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तीजन बाई : पंडवानी से दुनिया जीतने वाली विद्रोही आवाज

तीजन बाई के पहले पंडवानी में पुरुषों का वर्चस्व था लेकिन उनके आने के बाद वे इस कला का दूसरा नाम बन गईं

Teejan Bai
2019 में तीजन बाई को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था
अपडेटेड 6 जुलाई , 2026

प्रसिद्ध कलाकार और छत्तीसगढ़ की जानी-मानी सांस्कृतिक पहचान, तीजन बाई का 5 जुलाई को निधन हो गया. वे अपने 70वें जन्मदिन से एक महीना दूर थीं और पिछले कुछ समय से बीमार चल रही थीं.

साल 2019 में पद्म विभूषण, 2003 में पद्म भूषण और 1988 में मात्र 32 वर्ष की आयु में पद्म श्री से सम्मानित तीजन बाई ने पंडवानी गायिका के रूप में अपनी एक खास पहचान बनाई. 

पंडवानी का शाब्दिक अर्थ है 'पांडवों की कहानी' और यह महाकाव्य महाभारत के अंशों का एक नाटकीय प्रस्तुतीकरण है. भिलाई के पास गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई ने सबसे पहले अपने नाना बृजलाल को महाभारत का पाठ करते हुए सुना था और इसे याद करना शुरू कर दिया था.

हालांकि, एक कलाकार के रूप में उनके संघर्षों की कहानियां आज भी तमाम विधाओं के दूसरे कलाकारों की पीढ़ियों को प्रेरित करती हैं. पारधी समुदाय (जो अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध है और अब एक विमुक्त आपराधिक जनजाति है) में जन्मी तीजन, पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं. 

उन्होंने कला के एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश किया जिस पर तब तक पूरी तरह से पुरुषों का वर्चस्व था. तीजन बाई को रूढ़िभंजक यानी परंपरा तोड़ने वाली स्त्री के तौर पर देखा गया जिसकी वजह से उन्हें उनके समुदाय से निष्कासित कर दिया गया. 

पंडवानी में भी तीजन बाई 'कापालिक' शैली में प्रस्तुती देती थीं यानी वे खड़े होकर कला का प्रदर्शन करतीं जबकि उनसे पहले की सभी महिलाएं 'वेदमती' शैली में प्रदर्शन करती थीं जिसमें बैठकर कहानी सुनाई जाती है. तीजन केवल एक इकतारे के साथ आती थीं, इधर-उधर घूमती और तेज आवाज में गातीं.

रंगमंच के प्रसिद्ध व्यक्तित्व हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा को सामने लाने में अहम भूमिका निभाई. कहा जाता है कि तनवीर ने उन्हें प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने परफॉर्म कराया, जिससे उन्हें देश के भीतर और बाद में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली. बाद में उन्होंने श्याम बेनेगल के 'भारत एक खोज' के लिए भी प्रस्तुतियां दीं जो जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक 'द डिस्कवरी ऑफ इंडिया' का एक टेलीविजन रूपांतरण था.

छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग के पूर्व निदेशक राहुल सिंह कहते हैं, "तीजन बाई ने एक पंडवानी कलाकार के रूप में अपना नाम कमाया और पंडवानी पर इस लगाव और जोर ने उन्हें अन्य छत्तीसगढ़ी रूपों जैसे 'भरथरी' और 'सोहर' में प्रदर्शन करने से रोक दिया, जिनमें वे बेहद माहिर थीं."

सिंह तीजन बाई की एक और विशेषता का जिक्र करते हैं जिसे बेहद कम लोग जानते हैं. वे बताते हैं कि तीजन, प्रदर्शन के दौरान सुधार करने के लिए दर्शकों से लगातार फीडबैक (प्रतिक्रिया) लेती रहती थीं. वे थिएटर में 'फोर्थ वॉल' की अवधारणा का ज़िक्र करते हैं, जिसे कई कुशल कलाकार प्रदर्शन के दौरान खुद को दर्शकों की नजरों से ओझल रखने के लिए इस्तेमाल करते हैं. 

सिंह कहते हैं, "तीजन बाई थिएटर में इस फोर्थ वॉल को थोपे जाने के खिलाफ थीं. दूसरे शब्दों में, वे अपने और दर्शकों के बीच कोई दीवार नहीं चाहती थीं. एक बार जब लाइटें बंद कर दी गईं तो उन्होंने फिर से लाइट जलाने की मांग की ताकि वे दर्शकों के चेहरों के हाव-भाव देख सकें. उनका प्रदर्शन इसी प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया के आधार पर बेहतर और संवरता जाता था."

हर दौर के साथ निखरती और बुलंद होती रही छत्तीसगढ़ की यह आवाज अब खामोश हो गई है.

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