नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी आंदोलन से हुई थी. बाद के सालों में यह सशस्त्र विद्रोह के रूप में छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, केरल, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना तक में फैल गया. नक्सलियों की शब्दावली में उनके असर वाले इन क्षेत्रों को मिलाकर लाल गलियारा नाम दिया गया. फिर जब 2004 में इनकी एकजुटता हुई तो ये माओवादी कहलाने लगे.
लेकिन कभी न कभी इनके विद्रोह का निर्णायक मोड़ आना ही था. बढ़ती हिंसा के बीच साल 2024 में 24 अगस्त को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पहली बार कहा कि 31 मार्च 2026 तक देशभर से माओवादियों का पूरी तरह खात्मा कर देंगे. तब शायद माओवादियों ने इस बात को महज सरकारी घोषणा समझा. लेकिन घोषणा के 18 महीने बाद स्थिति बहुत बदल चुकी है.
इस दौरान साल 2025 में 317 माओवादियों को मार गिराया गया, 862 को गिरफ्तार किया गया और 1,973 ने आत्मसमर्पण किया है. वहीं 2024 में 290 माओवादी मुठभेड़ में मारे गए, 1,090 को गिरफ्तार किया गया और 881 ने आत्मसमर्पण किया. अब तक कुल 28 शीर्ष माओवादी नेता मारे जा चुके हैं, जिनमें 2024 में 1 केंद्रीय समिति सदस्य और 2025 में 5 केंद्रीय समिति सदस्य शामिल हैं.
यही नहीं, देशभर में माओवाद प्रभावित जिलों की संख्या 126 से घटकर केवल 11 रह गई है. जबकि अति प्रभावित जिलों की संख्या 36 से घटकर मात्र 3 रह गई, जो लाल गलियारे के लगभग खात्मे का संकेत है. घोषित लक्ष्य की समीक्षा के लिए बीते 10 फरवरी को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह छत्तीसगढ़ के दो दिवसीय दौरे पर थे. इस दौरान उन्होंने दोहराया कि मार्च की अंतिम तारीख की जो डेडलाइन है, वही आखिरी डेडलाइन है.
गृहमंत्री के दावों के विपरीत छत्तीसगढ़ के पूर्व गृहमंत्री और कांग्रेस नेता ताम्रध्वज साहू ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि जो डेडलाइन सरकार की ओर से जारी की गई है, उसमें 31 मार्च तक अभी करीब 51 दिन बचे हैं. इस दौरान माओवाद का पूरी तरह से समाप्त होना संभव नहीं है. साहू का दावा है कि केवल छत्तीसगढ़ में ही 400 से अधिक नक्सली अब भी बचे हैं.
उन्होंने आगे कहा, “ये माओवादी दो तरह से सक्रिय हैं. एक वे जो छिपकर जंगल में रहकर काम कर रहे हैं और दूसरे वे जो खुले रूप से रहते हुए उनकी मदद कर रहे हैं. ऐसे में समय सीमा तय करने की बात कैसे की जा रही है.”
साहू ने सक्रिय माओवादियों का जो आंकड़ा दिया उसकी पुष्टि सुरक्षाबलों से मिली जानकारी से भी होती है. ऐसे में अगर छत्तीसगढ़ के साथ झारखंड के माओवादियों की संख्या मिला दी जाए तो आंकड़ा 450 को पार कर जाता है. और ये सशस्त्र माओवादी हैं. इनके सांस्कृतिक और वैचारिक संगठनों के सदस्यों की इसमें गिनती नहीं है. इंटेलिजेंस एजेंसी के सूत्रों की मानें तो सांस्कृतिक और वैचारिक संगठनों के लोगों के आंकड़ों को देखें तो यह 4000 के पार जा सकता है. जाहिर है कि ऐसी स्थिति में मार्च की तय डेडलाइन तक माओवादियों का खात्मा अव्यवहारिक लगता है. चर्चा इस बात की भी है कि इस डेडलाइन को अगले तीन महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है. छत्तीसगढ़ के बस्तर और झारखंड के सारंडा के जंगल में पतझड़ आ चुका है. माना जाता है कि इस दौरान माओवादियों के खिलाफ अभियान चलाने में सुरक्षाबलों को अधिक मदद मिलती है. यानी बरसात से पहले तक.
ऐसे में अहम सवाल यह है कि डेडलाइन तक लक्ष्य को पूरा करने में इस वक्त क्या-क्या मुश्किलें आ रही हैं? नाम न छापने की शर्त पर छत्तीसगढ़ में ऑपरेशन से जुड़े एक अधिकारी ने बताया, “हमारी लगातार दबिश की वजह से माओवादियों ने भी अपनी रणनीति में आमूल-चूल परिवर्तन किया है. अब ये लोग बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गए हैं. कह सकते हैं कि तीन से चार का गुट बनाकर रह रहे हैं. इसके अलावा ये जंगल से निकल कर गांवों या गांव के आसपास चले गए हैं.”
यही अधिकारी जानकारी देते हैं कि माओवादी के अपना इलाका बदलने की वजह से इनकी मुखबिरी कराने में मुश्किल आ रही है. माओवादियों ने हथियार और वॉकी-टॉकी को डंप कर दिया है, जिससे इनकी लोकेशन और मूवमेंट की जानकारी नहीं मिल पा रही है. ये अधिकारी दावा करते हैं कि माओवादियों को इस समय पड़ोसी राज्य खासकर तेलंगाना के ग्रामीण इलाकों से लोगों की मदद मिल रही है, जिससे सुरक्षाबलों के रडार पर नहीं आ पा रहे हैं.
बढ़ानी होगी समय सीमा?
तो क्या माओवाद के खात्मे की निर्धारित समय सीमा को बढ़ाया जा सकता है? छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी आर.के. विज कहते हैं, ‘’डेढ़ महीने का समय अब भी बचा है, ऑपरेशन चल रहे हैं, लोग सरेंडर भी कर रहे हैं. थोड़ा और इंतजार कीजिए, फिर समय सीमा बढ़ाने या उस वक्त की स्थिति पर बात की जा सकती है. दूसरी और अहम बात यह है कि माओवादी बहुत कमजोर हो चुके हैं. संगठन बिखर चुका है. ये अब किसी तरह का हमला करने की स्थिति में नहीं हैं. जहां तक बात सांस्कृतिक संगठनों को लेकर है, ये लोग कोई बाहर नहीं रह रहे हैं. ये भी हथियार दस्ता के साथ ही होते हैं, इनके पास भी हथियार होते हैं. ऐसे लोग भी सरेंडर कर रहे हैं या मारे जा रहे हैं.’’
झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम माओवाद से अति प्रभावित जिलों में शामिल है. यहां के सारंडा जंगल में माओवादियों का एक दस्ता अभी-भी मौजूद है. जिले के एसपी अमित रेणु कहते हैं, “हमारे पास इनपुट है कि यहां अभी भी 54 की संख्या में माओवादी मौजूद हैं. जिले के दो थाना क्षेत्रों में इनका मूवमेंट देखा जाता है. हम कोशिश कर रहे हैं कि मार्च के अंत तक इन्हें पूरी तरह खत्म कर देंगे.’’
इन माओवादियों का खात्मा अभियान से होगा या फिर कोई सरेंडर के लिए भी तैयार हैं? इस बारे में अमित रेणु बताते हैं, ‘’सरेंडर के लिए कौन तैयार है, इसकी सूचना तो अभी साझा नहीं कर सकता. लेकिन माओवादियों के परिजनों के संपर्क में हम लगातार हैं. उनके माध्यम से सरेंडर कराने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही स्थानीय लोग जो माओवादियों से सहानुभूति रखते हैं या मदद करते हैं उनसे भी कहा जा रहा है कि वे माओवादियों को सरेंडर के लिए कहें या फिर उनके बारे में हमें सूचना दें.’’ दोनों राज्यों के लिहाज से अगला डेढ़ महीना महत्वपूर्ण होने जा रहा है.

