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सरकार कल्याण कार्यक्रमों के लिए RBI की डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल करना क्यों चाहती है?

गुजरात में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है जिसके तहत सब्सिडी वाले राशन के लिए डिजिटल रुपए के इस्तेमाल को परखा जाएगा. यह प्रोजेक्ट भारत में कल्याणकारी योजनाओं के लिए एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह डिजिटल रुपया को पीडीएस से जोड़ने वाले पायलट प्रोजेक्ट का उद्घाटन करते हुए
अपडेटेड 18 फ़रवरी , 2026

फरवरी की 15 तारीख को अहमदाबाद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत की. यह प्रोजेक्ट सरकार की योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंचाने के तरीके में बड़ा बदलाव ला सकता है. इसमें राशन कार्ड जैसी पारंपरिक व्यवस्था की जगह डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल किया जा रहा है.

इस योजना के तहत भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की डिजिटल करेंसी, यानी डिजिटल रुपया या CBDC को सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस से जोड़ा गया है. पीडीएस के जरिए गरीब परिवारों को सस्ते दाम पर गेहूं, चावल और अन्य खाद्यान्न दिया जाता है. डिजिटल रुपया भारत की सरकारी मुद्रा का डिजिटल रूप है.

इस बदलाव को समझने के लिए पुरानी व्यवस्था को देखना जरूरी है. पहले पात्र परिवारों को राशन कार्ड के जरिए अनाज मिलता था. इसका हिसाब सरकार के रिकॉर्ड और सब्सिडी खातों में रखा जाता था. बाद में आधार और बायोमेट्रिक पहचान को जोड़ा गया. इसके बावजूद सिस्टम में कागजी काम, मैनुअल जांच और बिचौलियों की भूमिका बनी रही.

अब इस पायलट प्रोजेक्ट में लाभार्थियों को डिजिटल टोकन दिए जा रहे हैं, जो ई-रुपया में होते हैं. ये टोकन एक डिजिटल वॉलेट में रहते हैं. लाभार्थी इन्हें सीधे तय राशन दुकानों पर इस्तेमाल कर सकते हैं. अब कागजी कूपन या सब्सिडी का अलग से हिसाब नहीं रखा जाएगा. राशन का अधिकार खुद एक डिजिटल करेंसी बन गया है, जिसे सिर्फ तय राशन सामान खरीदने में ही इस्तेमाल किया जा सकता है.

सरकार का कहना है कि पीडीएस में लंबे समय से कई कमजोरियां रही हैं. आधार और इलेक्ट्रॉनिक मशीनें लगने के बाद भी राशन की चोरी पूरी तरह नहीं रुकी. कई जगह अनाज खुले बाजार में बिकता रहा. फर्जी नामों से राशन लिया गया. दुकानदारों ने रिकॉर्ड में हेरफेर की. सब्सिडी के भुगतान में भी देरी होती रही. कागजी और कमजोर डिजिटल सिस्टम की वजह से गड़बड़ी पकड़ना मुश्किल था.

डिजिटल करेंसी इन समस्याओं को रोकने की कोशिश करती है. इन्हें किसी और चीज पर खर्च नहीं किया जा सकता. इन्हें न बदला जा सकता है और न ही दोबारा बनाया जा सकता है. हर लेनदेन का पूरा डिजिटल रिकॉर्ड बनता है. सरकार का दावा है कि इससे चोरी रुकेगी, बिचौलिए हटेंगे और सही लोगों तक पूरा लाभ पहुंचेगा.

CBDC मौजूदा डिजिटल पेमेंट सिस्टम जैसे यूपीआई या बैंक ट्रांसफर से अलग है. यूपीआई के जरिए पैसा एक बैंक खाते से दूसरे खाते में जाता है. इसमें बैंकों की भूमिका रहती है. इसी तरह डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर में पैसा खाते में आता है, जिसे लाभार्थी कहीं भी खर्च कर सकता है.

डिजिटल रुपया इससे अलग है. यह डिजिटल नकद की तरह है, जिसे सीधे RBI जारी करता है. यह किसी बैंक की जमा राशि नहीं है, बल्कि खुद RBI की जिम्मेदारी होती है. इससे बार-बार बायोमेट्रिक जांच की जरूरत कम होती है, लेनदेन तेज होता है. राशन दुकानदारों को भी उनका पैसा तुरंत मिल जाता है.

‘हर दाना, हर रुपया, हर अधिकार’ का नारा देते हुए केंद्रीय खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि इससे लोगों को अपने अधिकारों की बेहतर जानकारी मिलेगी. राशन लेना आसान होगा और सिस्टम में जवाबदेही बढ़ेगी. लाभार्थी डिजिटल कूपन या वाउचर कोड से राशन ले सकेंगे. उन्होंने बताया कि जल्द ही यह योजना चंडीगढ़, पुडुचेरी, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव में भी शुरू होगी.

पीडीएस को जानबूझकर इस प्रयोग के लिए चुना गया है. यह देश की सबसे बड़ी कल्याण योजनाओं में से एक है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत यह करीब 80 करोड़ लोगों को कवर करता है. इस सिस्टम में लंबे समय से चोरी और गलत पहचान की समस्याएं रही हैं. सरकार का मानना है कि अगर डिजिटल करेंसी यहां काम कर गई, तो इसे दूसरी योजनाओं में भी लागू किया जा सकता है.

गुजरात को इस पायलट के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि यहां प्रशासनिक तैयारी मजबूत मानी जाती है. राज्य सरकार RBI, वाणिज्यिक बैंकों और खाद्य विभाग के साथ मिलकर इसे लागू कर रही है. यह पायलट अहमदाबाद, सूरत, आनंद और वलसाड जिलों में शुरू किया गया है, जिसमें 26,333 परिवार शामिल हैं.

अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल उर्वरक सब्सिडी, एलपीजी सब्सिडी, पेंशन, छात्रवृत्ति और रोजगार गारंटी जैसी योजनाओं में भी किया जा सकता है. इससे यह सुनिश्चित होगा कि पैसा सिर्फ उसी काम में खर्च हो, जिसके लिए दिया गया है. हालांकि इसमें कुछ जोखिम भी हैं. कई लाभार्थियों के पास स्मार्टफोन नहीं हैं. इंटरनेट की सुविधा भी हर जगह नहीं है. डिजिटल वॉलेट का इस्तेमाल सभी को नहीं आता. तकनीकी खराबी, बिजली कटौती या सिस्टम फेल होने पर राशन मिलने में दिक्कत आ सकती है.

साइबर सुरक्षा भी एक चिंता है. जब सरकारी योजनाएं डिजिटल मुद्रा से जुड़ती हैं, तो किसी भी तकनीकी कमजोरी का असर बड़े स्तर पर हो सकता है. सरकार का कहना है कि ऑफलाइन लेनदेन, दुकानदारों की मदद, शिकायत निवारण और धीरे-धीरे लागू करने जैसे उपाय किए जा रहे हैं.

डिजिटल रुपया कल्याण योजनाओं की सारी समस्याएं हल कर पाएगा या नहीं ये अभी साफ नहीं है. लेकिन ये पायलट एक बड़ा बदलाव जरूर दिखाता है. अब सब्सिडी खर्च होने के बाद उसे ट्रैक करने की जगह नियंत्रण सीधे मुद्रा में डाला जा रहा है. इससे भारत में कल्याण योजनाओं और सरकारी पैसों के इस्तेमाल का तरीका बदल सकता है.

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