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साल 1999 के बाद अब होगा राज्य निर्वाचन आयुक्तों का राष्ट्रीय सम्मेलन; क्या है एजेंडा?

स्थानीय निकायों के चुनाव कराने वाले राज्य निर्वाचन आयोगों और चुनाव आयोग के बीच बेहतर तालमेल के मकसद से 24 फरवरी को नई दिल्ली में एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन होगा

The chief election commissioner's statement comes days after the murder of politician Dularchand Yadav on October 30 in Mokama assembly constituency, which saw arrests and immediate action from the Commission.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार
अपडेटेड 13 फ़रवरी , 2026

तकरीबन 27 सालों के बाद चुनाव आयोग 24 फरवरी को राज्य निर्वाचन आयुक्तों का राष्ट्रीय सम्मेलन नई दिल्ली में कराने जा रहा है. राज्य निर्वाचन आयुक्तों का आखिरी ऐसा सम्मेलन 1999 में हुआ था. दरअसल, राज्य निर्वाचन आयुक्तों की जिम्मेदारी स्थानीय निकायों के चुनाव कराने की होती है. संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के बाद इन आयोगों का गठन किया गया था.

दरअसल, कई राज्य चुनाव आयोगों की तरफ से लगातार यह मांग की जा रही थी कि सभी का एक संयुक्त सम्मेलन हो ताकि उन्हें न सिर्फ एक-दूसरे के अनुभवों का लाभ मिले बल्कि चुनाव आयोग और उनके बीच भी बेहतर समन्वय स्थापित हो सके. भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की अध्यक्षता में होने वाले इस सम्मेलन में देश के सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के राज्य चुनाव आयुक्त शामिल होंगे. चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी भी इस सम्मेलन में शामिल रहेंगे. इस सम्मेलन में राज्य चुनाव आयोगों के कानूनी और तकनीकी विशेषज्ञ भी शामिल होंगे.

चुनाव आयोग ने बताया है कि सम्मेलन का प्राथमिक उद्देश्य चुनाव आयोग और राज्य निर्वाचन आयोगों के बीच चुनावी प्रक्रियाओं और लॉजिस्टिक्स के संचालन में तालमेल और सहयोग बढ़ाना है. इस सम्मेलन के जरिए चुनाव आयोग राज्य चुनाव आयोगों को मतदाता सूची तैयार कराने, चुनाव कराने और संवैधानिक कानूनी ढांचे का पालन करते हुए काम करने के बारे में अपने अनुभवों को भी साझा करेगा. इसके अलावा राज्य चुनाव आयोगों के लोग भी अपने अनुभवों को रखेंगे ताकि देश भर में लोकल बॉडी के चुनाव कराने में एकरूपता और पारदर्शिता आए.

चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि इस सम्मेलन में आयोग द्वारा हाल में लॉन्च किए गए डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINEET और उसके उपयोग के बारे में भी राज्य चुनाव आयोगों को बताया जाएगा. साथ ही चुनाव आयोग राज्य आयोगों को मतदाता सूची तैयार करने और पूरी चुनावी प्रक्रिया कराने को लेकर अपने अनुभवों को भी साझा करेगा. साथ ही EVM और VVPAT से जुड़ी तकनीकी प्रगति के बारे में भी राज्य चुनाव आयोगों को बताया जाएगा. नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित हो रहे इस सम्मेलन में राज्य चुनाव आयोग अपने राज्यों की चुनौतियों और समाधानों पर प्रजेंटेशन देंगे. ताकि अन्य राज्यों को भी इन मामलों पर सीख मिल सके.

1999 में राज्य चुनाव आयोगों के साथ चुनाव सुधारों को लेकर सम्मेलन आयोजित किया गया था. अब सवाल उठता है कि आखिर 25 साल बाद यह सम्मेलन क्यों हो रहा है? दरअसल, ऐसे किसी सम्मेलन की संवैधानिक बाध्यता नहीं है. भारतीय संविधान के हिसाब से चुनाव आयोग की जिम्मेदारी स्थानीय निकायों के चुनाव कराने की नहीं है. राज्य चुनाव आयोगों का गठन स्थानीय निकायों के चुनाव के लिए ही हुआ है. इसलिए एक तरह से देखा जाए तो दोनों संस्थाएं अलग-अलग डोमेन में काम करती हैं. लेकिन दोनों का काम चुनाव से जुड़ा है.

इस पृष्ठभूमि में पिछले कुछ सालों में कई राज्यों से चुनाव आयोग के पास मांग आ रही थी कि राज्य चुनाव आयोगों को एक मंच पर लाया जाए. इसकी मुख्य वजह यह रही कि स्थानीय निकायों के चुनावों में राज्य निर्वाचन आयोगों को कई बार अकेले ही निर्णय लेने पड़ते हैं. अधिकांश मामले मतदाता सूची में गड़बड़ी, आरक्षण विवाद और राजनीतिक दबाव से संबंधित होते हैं. चुनाव आयोग के साथ नियमित संवाद की कमी से इन मुद्दों का समाधान अक्सर देर से होता है. उम्मीद की जा रही है कि इस सम्मेलन में आपसी समन्वय का कोई व्यावहारिक ढांचा विकसित हो ताकि ऐसे मामलों के समाधान में राज्य चुनाव आयोगों को मदद मिल सके.

राज्य निर्वाचन आयुक्तों की सबसे बड़ी समस्या है राजनीतिक दबाव रही है. वैसे तो राज्यों के आयोग संवैधानिक संस्था हैं लेकिन कई राज्यों में सत्ताधारी पार्टियां चुनाव तिथियों, आरक्षण और डिलिमिटेशन में दखल करती हैं. यही वजह है कि कई बार स्थानीय निकाय के चुनाव कोर्ट मामलों में उलझकर देर से होते  हैं. उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में 2022-23 में पंचायत चुनावों में आरक्षण पर विवाद से देरी हुई और राज्य चुनाव आयोग को अदालत जाना पड़ा.

राज्य चुनाव आयोगों की एक और दिक्कत फंड और गैर प्रशिक्षित मैनपावर की रही है. इसे लेकर भी इस सम्मेलन में चर्चा हो सकती है. हालांकि, चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि फंडिंग के मामले में तो आयोग राज्य चुनाव आयोगों की कोई खास मदद करने की स्थिति में नहीं है लेकिन मैन पावर के कैपिसिटी डेवलपमेंट में मदद करने की कोई व्यवस्था बनाने पर सकारात्मक बात हो सकती है. संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक राज्य चुनाव आयोगों को राज्य सरकारों से फंड मिलता है.

इस सम्मेलन से उम्मीद की जा रही है कि राज्य चुनाव आयोगों को भारत के निर्वाचन आयोग की तकनीकी और कानूनी विशेषज्ञताओं का लाभ मिलेगा. उम्मीद की जा रही है कि इससे स्थानीय निकायों की चुनावी प्रक्रियाओं को बेहतर और पारदर्शी बनाने में मदद मिलेगी.

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