जब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) नेता तारिक रहमान अंततः चुनाव प्रचार के लिए ढाका से बाहर निकले तो यह केवल एक चुनावी दौरे की शुरुआत भर नहीं थी, बल्कि एक लंबे विवादित राजनीतिक वनवास का अंत भी था.
हालांकि, लंदन में स्वैच्छिक निर्वासित जीवन बिता रहे रहमान 25 दिसंबर को ही बांग्लादेश लौट आए थे, लेकिन स्वदेश लौटते ही देशव्यापी यात्रा पर नहीं निकले. BNP सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने यह संयम कोई स्वेच्छा से नहीं बरता था.
आधिकारिक तौर पर बांग्लादेश चुनाव आयोग की तरफ से फरवरी में होने वाले राष्ट्रीय चुनावों के लिए प्रचार की औपचारिक शुरुआत 22 जनवरी से होनी थी. BNP नेताओं का दावा है कि अनौपचारिक तौर पर आयोग ने रहमान को बार-बार ऐसे संदेश भेजे कि वो ढाका न छोड़ें.
एक वरिष्ठ BNP नेता ने कहा, “उनसे बार-बार आग्रह किया गया कि ढाका से बाहर यात्रा न करें. न सिर्फ प्रचार के लिए, बल्कि अनौपचारिक यात्रा करने से भी मना किया गया. अन्य राजनेता स्वतंत्र रूप से घूम रहे थे लेकिन तारिक रहमान को वहीं रहने को कहा गया था.”
कई BNP सूत्रों के मुताबिक, सावधानी बरतने का एक बड़ा कारण यह चिंता भी थी कि अगर रहमान ने जल्द राष्ट्रव्यापी लामबंदी शुरू कर दी तो Jamaat-e-Islami पार्टी चुनाव प्रक्रिया से हट सकती है. BNP का कहना है कि आयोग की तरफ से कोई औपचारिक निर्देश नहीं दिए गए बल्कि मध्यस्थों के जरिये लगातार संकेत भेजे गए थे.
एक BNP सूत्र ने कहा, “हमसे बार-बार यह कहा गया कि उनकी आवाजाही चुनावी माहौल को जटिल बना सकती है. मतलब स्पष्ट था—सड़कों पर उनकी मौजूदगी कुछ राजनीतिक समीकरणों को बिगाड़ सकती है.”
लेकिन जैसे ही चुनाव प्रचार की औपचारिक शुरुआत हुई, सब्र का बांध टूट गया—और फिर जो हुआ उसमें सावधानी बरतने जैसा कुछ भी नहीं था. रहमान ने अपना प्रचार ऐसी तेजी और व्यापकता के साथ शुरू किया जो बांग्लादेश के चुनावी इतिहास में शायद ही कभी देखा गया हो.
22 जनवरी को दोपहर में सिलहट से शुरू करके उन्होंने लगभग 16 घंटों में छह जिलों में सात रैलियों को संबोधित किया और नारायणगंज जिले के रूपगंज में सुबह लगभग 4 बजे अपना अभियान समाप्त किया, जहां भोर के अंधेरे में भी भीड़ उनके इंतजार में बैठी थी.
इसे पूरे दौरे के लिए किए गए इंतजाम भी अपने आप में बहुत कुछ कह रहे थे. रहमान 21 जनवरी को ढाका से सिलहट हवाई जहाज से पहुंचे और फिर वहां से आगे—मौलवीबाजार, हबीगंज, ब्राह्मणबाड़िया, किशोरगंज, नरसिंहड़ी और नारायणगंज की यात्रा उन्होंने सड़क मार्ग से बस में की. और, सूर्योदय से ठीक पहले ढाका के गुलशन इलाके में स्थित अपने आवास पर लौट आए.
बीएनपी नेताओं के मुताबिक, इस तरह यात्रा का निर्णय बहुत सोच-समझकर लिया गया था. पार्टी के एक आयोजक ने कहा, “ये दृश्यता, सुलभता और व्यक्तिगत उपस्थिति की क्षमता दर्शाने के लिए था. उन्हें हफ्तों लोगों से दूर रखा गया था और अंततः जब उन्हें सड़क पर उतरने का मौका मिला तो इसका स्पष्ट संकेत जाना चाहिए था.”
इतने व्यापक स्तर पर और निरंतरतापूर्ण यात्रा राजनीतिक संदेश बन गई. बांग्लादेश में बहुत ही कम राष्ट्रीय नेताओं ने आधी रात से लेकर भोर तक रैलियां निकालने की कोशिश की है. और ऐसे नेताओं की संख्या भी बहुत कम है जिनके लिए भीड़ इतनी देर तक इंतजार करती रही हो. वह जब नारायणगंज पहुंचे तो प्रचार का नियमित समय बीत जाने के काफी बाद भी समर्थक सक्रिय दिखे और पूरे उत्साह से नारे लगाते नजर आए. रहमान की उस दिन की यह आखिरी रैली रहे न केवल उनके बल्कि जनता के धैर्य को भी दर्शाती है.
इस मैराथन दौरे ने BNP के कई उद्देश्यों को साधा. इसने दर्शाया कि रहमान ऐसे नेता नहीं है जो निर्वासित जीवन जीने के कारण देश की जड़ों से कट गए हैं. साथ ही, साबित किया कि वह एक ऐसे मजबूत चुनाव प्रचारक हैं जो कुछ भी कर गुजरने का माद्दा रखते हैं. इसने वर्षों से बनी उनकी संयमित और सतर्क छवि को भी चुनौती दी. BNP के एक सूत्र ने कहा, “अब जब तारिक रहमान पूरी तरह सक्रिय हो चुके हैं तो कोई भी काम आधा-अधूरा नहीं चलेगा. प्रचार का हर दिन ऐसा ही होगा—कई रैलियां, घंटों लंबा प्रचार अभियान, कोई प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं.”
सभी सात रैलियों में रहमान ने बेहद संयमित भाषण दिया. उन्होंने जमात का नाम लिए बिना लोगों को धर्म के आधार पर लुभाने की राजनीति पर निशाना साधा और उन पार्टियों के खिलाफ आगाह किया जो “जन्नत के टिकट” का वादा करती हैं. रहमान ने इस पर जोर दिया कि आस्था को राजनीतिक गारंटी में नहीं बदला जा सकता. संकेत स्पष्ट था. उन्होंने मजहबी राजनीति से किनारा करते हुए बीएनपी और जमात के चुनाव प्रचार अभियान के बीच एक साफ लकीर खींचने की कोशिश की है, और वो भी सीधे तौर पर कोई मोर्चा खोलने से बचते हुए.
रहमान ने अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को नुकसान पहुंचाने, विकास का ढिंढोरा पीटने के साथ आर्थिक संकट उत्पन्न करने और सत्ता को अपनी जागीर समझने का आरोप लगाया. “विदेश भाग गए” या विदेशी संरक्षण पर निर्भर नेताओं का जिक्र करते हुए उन्होंने सत्ता प्रतिष्ठान को सीधे तौर पर निशाना बनाया और इसे सत्ता में स्थायित्व और जनता के बीच स्थायित्व के बीच अंतर के तौर पर सामने रखा.
रहमान ने अन्य देशों के साथ रिश्तों पर तीखी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा कि बांग्लादेश का भविष्य ढाका में तय होना चाहिए, न कि नई दिल्ली या रावलपिंडी में. किसी देश का नाम लिए बिना उन्होंने अपने राष्ट्रवाद को भारत और पाकिस्तान के विदेशी संरक्षण और परोक्ष राजनीति दोनों की अस्वीकृति के तौर पर पेश किया और जोर देकर कहा कि कोई भी पार्टी बांग्लादेश की सीमाओं से परे संप्रभुता सौंपकर वैधता का दावा नहीं कर सकती. उन्होंने नारा दिया—“न दिल्ली, न पिंडी. सबसे पहले बांग्लादेश.”
राजनीतिक हमलों के साथ-साथ रहमान ने अपना चिर-परिचित और एक निर्धारित रोडमैप भी बताया: युवाओं को रोजगार, महिलाओं की आर्थिक हिस्सेदारी, खेती में सुधार और वोटिंग के अधिकार की बहाली. समर्थकों से बार-बार सुबह से ही मतदान केंद्रों पर पहरा देने की अपील दर्शाती है कि पार्टी सिर्फ सांकेतिक भागीदारी के बजाय एक मुश्किल, कड़े मुकाबले वाले चुनाव के लिए खुद को तैयार कर रही है.
कथित दबाव और रोक-टोक की वजह से हफ्तों निष्क्रिय नजर नजर आने के बाद रहमान ने अचानक जिलों में लगातार दौरा करके न केवल प्रचार अभियान शुरू किया है बल्कि विरोधियों को राजनीतिक जवाब भी दे दिया है. जब सुबह के समय आखिरी रैली खत्म हुई और भाव-विह्वल जनता रुंधे गले के साथ अपने घर लौटने लगी तो इरादे सफल होते दिखे. संदेश स्पष्ट था—सारी बाधाएं खत्म हो चुकी हैं, रास्ता खुल गया है और चुनाव पूरी शिद्दत के साथ लड़ा जाएगा.

