बीते माह महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का बारामती के पास विमान हादसे में निधन हो गया. ठीक इसी तरह, महाराष्ट्र कि जमीन से आने वाले एक और दिग्गज नेता कई बरस पहले विमान हादसे का शिकार हुए थे. हालांकि वे इससे बच निकले और यह आज किसी चमत्कार से कम नहीं लगता. यह नेता थे पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई, 1977 में जिनका प्लेन असम में एक हादसे का शिकार हो गया था.
बात है 4 नवंबर, 1977 की. देसाई, रूसी विमान टीयू 124 में थे जब वह असम के जोरहाट से 23 किलोमीटर दूर तेतलगांव ग्राम के धान के एक खेत में क्रैश हो गया. एक उदासीन, शांत छवि वाले नेता, जिनके बारे में प्रचलित था कि वे नशाबंदी और शिवांबु (अपना मूत्र पीने या शरीर पर लगाने की प्राचीन मगर विवादित क्रिया) पर अटूट भरोसा रखते थे, इस क्रैश से मामूली चोटों के साथ बच निकले थे.
विमान में देसाई के साथ उनके मुख्य सुरक्षा संपर्क अधिकारी जॉन लोबो भी सवार थे. लोबो की कहानी भी दिलचस्प थी. महाराष्ट्र से आने वाले यह आइपीएस अधिकारी, बॉम्बे पुलिस की क्राइम ब्रांच के पहले चीफ थे. डीसीपी (क्राइम) रहते हुए उन्होंने 1959 में नानावटी केस की जांच की अगुवाई की थी. यह वही केस है जिसमें एक भारतीय नौसेना अधिकारी ने अपनी पत्नी के प्रेमी, प्रेम आहूजा को गोली मारकर खुद को पुलिस के हवाले कर दिया था. लोबो को बाद में भारत सरकार में नियुक्त किया गया और वे इंटेलिजेंस ब्यूरो के संयुक्त निदेशक बने. इस दौरान वे प्रधानमंत्री के सुरक्षा संपर्क अधिकारी के तौर पर उनका साथ देते रहे.
अपनी किताब 'लीव्स फ्रॉम अ पुलिसमैन्स डायरी' (1992) में लोबो इस हादसे की आपबीती और इसके बाद हुई हलचल को दर्ज करते हैं. फ्लाइट में क्रू को मिलाकर कुल 25 लोग सवार थे. इनमें से 20 लोगों की जान बच गई. कुछ को हल्की चोटें आईं तो कुछ एकाधिक फ्रैक्चर की चपेट में आए. अपनी किताब के चैप्टर 'मिरेकल्स डू हैपन' (चमत्कार सचमुच होते हैं) में लोबो लिखते हैं, "ऐसे हादसे से बचकर वे कैसे निकले, यह विमानन इतिहास की एक चमत्कृत कर देने वाली कहानी है. वायुसेना के 5 कर्मी अगली सुबह देखने के लिए जीवित नहीं बचे. क्योंकि जिस कॉकपिट में वे थे, वह पूरी तरह नष्ट हो चुका था."
देसाई उत्तर-पूर्व के दौरे पर थे और अरुणाचल की ओर उड़ रहे थे. विंग कमांडर क्लैरेंस जोसेफ डि'लीमा पायलट थे और स्क्वाड्रन लीडर सीरियैक सह-पायलट. लोबो लिखते हैं कि शाम पांच बजे के आस-पास सिल्वर-ग्रे रंग के 124 पुष्पक ने जब दिल्ली से उड़ान भरी थी, तो मौसम एकदम साफ था.
देसाई विमान में 13 लोगों के साथ सवार हुए थे, जिसमें अरुणाचल प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पी.के थुंगोन, सर्वोदय कर्मी और महात्मा गांधी के सेक्रेटरी महादेव देसाई के पुत्र नारायण देसाई, प्रधानमंत्री के अपने बेटे कांतिभाई देसाई, दो संवाददाता, एक फोटोग्राफर और खुद लोबो शामिल थे. उड़ान की अवधि ढाई घंटे की थी.
जोरहाट के ऊपर बादल छाए हुए थे और तय यह था कि अगर विमान वहां नहीं उतारा जा सका तो तेजपुर में लैंडिंग की जाएगी. लोबो लिखते हैं, "लैंडिंग में मदद करने वाली एयरफील्ड की बत्तियां टिमटिमाती हुई दिख रही थीं. नीचे जोरहाट शहर जगमगा रहा था. हम अपने कागज-पत्तर समेटकर खुद को तैयार कर रहे थे. हमने अपने ब्रीफकेस बंद कर लिए थे और पैनल पर लैंडिंग से पहले के निर्देश जल उठे थे: सीटबेल्ट लगाएं, धूम्रपान निषेध."
तभी विमान के पंखों के नीचे छुपी तेज बत्तियां जल उठीं और जहाज हवाई पट्टी के इतने करीब आ गया कि हमें रात कि रोशनी में पट्टी के डामर का रंग दिख रहा था. लेकिन हम बिना धरती को छुए दोबारा ऊपर उठ गए. इंजन मानो धक-धक कर रहा था. हमें सूचित किया गया कि चूंकि जहाज भारी आकार का है, उसे लंबे रनवे की जरूरत है. हमें पता नहीं कि उस वक्त लैंड न कर पाने की असल वजह क्या थी."
लोबो लिखते हैं कि अपनी शंका दूर करने के लिए वे कॉकपिट की तरफ गए लेकिन बहुत कोशिशों के बावजूद वहां का दरवाजा नहीं खुला. वे लिखते हैं, "कभी-कभी अप्रत्याशित चीजें होती हैं. यह किस्मत का खेल है. उस दिन अगर मैं कॉकपिट में पहुंच जाता, तो आज यह वाकया न लिख पाता. प्रधानमंत्री ने देखा कि मैं बार-बार कॉकपिट का हैंडल घुमाने की कोशिश कर रहा हूं. उन्होंने मुझसे सीट पर वापस आने को कहा और समझाया कि मुझे स्थानीय प्रशासन पर भरोसा रखना चाहिए."
अपनी सीट पर वापस आने के बाद लोबो को यह आभास हुआ कि विमान लैंडिंग में जरूरत से ज्यादा वक्त ले रहा है. वे लिखते हैं, "समय बीतता जा रहा था. तभी ऐसा लगा जैसे विमान दोबारा लैंडिंग कर रहा है. मैंने खिड़की से बाहर झांका तो घुप्प अंधेरा था. यह जोरहाट का एयरफील्ड तो नहीं ही था. प्लेन लगातार नीचे की ओर बढ़े जा रहा था और एक हमें एक सीटी की सी आवाज सुनाई दे रही थी. मैं डर गया. अचानक, जहाज लड़खड़ाया. कुछ ही पलों में जमीन से टकराने की आवाज आई. विमान के भीतर सब सामान गिर पड़ा और भारी उथल-पुथल मच गई."
दरअसल, विमान एक मिट्टी के छोटे से टीले से टकरा गया जिसपर खर-पतवार उगी हुई थी. अगर यह टक्कर न होती तो 300 मील प्रति घंटे की रफ्तार से भागता विमान गांव के कच्चे घरों में घुस जाता और जान-माल की हानि का कोई हिसाब न रहता. प्लेन के कंट्रोल्स आखिरी वक्त पर फेल हो गए थे और बायां पंख एक पेड़ के तने में ऐसे घुस गया था जैसे छुरी मक्खन की टिकिया में घुसती है.
बाहर घुप्प अंधेरा था. प्रधानमंत्री की टीम के लोग आपाधापी में उनके केबिन की ओर भागे, जो कॉकपिट से कुछ दूर था. कॉकपिट और उनके केबिन के बीच बैगेज कंपार्टमेंट था. देसाई ने आश्वस्त किया कि वे ठीक हैं. पूरी ताकत से जहाज का दरवाजा खोला गया और पीछे के दरवाजे से प्रधानमंत्री पानी से लबालब धान के खेत में कूद पड़े.
जीवित बचे लोगों में से कई को फ्रैक्चर हुए थे. तो कुछ हल्की चोटों का शिकार हुए थे जबकि अधिकतर शॉक में थे. लोबो लिखते हैं, "प्रधानमंत्री निर्लिप्त भाव से कहते थे कि यह किसी आम एक्सिडेंट की तरह है. जब नारायण देसाई ने कहा कि इसकी जांच होनी चाहिए, तो प्रधानमंत्री ने उन्हें चुप करवा दिया. बहरहाल, नारायण देसाई ने आस-पास जमा हो गए गांव वालों से गुजारिश की कि वे असमिया भाषा में तबतक भजन सुनाएं जबतक मदद आती है. दो पत्रकार जो विमान में थे, गोविंदन कुट्टी और स्वामी, अपनी चोटों को भुलाकर टेलीफोन की तलाश में निकल पड़े. आखिर उनका काम ही था कि दुनिया को हादसे की पक्की और सच्ची जानकारी दें."
फ्लाइट लेफ्टिनेंट रविंद्रन, जो विमान में सवार थे, ने गांववालों से एक साइकिल उधार ली और पीछे की सीट पर एक स्थानीय निवासी को बैठाकर रोवरियाह हवाई अड्डे की ओर रवाना हुए. वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अधिकारियों को दुर्घटना की सही लोकेशन की सूचना दी.
विंग कमांडर डि’लीमा पीठ के बल पड़े मिले. उनके पैर मुड़कर असामान्य आकार में आ चुके थे और वे ज्यादा वक्त जीवित नहीं रह पाए. चार अन्य क्रू सदस्यों के क्षत-विक्षत शव भी पाए गए.
“धर्मग्रंथ कहते हैं, तू मिट्टी है और मिट्टी में ही मिल जाएगा. यह सच इससे ज्यादा सजीव रूप में कभी सामने नहीं आया था. मृत लोग कोई कहानी नहीं बताते. उन अंतिम तनावपूर्ण पलों में, जब विमान धरती मां की ओर तेजी से बढ़ रहा था, कॉकपिट में क्या घटा, यह कभी जाना नहीं जा सकेगा,” लोबो लिखते हैं.
दुर्घटना की जगह का पता चलते ही राहत कार्य शुरू हो गया. जोरहाट के वायुसेना अस्पताल में नर्स प्रधानमंत्री देसाई के लिए अस्पताल के कपड़ों का एक सेट लेकर आईं. गांधीवादी देसाई ने तुरंत पूछा कि क्या कपड़े खादी के हैं? लोबो लिखते हैं, “हैरान नर्स जब अपनी मैट्रन के पास लौटने ही वाली थी, तब उन्होंने अपनी बरामद हुई अटैची की ओर इशारा किया, जिसमें उनके खादी के कपड़े रखे थे. और इस तरह उन्होंने अस्पताल को किसी भी तरह की असुविधा से मुक्त कर दिया."
लोबो लिखते हैं, “हम सभी के लिए दूसरा जीवन मिलने का यह उपहार गहरी संवेदना और उदासी से भरा था. योजना में क्या चूक हुई? गलती इंसान की थी या मशीन की, या दोनों की? वायुसेना ने जांच आयोग नियुक्त किया और संभवतः उन्हें उत्तर मिल भी गया. लेकिन रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई. हालांकि सचिवालय के आर्काइव में धूल फांकते हुए भी उन पांच वीरों की स्मृति बनी रहेगी, जिनकी जान गई.” लोबो खुद आगे चलकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआइ) और भारत के राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के इंटरपोल डिवीजन के प्रमुख बने.

