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वैभव की बैटिंग में कहां से आई इतनी आक्रामता! कोचों ने खोला राज़

वैभव सूर्यवंशी को बिलकुल शुरुआत में क्रिकेट सिखाने वाले उनके कोच मनीष ओझा और ब्रजेश झा के मुताबिक अब IPL का यह सितारा टीम इंडिया में एंट्री के लिए पूरी तरह तैयार है

IPL के एक मैच में वैभव सूर्यवंशी (फाइल फोटो)
अपडेटेड 28 मई , 2026

अपने पहले प्लेऑफ मुकाबले में महज 29 गेंदों पर 97 रन बनाने वाले वैभव सूर्यवंशी की तारीफ इस समय पूरी दुनिया के क्रिकेटर कर रहे हैं. खुद सचिन तेंदुलकर ने उनकी बल्लेबाजी की तकनीक की तारीफ करते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है.

मगर इन तारीफों के साथ क्रिकेट विश्लेषकों और खेल प्रेमियों के बीच एक तरह की हैरत भी है कि महज 15 साल के वैभव लगातार इतना अच्छा प्रदर्शन कैसे कर रहे हैं और वे दुनिया के महान गेंदबाजों के सामने भी बेधड़क खेलते हैं.

साथ में यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि सफेद गेंद में खुद को साबित करने वाले वैभव क्या लाल गेंद के इंटरनेशनल मुकाबलों में भी ऐसा ही प्रदर्शन कर पाएंगे. ऐसे में हमने उससे बचपन से क्रिकेट सिखाने वाले दो कोचों से बातचीत की जो उन्हें सबसे बेहतर जानते हैं.

वैभव की 97 रनों की विस्फोटक पारी के बारे में पटना के कोच मनीष ओझा कहते हैं, "वैभव की बल्लेबाजी की शैली शुरू से ही आक्रामक रही है मगर कल तो वह कुछ ज्यादा ही आक्रामक था. अभी तक ऐसी बल्लेबाजी IPL में कम ही देखने को मिली है. क्रिस गेल ने भले ही सबसे कम गेंदों में शतक लगाया है लेकिन मुझे तो कल वैभव की पारी उससे भी आगे की लग रही थी." मनीष ओझा के पास वैभव आठ साल की उम्र से क्रिकेट सीखने आने लगे थे. दो साल पहले तक वह उनकी कोचिंग में नियमित रूप से आते रहे.

ब्रजेश झा
ब्रजेश झा

वहीं सिर्फ पांच साल की उम्र में वैभव के पिता संजीव सूर्यवंशी ने उन्हें अपने गृह शहर समस्तीपुर के कोच ब्रजेश झा के पास प्रशिक्षण के लिए भेजा था. यहां वैभव वहां आठ साल तक खुद को निखारते रहे. ब्रजेश झा कहते हैं, "मेरा हमेशा से मानना रहा है कि वैभव बड़े मुकाबलों का खिलाड़ी है. वह बड़े मैचों में रन जरूर बनाता है. पहले प्लेऑफ में उसने टीम की जरूरत के हिसाब से मैच जिताने वाली पारी खेली. शुरुआती सात-आठ ओवरों में ही उसने तय कर दिया था कि मैच उसकी टीम ही जीतेगी."

फिर इंडिया टुडे ने दोनों कोचों से पूछा कि दो बार ऐसे मौके आए हैं जब वह 90 से अधिक रन बनाने के बाद भी शतक नहीं लगा पाए. इस मैच में अगर वे शतक लगा देते तो शायद क्रिस गेल का सबसे कम गेंदों में शतक लगाने का रिकॉर्ड भी टूट जाता. इस पर दोनों ने कहा कि वैभव अपने रिकॉर्ड से ज्यादा टीम के लिए खेलते हैं और यह अच्छी बात है. मनीष कहते हैं, "IPL में आपको हर गेंद पर स्ट्राइक करना ही पड़ता है और हर बार आउट होने का जोखिम भी रहता है." वहीं ब्रजेश का कहना है, "उसकी यही खूबी आने वाले दिनों में टीम इंडिया के लिए प्लस पॉइंट साबित होगी."

वैभव की इस पारी के बाद जहां गूगल इंडिया ने पोस्ट किया कि कुछ 97 रनों की पारियां शतक से भी बड़ी होती हैं वहीं भारत के महान बल्लेबाजों में से एक सचिन तेंदुलकर ने पोस्ट किया, "जिस तरह वह अपने पैरों की तरफ आने वाली गेंदों को खेलने के लिए अगला पैर हटाकर अपने लिए जगह बनाता है और शॉट लगाता है, उसकी वजह से उसे वैसा खेलने की आजादी मिलती है, जैसा वह चाहता है."

तेंदुलकर की इस टिप्पणी पर मनीष ओझा कहते हैं, "तेंदुलकर जैसे महान बल्लेबाज जब वैभव की तकनीक पर टिप्पणी कर रहे हैं तो इससे कोई इनकार नहीं कर सकता. मगर मेरा मानना है कि वह जितना फ्लॉलेस फ्रंट फुट पर है उतना ही फ्लॉलेस बैकफुट पर भी है. वह दोनों जगह बैट स्विंग करने लायक स्पेस बना लेता है."

मनीष ओझा, वैभव सूर्यवंशी के साथ
मनीष ओझा, वैभव सूर्यवंशी के साथ

वहीं ब्रजेश कहते हैं, "आक्रामक तो वह बचपन से ही रहा है मगर अभी वह कुछ ज्यादा ही आक्रामक हो गया है. जितना मैं जानता हूं, डेढ़ साल पहले तक वह इतना आक्रामक नहीं था. यह उसने अच्छे मेंटर के साथ रहकर सीखा होगा."

इन दिनों कुछ क्रिकेटर यह कह रहे हैं कि वैभव सफेद गेंद पर तो अच्छा प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन क्या वह लाल गेंद पर भी ऐसा ही प्रदर्शन कर पाएगा? इसके जवाब में मनीष कहते हैं, "लोगों की याददाश्त बहुत छोटी होती है मगर आप ध्यान दें कि पिछले एक साल में वैभव तीन विदेशी दौरों पर गया है. इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और साउथ अफ्रीका. तीनों जगह उसने सेंचुरी लगाई है. वह खुद को रेड बॉल क्रिकेट में पहले ही साबित कर चुका है. दो साल पहले ऑस्ट्रेलिया अंडर-19 की टीम भारत आई थी. उसके पहले ही मैच में वैभव ने 52 गेंदों पर शतक लगाया था. वह भी रेड बॉल मैच था. उसे मौका मिलेगा तो वहां भी प्रदर्शन करेगा. मैं तो मानता हूं कि वह आने वाले दिनों में टेस्ट क्रिकेट की परिभाषा बदल देगा. वहां भी सात के एवरेज से रन बनाएगा और लंबी पारी भी खेलेगा."

वहीं ब्रजेश कहते हैं, "मैं उसे बचपन से जानता हूं. वह IPL की जरूरत के हिसाब से विस्फोटक बल्लेबाज की भूमिका निभा रहा है. जब उसे 50 ओवर के मैचों में मौका मिलेगा तो वहां भी सफल होगा. क्रिकेट का हर शॉट उसके पास है. उसके शॉट्स में नजाकत भी बहुत है. IPL में नजाकत और क्लास दिखाने का मौका नहीं मिलता. आपने उसका कवर ड्राइव नहीं देखा है, स्क्वायर कट नहीं देखा है. वह बैक टू द बॉलर स्ट्रेट ड्राइव भी शानदार लगाता है. IPL में तो सब छक्के-चौके ही देखना चाहते हैं."

आखिर वैभव में ऐसा क्या है कि वह बड़े-बड़े गेंदबाजों के सामने भी पूरी तरह बेखौफ दिखता है. इस पर ब्रजेश झा कहते हैं, "जब वह आठ साल का था तब 20 साल का गेंदबाज उसे नेट प्रैक्टिस कराता था. शुरुआत से ही वह अनुकूल रॉय जैसे इंटरनेशनल खिलाड़ी की गेंद खेलता रहा है. वह बड़े मुकाबलों में 20-25 हजार की भीड़ के बीच खेलता रहा है. यह सब उसके लिए सामान्य है. IPL में तो अच्छी पिच बनती है. वैभव मिट्टी पर भी खेला है, मैट पर भी खेला है और गड्ढों में भी खेला है. उसे हर स्थिति में खेलने का अनुभव है. इसलिए उसे फर्क नहीं पड़ता कि सामने कौन गेंदबाज है."

मनीष ओझा कहते हैं, "अब वक्त आ गया है कि वैभव को भारतीय टीम के टी-20 और वनडे स्क्वॉड में शामिल कर लेना चाहिए. वह अपने प्रदर्शन से दरवाजा सिर्फ खटखटा ही नहीं रहा बल्कि दरवाजा तोड़ने पर उतारू है."

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