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रामलीला की रंगभाषा का नया आयाम

प्रयागराज में रंगकर्मी एवं लोककला शोधकर्ता अतुल यदुवंशी लोकनाट्य परंपरा, साहित्यिक विरासत, मौलिक संगीत और आधुनिक मंच-तकनीक के समन्वय से रामलीला को नई पीढ़ी के लिए बना रहे आकर्षक

प्रयागराज में चल रही 'गाथा राम की...' से एक दृश्य
अपडेटेड 19 अक्टूबर , 2026

ज्योतिष जोशी

रामलीला के सामने एक अनूठी चुनौती होती है- दर्शकों को यह विश्वास दिलाना कि मंच पर असंभव भी संभव हो रहा है. खाली मंच पर वन का साकार होना, नदी का बहना, आकाश में दिव्य विमान का उड़ना और हनुमान का विराट रूप धारण कर समुद्र लांघ जाना- इन दृश्यों को पीढ़ियों से कलाकार अपनी कल्पनाशीलता, संगीत, संवाद, अभिनय और दर्शकों की आस्था के सहारे जीवंत करते आए हैं.

प्रयागराज में प्रस्तुत गाथा राम की... इसी परंपरा को समकालीन रंगमंच की संभावनाओं से जोड़ने का एक महत्त्वाकांक्षी प्रयास है. श्री कटरा रामलीला कमेटी, प्रयागराज द्वारा आयोजित इस 12 दिवसीय प्रस्तुति का निर्देशन रंगकर्मी एवं लोककला शोधकर्ता अतुल यदुवंशी ने किया है. इसका उद्देश्य केवल रामलीला को भव्य बनाना नहीं, बल्कि उसकी पारंपरिक आत्मा को सुरक्षित रखते हुए उसे आधुनिक दर्शकों के लिए अधिक प्रभावशाली और आकर्षक बनाना है.

मंच परिकल्पना का नया विस्तार

गाथा राम की... की प्रमुख विशेषता इसका तीन-स्तरीय मंच संयोजन और विशाल मल्टीमीडिया स्क्रीन हैं. मंच के विभिन्न हिस्सों तथा उनसे जुड़ी दृश्यावली के माध्यम से कथा की आवश्यकतानुसार परिवेश और वातावरण बदलते रहते हैं. वन, नदी के तट, राजदरबार, महल और युद्धभूमि जैसे दृश्य कथा के साथ विकसित होते हैं.

प्रत्येक प्रसंग के अनुरूप दृश्य-परिकल्पना, प्रकाश, ध्वनि और कलाकारों की समन्वित गतिविधियां स्थान तथा भावनात्मक वातावरण को सजीव बनाती हैं. इससे अंतरंग संवादों से लेकर विराट युद्ध-दृश्यों तक को व्यापक रंगमंचीय विस्तार मिलता है.

यहां तकनीक केवल सजावटी पृष्ठभूमि नहीं बल्कि कथा कहने की एक महत्त्वपूर्ण भाषा बनती है. वह दृश्य के भूगोल, विस्तार, गति और नाटकीय तनाव को स्थापित करने में सहायक होती है.

उदाहरण के लिए, केवट द्वारा श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को गंगा पार कराने का प्रसंग विनम्रता, भक्ति और ईश्वर तथा सामान्य मनुष्य के संबंध को उजागर करता है. बहती नदी की दृश्यावली इस प्रसंग के वातावरण को सजीव बना सकती है, लेकिन उसका वास्तविक भाव कलाकारों के अभिनय से ही उभरता है.

इसी प्रकार, रावण द्वारा सीता-हरण और पुष्पक विमान से प्रस्थान, युद्ध के दृश्यों में लक्ष्य की ओर बढ़ते डिजिटल बाण तथा हनुमान का विराट रूप धारण कर समुद्र लांघना- ये सभी प्रसंग मंचीय कल्पनाशीलता और आधुनिक तकनीक के समन्वय की अलग-अलग चुनौतियां प्रस्तुत करते हैं.

इन दृश्यों का मूल संदेश स्पष्ट है: डिजिटल दृश्य मंच की संभावनाओं को विस्तार दे सकते हैं, लेकिन उनकी प्रभावशीलता अंततः कलाकार, दृश्य और कथा के आपसी तालमेल पर निर्भर करती है.

रामचरितमानस और नई पीढ़ी के बीच संवाद

इसकी पटकथा स्वयं अतुल यदुवंशी ने लिखी है. समकालीन संवादों और पारंपरिक पदों के बीच संतुलन स्थापित करते हुए इसमें गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस की चौपाइयों और दोहों को समाहित किया गया है. इससे उत्तर भारतीय सांस्कृतिक जीवन में गहराई से रची-बसी काव्यात्मक और भक्तिपरक परंपरा की निरंतरता बनी रहती है.

संगीत पक्ष को विस्तार देते हुए डॉ. राजेन्द्र शुक्ल और डॉ. वीरेन्द्र कुसुमाकर ने मौलिक गीतों की रचना की है. ये गीत संवाद, काव्य, संगीत और नाटकीय गतिविधियों के बीच एक अतिरिक्त अभिव्यक्तिपरक परत जोड़ते हैं.

रामलीला केवल कलाकारों द्वारा प्रस्तुत कथा नहीं है. इसमें भाषा, संगीत, भाव-भंगिमा, वेशभूषा, चरित्र-चित्रण और दर्शकों की सांस्कृतिक स्मृतियां मिलकर अर्थ रचती हैं. कई बार किसी प्रसंग का प्रभाव केवल उसके कथ्य में नहीं, बल्कि उसकी प्रस्तुति में निहित होता है.

इस प्रस्तुति की विशिष्ट विशेषताओं में भगवान शिव की कथात्मक वाणी भी शामिल है, जिसे स्वयं अतुल यदुवंशी ने अपने स्वर में प्रस्तुत किया है. संवादों के बीच आने वाली यह वाणी केवल घटनाओं को जोड़ने का कार्य नहीं करती बल्कि कथा को निरंतरता और आध्यात्मिक संदर्भ भी प्रदान करती है.

यदुवंशी अपनी लेखन-दृष्टि स्पष्ट करते हुए कहते हैं, “सामग्री को इतना विस्तार देने का ध्यान रखा गया है कि आवश्यक प्रसंग समाहित हो जाएं, लेकिन प्रस्तुति इतनी संक्षिप्त भी रहे कि दर्शकों की रुचि बनी रहे और नई पीढ़ी के लिए वह रोचक हो.”

लोकनाट्य का अनुभव और निर्देशक की दृष्टि

रामलीला के प्रति यदुवंशी की दृष्टि को समझने के लिए भारतीय लोकनाट्य, विशेषकर नौटंकी, के साथ उनके लंबे जुड़ाव को जानना आवश्यक है.

उत्तर भारत की प्रमुख लोकनाट्य परंपराओं में शामिल नौटंकी संगीत, प्रभावशाली संवाद, शैलीबद्ध अभिनय और नाटकीय कथावाचन का विशिष्ट संगम है. दर्शकों के साथ इसका सीधा संबंध यह समझने में मदद करता है कि पारंपरिक रंगमंच बदलते समय में भी जीवंत, सहज और प्रासंगिक कैसे बना रह सकता है.

नौटंकी के संरक्षण और विकास में उल्लेखनीय योगदान के लिए अतुल यदुवंशी को उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. उनके कार्यों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महोत्सवों में भी पहचान मिली है.

यह पृष्ठभूमि गाथा राम की... की रचनात्मक दृष्टि को समझने में सहायक है. चुनौती केवल तकनीकी नहीं है. इसमें यह तय करना भी शामिल है कि किन पारंपरिक रंग-रूपों को बनाए रखा जाए, कहां नई दृश्यात्मक संभावनाएं अपनाई जाएं और विभिन्न कलात्मक तत्वों को एक सुसंगत प्रस्तुति में कैसे पिरोया जाए.

वेशभूषा, पात्रानुकूल रूप-सज्जा, संगीत, प्रकाश, ध्वनि और मल्टीमीडिया दृश्यावली- सभी को कथा की भावनात्मक एवं नाटकीय आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए. राजदरबार, वन का प्रसंग और युद्ध-दृश्य एक ही प्रकार के वातावरण या गति की मांग नहीं करते. निर्देशक का दायित्व इन विविधताओं के बीच सामंजस्य स्थापित करना है, ताकि प्रस्तुति अलग-अलग दृश्य प्रभावों का संग्रह बनकर न रह जाए.

इस दृष्टि से तीन-स्तरीय मंच-संयोजन केवल भव्यता का प्रयोग नहीं, बल्कि कलाकारों, तकनीकी दल और दृश्य-परिकल्पना के बीच सटीक समन्वय की मांग करने वाली व्यवस्था है.

परंपरा के विस्तार के रूप में तकनीक

पारंपरिक प्रदर्शन कलाओं में तकनीक के प्रयोग पर होने वाली बहस अक्सर यह मानकर चलती है कि आधुनिकता और प्रामाणिकता एक-दूसरे के विरोधी हैं. अतुल यदुवंशी इस धारणा से सहमत नहीं हैं.

वे कहते हैं, “पारंपरिक रामलीला की जीवंत समृद्धि को तकनीक से बदला नहीं जा रहा, बल्कि उसे और समृद्ध किया जा रहा है. पारंपरिक प्रस्तुति शैली को डिजिटल प्रगति के साथ जोड़कर हम रामलीला को नई पीढ़ी के लिए अधिक आकर्षक बना सकते हैं- बिना उसके मूल स्वाद, सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक सार से समझौता किए.”

यह अंतर महत्त्वपूर्ण है. कोई प्रस्तुति अत्याधुनिक स्क्रीन और प्रभावशाली दृश्य तकनीक का उपयोग करते हुए भी रामलीला की लय, भावनात्मक सहजता और भक्तिपरक वातावरण खो सकती है. इसके विपरीत, कोई प्रस्तुति पारंपरिक स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए भी अभिव्यक्ति के नए रास्ते खोज सकती है.

इसलिए वास्तविक प्रश्न यह नहीं कि रामलीला में तकनीक का स्थान होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया जाए.

यह दृष्टिकोण विशेष रूप से उन युवा दर्शकों के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है, जो सिनेमा, तीव्र दृश्य-परिवर्तनों और डिजिटल संसार के अभ्यस्त हैं. उनकी अपेक्षाएं भिन्न हो सकती हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे पारंपरिक कथाओं से जुड़ना नहीं चाहते. आवश्यकता ऐसी प्रस्तुति की है, जो विरासत में मिली कथा को उनसे अधिक सहजता से जोड़ सके.

कथा को जीवंत बनाए रखने की चुनौती

गाथा राम की... के माध्यम से उठने वाला व्यापक प्रश्न किसी एक प्रस्तुति या मंच-परिकल्पना तक सीमित नहीं है : तेजी से बदलते सांस्कृतिक परिवेश में भारत की पारंपरिक प्रदर्शन कलाओं को प्रासंगिक कैसे बनाए रखा जाए?

इसका कोई एक सार्वभौमिक उत्तर नहीं है. प्रत्येक परंपरा का इतिहास, कलात्मक भाषा, दर्शक-वर्ग और उपलब्ध संसाधन अलग होते हैं. केवल तकनीक के प्रयोग से दर्शकों की रुचि सुनिश्चित नहीं की जा सकती. सशक्त पटकथा, कुशल कलाकार, संगीत का ज्ञान, संवेदनशील निर्देशन और निरंतर संस्थागत सहयोग भी उतने ही आवश्यक हैं.

‘गाथा राम की...’ इन सभी तत्वों के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास करती है. तुलसीदास की काव्य-परंपरा, मौलिक संगीत और भगवान शिव की कथात्मक वाणी साहित्यिक तथा आध्यात्मिक निरंतरता को बनाए रखते हैं, जबकि भव्य मंच-परिकल्पना और मल्टीमीडिया दृश्यावली समकालीन रंगभाषा की संभावनाओं को तलाशती है.

यह संतुलन नाजुक है. दृश्य-वैभव पर अत्यधिक जोर कथा से ध्यान हटा सकता है, जबकि पारंपरिक रूढ़ियों पर अत्यधिक निर्भरता प्रयोग की संभावनाओं को सीमित कर सकती है. रचनात्मक चुनौती यही है कि प्रत्येक नया प्रयोग नाटकीय उद्देश्य की पूर्ति करे और प्रत्येक पारंपरिक तत्व अपनी अभिव्यक्तिगत शक्ति बनाए रखे.

अंततः रामलीला की जीवंतता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उसकी प्रस्तुति हमेशा अपरिवर्तित रहे बल्कि इस पर निर्भर करती है कि उसके मूल्य, कथाएं और भावनाएं नई पीढ़ियों तक पहुंचती रहें. प्रयागराज में गाथा राम की... इसी दायित्व की एक रचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करती है. 

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