30 सितंबर को कोच्चि में हुए ‘इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ’ में अमृता विश्व विद्यापीठम के अध्यक्ष स्वामी अमृतस्वरूपानंद पुरी ने ‘पीस इन ए ब्रोकन वर्ल्ड’ सत्र की शुरुआत इसी सवाल से की कि अगर दुनिया टूटी हुई है तो इसे तोड़ा किसने और क्या इसकी वारंटी अभी बाकी है? उन्होंने इसका जवाब भी दिया. दुनिया को इंसानों ने तोड़ा है और इसे ठीक भी इंसान ही कर सकते हैं.
स्वामी अमृतस्वरूपानंद पुरी ने कहा कि पूरी तरह शांति एक भ्रम है. कोई व्यक्ति, देश या राजनीतिक दल पूरी तरह सच्चा या अहिंसक नहीं हो सकता. इसलिए शांति हमेशा सापेक्ष ही रहेगी. उन्होंने कहा कि इसे भूल भी जाएं तो हर कॉन्फ्रेंस "पावरपॉइंट के साथ एक मृगतृष्णा के पीछे भाग रही है." उनका सीधा नियम था: खुद जियो और दूसरों को जीने दो.
स्वामी अमृतस्वरूपानंद पुरी ने चार युद्धों से सबक लेने की बात की- कुरुक्षेत्र, अशोक का कलिंग अभियान, ऑपरेशन सिंदूर और आज के संघर्ष. उन्होंने WARS को "Woe, Awakening, Response and Selfishness" यानी दुख, जागृति, प्रतिक्रिया और स्वार्थ के रूप में समझाया.
स्वामी अमृतस्वरूपानंद पुरी ने मई 2025 में भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर को एक संतुलित प्रतिक्रिया बताया जो पूर्ण युद्ध की स्थिति बनने से पहले रोक दिया गया. हालांकि उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम के ऐलान के साथ पीड़ित परिवारों का दुख खत्म नहीं हुआ.
शांति पर शोध करने वाले जोहान गालटुंग का हवाला देते हुए स्वामी अमृतस्वरूपानंद पुरी ने नकारात्मक शांति और सकारात्मक शांति में अंतर बताया. उनके मुताबिक नकारात्मक शांति का मतलब बंदूकें शांत होना है, जबकि सकारात्मक शांति में न्याय और सम्मान की मौजूदगी जरूरी है.
इसके बाद उन्होंने ध्यान घरेलू स्तर पर होने वाले संघर्षों की ओर दिलाया. जातिगत भेदभाव, महिलाओं के खिलाफ हिंसा, गुस्से को बढ़ाने वाला टेलीविजन और सोशल मीडिया पर गलत जानकारी भी समाज में संघर्ष को बढ़ावा देती है.
स्वामी अमृतस्वरूपानंद पुरी ने बताया कि 2025 में दुनिया का सैन्य खर्च करीब 2.9 ट्रिलियन डॉलर रहा, जबकि उसी साल वैश्विक विकास सहायता में 23 फीसदी की गिरावट आई. देशों के लिए उन्होंने शांति के कुछ रास्ते सुझाए- बातचीत जारी रखें, समझौतों को लागू करें, दोबारा निर्माण करें, संघर्ष के मोर्चे पर काम कर रहे स्वयंसेवकों की सुरक्षा करें और करुणा के साथ न्याय की कोशिश करें.
व्यक्तियों के लिए उन्होंने कहा कि किसी संघर्ष से जुड़ी कोई भी जानकारी आगे भेजने से पहले तीन सवाल पूछने चाहिए. क्या यह सच है? क्या यह निष्पक्ष है? क्या इससे लोगों को एक-दूसरे को समझने में मदद मिलेगी?
स्वामी अमृतस्वरूपानंद पुरी ने जापान की पारंपरिक कला किंत्सुगी का उदाहरण देते हुए अपनी बात खत्म की. उन्होंने कहा कि दुनिया में आई दरारों को करुणा के सोने से भरने की जरूरत है.
सत्र की खास बातें | स्वामी अमृतस्वरूपानंद पुरी
- "जब मैंने पहली बार इस सत्र का शीर्षक देखा तो मेरा पहला सवाल था: इसे तोड़ा किसने? और क्या इसकी वारंटी अभी बाकी है? दुर्भाग्य से वारंटी पाषाण युग के आसपास ही खत्म हो गई और कोई कस्टमर केयर नंबर भी नहीं है."
- "सकारात्मक शांति के बिना नकारात्मक शांति ऐसी है जैसे प्रेशर कुकर की सीटी बंद हो. कुछ समय तक सब शांत रहता है और फिर रसोई में मौजूद हर व्यक्ति को इसका पता एक साथ चलता है."
- "कभी-कभी मुझे लगता है कि अगर अचानक शांति कायम हो जाए तो कुछ न्यूज चैनलों को कंटेंट की कमी के कारण बंद करना पड़ेगा."
- "हममें से हर व्यक्ति अपनी जेब में बड़े पैमाने पर ध्यान भटकाने वाला एक हथियार लेकर चलता है. इसका इस्तेमाल संदेह फैलाने के लिए भी हो सकता है और समझ बढ़ाने के लिए भी."
- "जो व्यक्ति भीतर से संघर्ष में है, वह आखिरकार बाहर किसी न किसी से लड़ने लगेगा."

