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साझा समय, स्मृति और संवेदना की धीमी महक

इस संग्रह में ‘साझा’ केवल दो व्यक्तियों के बीच का संबंध नहीं है. वह मनुष्य और प्रकृति, अतीत और वर्तमान, प्रेम और वियोग, यथार्थ और स्वप्न, भाषा और मौन के बीच की वह सूक्ष्म जगह है जहां कविता जन्म लेती है

आलोक कुमार का कविता संग्रह साझे लम्हों की महक
आलोक कुमार का कविता संग्रह साझे लमहों की महक
अपडेटेड 24 अगस्त , 2026

कविता अपने जन्म के क्षण में ही किसी न किसी संकट की साक्ष्य होती है. यह संकट कभी भाषा के सामर्थ्य का होता है, कभी मनुष्य के नैतिक क्षरण का तो कभी उस अंतर्निहित विश्वास का जिसके अभाव में कविता महज शब्दों का बेजान समुच्चय बन जाती है. हमारे समय में यह संकट और गहरा हुआ है. भाषा में रफ्तार बहुत है, लेकिन उसकी अंतरात्मा में संवेदना लगातार छीज रही है. अभिव्यक्तियों का शोर बढ़ा है पर वास्तविक अनुभव की उपस्थिति कम हुई है. ऐसे समय में कविता से यह पूछना पर्याप्त नहीं कि वह क्या कह रही है. अधिक जरूरी यह जानना है कि वह इस विखंडित होते समय में आखिर किसके पक्ष में खड़ी है.

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कविता को मनुष्य और शेष सृष्टि के बीच ‘रागात्मक संबंध’ की पुनर्रचना माना था. आज वही रागात्मकता सबसे बड़े संकट में है. मनुष्य का मनुष्य से, प्रकृति से और अपने अतीत से रिश्ता अस्थिर होता जा रहा है. बाजार और तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है, लेकिन उसके अनेक सहज और आत्मीय अनुभवों को धीरे-धीरे विस्थापित भी किया है. ऐसे समय में कविता की सार्थकता किसी पूर्वनिर्मित विचार की पैरोकारी में नहीं, बल्कि जीवन की जटिलताओं के बीच मनुष्य के पक्ष में एक शांत, संयमित और विश्वसनीय स्वर बनकर खड़े होने में है.

इस संग्रह में ‘साझा’ केवल दो व्यक्तियों के बीच का संबंध नहीं है. वह मनुष्य और प्रकृति, अतीत और वर्तमान, प्रेम और वियोग, यथार्थ और स्वप्न, भाषा और मौन के बीच की वह सूक्ष्म जगह है जहां कविता जन्म लेती है. आलोक कुमार इस जगह को जल्दबाजी में भरने की कोशिश नहीं करते. वे उसे खुला छोड़ते हैं, ताकि पाठक उसमें अपने अनुभव रख सके. यही इस संग्रह की एक बड़ी खूबी है.

स्मृति की मिट्टी और कविता का घर

आलोक की कविताएं स्मृति को भावुकता का वस्त्र नहीं बनातीं. उनके यहां स्मृति अतीत में पलायन का दूसरा नाम नहीं है. वह वर्तमान को समझने की एक नैतिक पद्धति है. जब कवि अपने छूटे हुए परिवेश को याद करता है, तब वह केवल निजी जीवन में लौटने की इच्छा व्यक्त नहीं करता. वह मनुष्य के भीतर बची हुई उस सहजता को खोजता है जो महानगरीय जीवन और बाजार की चमक में लगातार क्षीण हो रही है.

घर का आंगन, मां की उपस्थिति, पिता की थकान, हाट से लौटता हुआ पिता, खेत-खलिहान, आम के बौर, हरसिंगार, गौरैया, ताल-तलैया, जेठ की धरती और आषाढ़ की पहली बूंदें उनके यहाँ सिर्फ स्मृति के दृश्य नहीं हैं. वे उस जीवन-संसार की निशानियां हैं जिसमें मनुष्य और प्रकृति का संबंध अभी पूरी तरह बाजार की भाषा में अनूदित नहीं हुआ था.

इस अर्थ में स्मृति यहां किसी पुराने घर की बंद खिड़की नहीं है. वह वर्तमान में खुलती हुई रोशनी है, जिससे कवि अपने समय के धुंधलेपन को पढ़ता है. इसीलिए गांव, आंगन, मां-पिता और प्रकृति के प्रसंग निजी अनुभव से आगे बढ़कर सामूहिक अनुभव में बदल जाते हैं.

दृश्य, स्वप्न और समय का फैलता हुआ वृत्त

इस संग्रह की कविताओं में दृश्य प्रायः पहले सरल दिखाई देता है, फिर धीरे-धीरे वह अपने भीतर छिपे हुए अर्थों को खोलता है. ऊंचे देवदार, चांद, नदी, धुन्ध, खिड़की, पगडण्डी, हरसिंगार - ये सब मात्र दृश्य नहीं हैं; ये असल में मनुष्य की आंतरिक अवस्थाओं के रूपक बन जाते हैं. आलोक कुमार की काव्य-दृष्टि इसी रूपांतरण में पहचानी जाती है. वे दृश्य को विचार में बदलते हैं और विचार को फिर एक भावात्मक अनुभव में लौटा देते हैं.

उनके यहां समय स्थिर नहीं है. वह कभी नदी है, कभी स्मृति, कभी प्रतीक्षा, कभी किसी प्रिय की अनुपस्थिति में खिंचा हुआ मौन. इसीलिए संग्रह की कविताएँ पाठक से तुरंत अर्थ ग्रहण करने की अपेक्षा नहीं करतीं. वे धीरे-धीरे खुलती हैं, जैसे धुन्ध में कोई रास्ता पहले आभास देता है, फिर आकार.

प्रेम, साझापन और अनुपस्थिति का सौन्दर्य

संग्रह की एक उल्लेखनीय कविता ‘मुहावरा’ में संवाद और संबंध का अपना निजी व्याकरण सामने आता है. कवि कहता है कि हर संवाद का एक मुहावरा होता है, और उसी से संवाद में प्राण-प्रतिष्ठा होती है. यह बहुत साधारण-सी बात लग सकती है, पर प्रेम और संबंधों की पूरी त्रासदी इसी में छिपी है. जब संवाद छूटने लगता है, तब केवल शब्द नहीं छूटते, उनका मुहावरा भी खो जाता है. कविता इस खोये हुए मुहावरे को बचाने की कोशिश है.

साझे लमहों की महक,
रिसती है प्राणों में धीरे-धीरे,
और मैं कस्तूरी मृग-सा भटकता रहता हूं
उस महक की तलाश में...

(कस्तूरी मृग, पृ. 41)

‘कस्तूरी मृग’ में यह साझापन और भीतर चला जाता है. साझे लम्हों की महक प्राणों में धीरे-धीरे रिसती है और कवि उस महक की तलाश में कस्तूरी मृग-सा भटकता है. यह प्रेम के साथ - साथ आत्म की भी भटकाव है. प्रेम यहाँ किसी व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता; वह वेदना को विश्व-वेदना में बदल देने की आकांक्षा बन जाता है. यही वह क्षण है जहाँ निजी अनुभव अपनी संकीर्णता तोड़कर व्यापक मानवीय अर्थ ग्रहण करता है.

भाषा की प्रांजलता और बिम्बों की पारदर्शिता

आलोक कुमार की भाषा में अनावश्यक कठिनाई नहीं है. वह सरल है, लेकिन उसकी सरलता सपाट नहीं होती. उनकी कविता परिचित शब्दों और दृश्यों से एक ऐसा भाव-संसार निर्मित करती है जिसमें पाठक अपने अनुभवों की प्रतिध्वनि सुन सकता है.

‘विचार’ कविता में कवि प्रेम को शब्द, स्वर, गंध और स्पर्श से आगे ले जाकर एक विचार के रूप में देखता है:

तुम केवल शब्द, स्वर,
गन्ध और स्पर्श नहीं थी,
इन सबसे ऊपर तुम थी एक विचार...

(विचार, पृ. 48)

यहां प्रेम किसी क्षणिक भावावेग से आगे बढ़कर अस्तित्व की समझ में बदल जाता है. विचार यहां सूखा तर्क नहीं है. वह संवेदना से पैदा हुआ अनुभव है. संग्रह की कई कविताओं में यही विशेषता दिखाई देती है कि वे भाव और विचार को एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं खड़ा करतीं.

हालांकि संग्रह की कुछ कविताओं में भाव का प्रत्यक्ष कथन कविता की उस बहुअर्थी जगह को थोड़ा संकुचित कर देता है जो इसकी अधिक सफल कविताओं की विशेषता है. जहां कवि संकेत, बिम्ब और मौन पर भरोसा करता है, वहां उसकी कविता अधिक देर तक पाठक के भीतर रहती है. कुछ स्थानों पर जब वही भाव सीधे कह दिया जाता है, तो उसकी काव्यात्मक प्रतिध्वनि अपेक्षाकृत कम हो जाती है. यह सीमा भी उसी संग्रह की ताकत की ओर संकेत करती है. आलोक की कविता तब अधिक प्रभावी होती है जब वह पाठक को अर्थ तक पहुंचने की थोड़ी दूरी स्वयं तय करने देती है.

गौरैया से मेटावर्स तक

इस संग्रह की प्रकृति-कविताएँ महज सौंदर्यबोध की कविताएं नहीं हैं. उनमें पर्यावरण और सभ्यता के बदलते संबंध को लेकर एक स्पष्ट चिंता दिखाई देती है. ‘पूछती है गौरैया’ इसका सुंदर उदाहरण है:

क्या कभी फिर
मिलूँगी तुमसे
खेत-खलिहानों में...
या अब ये सारी मुलाक़ातें
होंगी उस मायावी दुनिया
मेटावर्स में...

(पूछती है गौरैया, पृ. 102)

गौरैया का यह प्रश्न महज एक पक्षी का प्रश्न नहीं है. यह हमारी सभ्यता से पूछा गया प्रश्न है. क्या आने वाली पीढ़ियां प्रकृति को उसी तरह अनुभव कर पाएँगी जैसे पिछली पीढ़ियां करती थीं, या खेत-खलिहान, मुंडेर, ताल-तलैया और पक्षियों की आवाजें अंततः डिजिटल स्मृति का हिस्सा बनकर रह जाएंगी?

यहां संग्रह अतीत का महिमामंडन मात्र नहीं करता. वह वर्तमान से पूछता है कि विकास और सुविधा की दौड़ में हमने क्या खो दिया है. मेटावर्स का बिम्ब इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह प्रकृति और आभासी संसार के बीच का विरोधाभास एक ही क्षण में सामने रख देता है. जीवित गौरैया के स्थान पर उसकी डिजिटल उपस्थिति बची रह जाए, तो क्या वह वास्तव में बचना कहलाएगा?

नदी, सरहद और मनुष्य

‘कुछ कहती है किशनगंगा’ में प्रकृति इतिहास और राजनीति की साक्षी बन जाती है:

सरहद के उधर
सरहद के इधर
मैं बहती एक-सी, हज़ारों साल से...
कभी तुम भी,
बह पाओ मेरी तरह
सरहदों के परे.

(कुछ कहती है किशनगंगा)

किशनगंगा यहां मात्र नदी नहीं है. वह मनुष्य द्वारा खींची गई सीमाओं के सामने प्रकृति की निरंतरता का प्रतीक बन जाती है. नदी को पासपोर्ट नहीं चाहिए. उसे किसी पहचान-पत्र की जरूरत नहीं. वह अपनी धारा में दोनों ओर की मिट्टी को छूती हुई बहती है. मनुष्य ने अपने भय, इतिहास और राजनीतिक आकांक्षाओं से जो रेखाएं खींची हैं, नदी उन्हें अपने बहाव में लगातार चुनौती देती है.

इस कविता की मार्मिकता इस बात में है कि प्रकृति यहां राजनीति से बाहर नहीं है. सीमा पर होने वाली हिंसा और नदी की शांत धारा के बीच का विरोध कविता को एक गहरा मानवीय अर्थ देता है. नदी जैसे मनुष्य से पूछती है कि जब प्रकृति का जीवन सीमाओं से परे है, तो मनुष्य का जीवन क्यों नहीं हो सकता?

श्रम, स्मारक और सभ्यता की विडंबना

संग्रह का सामाजिक पक्ष ‘पसीना’ जैसी छोटी लेकिन तीखी कविता में सामने आता है:

पसीने के बिना पर बनी इमारतें
डरती हैं पसीने से.

(पसीना, पृ. 80)

यह दो पंक्तियां अपने भीतर पूरा सामाजिक व्यंग्य समेटे हुए हैं. एक स्मारक के चारों ओर बने रास्ते पर दौड़ना मना है. इतना चलिए कि पसीना न आए. लेकिन जिन इमारतों को इतिहास में महानता और स्मृति के प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया, उनके निर्माण के पीछे श्रम और पसीना ही तो था.

कवि इस विडंबना को बहुत कम शब्दों में पकड़ता है. स्मारक श्रम की देन हैं, लेकिन आज वही स्मारक श्रम के सबसे स्वाभाविक चिह्न से असहज हैं. इस छोटी-सी कविता में इतिहास, वर्ग और श्रम का प्रश्न एक साथ उपस्थित हो जाता है. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि साझे लम्हों की महक  सिर्फ प्रेम और स्मृति का संग्रह नहीं है. उसकी संवेदना सामाजिक जीवन की असमानताओं तक भी पहुँचती है.

महक जो देर तक रहती है

साझे लम्हों की महक को पढ़ना किसी तेज रोशनी में खड़े होने जैसा नहीं है. यह उस सांझ के उजाले में चलने जैसा है जहां चीज़ें एकाएक नहीं, धीरे-धीरे अपनी पहचान खोलती हैं. आलोक कुमार की कविता अपने पाठक को चौंकाने की कोशिश नहीं करती. वह उसके भीतर ठहरना चाहती है. इस संग्रह की ताक़त उसकी कोमलता में है. यह कोमलता जीवन से आँखें चुराने की नहीं, उसे बहुत ध्यान से देखने की कोमलता है. प्रेम, स्मृति, प्रकृति, श्रम और समय को एक साझा संवेदना में पिरोती हुई यह काव्य-यात्रा हिंदी कविता में एक शांत, संयमित और विश्वसनीय उपस्थिति दर्ज करती है.

कविता संग्रह एक खोते हुए मुहावरे की स्मृति को बचाए रखने की एक कोशिश है. और अच्छी कविताओं की पहचान शायद यही है कि पुस्तक बंद करने के बाद भी उसकी कोई पंक्तियाँ हमारे भीतर बोलती रहे, कोई दृश्य लौटता रहे, कोई महक धीरे-धीरे फैलती रहे.

कवि आलोक कुमार के 'साझे लम्हों की महक' ऐसी ही कविता की किताब है. इसे पढ़कर हम उससे बाहर नहीं आते. उसके कुछ लम्हे हमारे भीतर रह जाते हैं, चुपचाप.

पुस्तक : साझे लम्हों की महक
लेखक : आलोक कुमार
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
मूल्य : रु 325 मात्र

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