29 सितंबर को कोच्चि में आयोजित 'इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ' में उन तीन महिलाओं ने मंच साझा किया, जिन्होंने लंबे समय तक महिलाओं के लिए बंद रहे पेशों में कदम रखा. उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि बीते सालों के दौरान कितना बदलाव आया है और इसके लिए कितनी लड़ाई लड़नी पड़ी.
कमांडर प्रसन्ना एदयिल्लियम (रिटायर्ड) का बचपन कोच्चि के पास एफएसीटी टाउनशिप में बीता. राष्ट्रीय कैडेट कोर (NCC) की कैडेट रहते हुए उनकी नजर नौसेना अधिकारियों के ‘सुनहरे पट्टों’ पर पड़ी और वे भारतीय नौसेना में एयर ट्रैफिक कंट्रोलर के रूप में शामिल हो गईं.
14 साल बाद उन्हें और अन्य महिला अधिकारियों को बिना पेंशन या चिकित्सा सुविधाओं के घर भेज दिया गया क्योंकि उस समय महिलाएं तय अवधि से आगे नौसेना में सेवा नहीं कर सकती थीं. फेसबुक के जरिए एक-दूसरे से संपर्क में आईं महिला अधिकारियों के एक समूह ने इस मामले को दिल्ली हाई कोर्ट में उठाया और जीत हासिल की.
नौसेना ने इस फैसले को चुनौती दी और यह लड़ाई पांच साल और चली. आखिरकार मार्च 2020 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ यह मामला खत्म हुआ. आज महिलाएं सैनिक स्कूलों, पुणे की राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और देहरादून के राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज के जरिए सेना में प्रवेश कर सकती हैं और शीर्ष रैंक के लिए पुरुषों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं.
कमांडर एदयिल्लियम ने याद किया कि अपने पहले नेवल बेस पर वे अकेली महिला थीं. वहां महिलाओं के लिए वॉशरूम तक नहीं था. कमांडिंग ऑफिसर ने उनसे कहा था कि वे “एक पुरुष अधिकारी की तैनाती की उम्मीद कर रहे थे”.
फिजिक्स में ग्रेजुएट नथाना मैरी जे.डी. तिरुवनंतपुरम के पास विझिंजम इंटरनेशनल सीपोर्ट पर क्रेन ऑपरेटर नौ महिलाओं में शामिल हैं. वे 40 टन से अधिक वजन वाले कंटेनरों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाती हैं.
इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ के ‘विमेन, वॉरियर्स, विनर्स’ सत्र में उन्होंने इसका श्रेय अपनी ट्रेनिंग, सहयोगी प्रबंधकों और ऑटोमेशन को दिया. मैरी जे.डी. ने कहा कि जब वे लोगों को अपने काम के बारे में बताती हैं तो वे हैरान रह जाते हैं. लेकिन जब वे उन्हें तकनीक के बारे में समझाती हैं तो यह हैरानी जिज्ञासा में बदल जाती है.
विझिंजम बंदरगाह पर क्रेन ऑपरेटर शिजी यू. ने कहा कि वे अपने परिवार की अकेली कमाने वाली सदस्य हैं. उन्होंने लोगों के विरोध की परवाह किए बिना यह नौकरी करने का फैसला किया.
इन तीनों महिलाओं का संदेश एक जैसा था: वे अपने साथ खास व्यवहार नहीं चाहतीं, बराबरी चाहती हैं. उनका यह भी कहना था कि आत्मविश्वास मौके का इंतजार करने से नहीं, बल्कि मौका मिलने पर उसे अपनाने से आता है.
सत्र की खास बातें
कमांडर प्रसन्ना एदयिल्लियम (रिटायर्ड) :
- “मेरे कमांडिंग ऑफिसर ने मुझसे कहा था: ‘मैं आपके चेहरे को नहीं, कंधे पर लगी पट्टियों को देखता हूं.’ इसलिए आपको खुद को साबित करना होगा.”
- “हम नहीं चाहते थे कि हमारे साथ महिला अधिकारियों जैसा अलग व्यवहार किया जाए. हम सिर्फ अधिकारी के रूप में पहचाने जाना चाहते थे, क्योंकि हमने वही इंटरव्यू और वही प्रक्रिया पूरी की थी.”
- “पहले ब्रीफिंग के लिए कहा जाता था, ‘गुड मॉर्निंग, जेंटलमेन’. मेरे शामिल होने के बाद यह ‘गुड मॉर्निंग, लेडी एंड जेंटलमेन’ हो गया.”
- “उस खास साल में जहाज की कमान एक महिला के पास थी और ऑपरेशंस ऑफिसर भी महिला थीं. फिर हम किस बात की चर्चा कर रहे हैं? हम सभी क्षेत्रों में विस्तार की बात करते हैं. फिर महिलाओं को सशक्त क्यों नहीं बना रहे?” (2000 में सिंगापुर के एक नौसैनिक जहाज पर सेवा देने के अनुभव के बारे में)
- “हर कोई मुझसे कहता था, ‘आप महिला हैं, आपके बाल लंबे होने चाहिए.’ इसकी परिभाषा कहां है? यह कहां लिखा है?”
नथाना मैरी जे.डी. :
- “कभी-कभी हमें किसी के सहयोग की जरूरत होगी. कभी-कभी हमें खुद ही अपना सहारा बनना होगा.”
- “यह मत सोचिए कि ‘जब मैं तैयार हो जाऊंगी, तब शुरुआत करूंगी.’ मौका मिलने से पहले आत्मविश्वास नहीं आएगा.”
- “सशक्तीकरण का मतलब महिला को वह मौका देना है. अगर हम उसे काम करने की जगह देंगे तो वही काम दिखाएगा कि महिलाएं कैसे काम कर सकती हैं.”
- “जब मैं उन्हें बताती हूं कि यह एक ऑटोमेटिक क्रेन है तो उनका भ्रम जिज्ञासा में बदल जाता है.”
- “मैं खुद को एक छोटी बच्ची की तरह सोचूं तो आज यह विश्वास नहीं कर पाती कि मैं सीआरएमजी (कैंटिलीवर रेल-माउंटेड गैंट्री) ऑपरेटर हूं.”

