द वॉएस ऑफ हिंद रजब पर अब तक दुनिया भर में काफी बात हो चुकी है. और देश में भी. सूचना और प्रसारण मंत्रालय, केंद्रीय फिल्म सर्टिफिकेशन बोर्ड और तमाम शुभचिंतक फिल्मकारों, नेताओं के बीच लंबी खींचतान के बाद चुनिंदा शहरों के कुछेक सिनेमाघरों में ही सही पर आखिरकार यह 19 जून को हिंदुस्तान में रिलीज हुई. यह डॉक्युड्रामा दरअसल एक किस्म की गहरी रस्साकशी है: सियासत, नैतिकता और यथार्थ की जमीन पर. और किसी भी एक तरफ खड़े होने के लिए आप में दम-गुर्दा चाहिए.
पांच-छह साल की एक बच्ची है हिंद रजब. 29 जनवरी, 2024 का दिन. 7 अक्तूबर, 2023 को इज्राएल पर हमास के हमले के बाद फलस्तीन के गज़ा में जारी इज्राएली डिफेंस फोर्सेज की कार्रवाई में उसकी कार छलनी हो चुकी है. अंकल-आंटी और 15 साल के लयान हमादी समेत उसके चार कजिन भी उसमें मर चुके हैं. सांस छोड़ने से थोड़ी देर पहले लयान ने ही मोबाइल से मदद की गुहार लगाई थी.
रामल्ला में फलस्तीनी रेड क्रेसेंट सोसाइटी के दफ्तर में बैठे प्रशिक्षित इमरजेंसी डिस्पैचर्स राना, उमर, मेहदी, नसरीन के कॉलबैक पर अब हिंद घबराई हुई आवाज में सारा मंजर बताते हुए उसे जल्दी बचा लेने को कहती है. उस तक पहुंचना मुश्किल नहीं लेकिन इसके लिए उस इलाके पर काबिज इज्राएली सेना का ग्रीन सिगनल चाहिए.
सारा किस्सा अब इसी कश्मकश में है. मेहदी इसके लिए फौज और रेडक्रॉस वगैरह से कोऑर्डिनेट करके मौके तक एंबुलेंस जाने देने की गुजारिश कर रहा है. उमर हिंद की डूबती आवाज और अपनी बेबसी को देखते हुए बेकाबू हो जा रहा है. फफककर रोने और आंसू पोछने के बाद राना बातों में उलझाती है: तुम किसके साथ थीं?
तुम्हारे स्कूल का नाम क्या है? तुम्हें क्या पसंद है? अच्छा प्रार्थना करते हैं...कभी ऊं, कभी हूं बोलती हिंद के एक-एक शब्द दर्शक के कलेजे को बींधते जाते हैं. आखिर में वह कहती है...अंधेरा हो रहा है...मैं मर रही हूं. तभी ग्रीन सिगनल मिलता है, एंबुलेंस उसकी कार के नजदीक पहुंचती है और उड़ा दी जाती है.
हिंद से संवाद में रत सारे किरदार बेबसी और लाचारी की परिभाषा करते नजर आते हैं. बचाई जा सकने वाली जान से बातें करते रहना और उसे मर जाते देखना. हिंद का हादसा बड़े पैमाने पर रिपोर्ट हुआ. डायरेक्टर, ट्यूनीशिया की कौसर बेन हानिया ने इसमें हिंद की असल रेकॉर्डिंग को इस्तेमाल करके नैरेटिव बुना है.
कुल डेढ़ घंटे की, एक आवाज के इर्दगिर्द बुनी इस फिल्म से पहले और इंटरवल में भी विज्ञापन करते सुपरस्टार्स को आप धमधमाक धम धम धमाक करते देखते हैं लेकिन फिल्म खत्म होने पर पांच मिनट तक किसी की उठने की हिम्मत नहीं होती. चौतरफा शोर में भी हिंद की आवाजें हाल के बाहर तक हमारा साथ नहीं छोड़तीं.
हिंद की इस कथा के संदर्भ से जस्टिस एस. मुरलीधर की हाल में रिलीज वह रिपोर्ट भी जुड़ती है जो उन्होंने कब्जे वाले फलस्तीन में संयुक्त राष्ट्र के एक जांच आयोग के अध्यक्ष की हैसियत से जारी की. रिपोर्ट कहती है कि इज्राएली सेना ने जानबूझकर बच्चों को निशाने पर ले-लेकर मारा. सच आखिर किस मोड़ पर आकर छोड़ता है कल्पना के लिए जमीन.

