मिलती है. काशी के प्राचीन स्वरूप का बोध होता है, हालांकि यह अलग बात है कि काशी का स्वरूप ही आत्मबोध का है.

काशीस्थ
काशी पर एकाग्र निबंघ
संपादकः व्योमेश शुक्ल नागरीप्रचारिणी सभा
मूल्य: 499 रुपए

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