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तेज आवाज से भारत में हर साल हजारों लोगों की मौत! शोर कैसे करता है बीमार?

शोर के कारण ब्लड प्रेशर, एंजाइटी, अनिंद्रा जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं और कई बार यह मौत की वजह भी बन रहा है

शहरों में शोर बन रहा जानलेवा
शहरों में शोर बन रहा जानलेवा
अपडेटेड 20 अप्रैल , 2026

दुनिया के मशहूर इलेक्ट्रिकल इंजीनियर और वैज्ञानिक निकोला टेस्ला कहते थे, "अगर ब्रह्मांड को समझना है तो उसे ऊर्जा, फ्रीक्वेंसी और कंपन से समझो. प्रकाश, ध्वनि, वस्तु, विचार किसी भी चीज को समझना है, तो हमें उसकी फ्रीक्वेंसी को समझना चाहिए."

इस फ्रीक्वेंसी का कम या ज्यादा होना, आवाज का कम या ज्यादा होना है. इससे सीधे-सीधे हमारी जिंदगी पर असर पड़ता है. असर इतना कि उसकी कीमत लोगों को जान देकर भी चुकानी पड़ सकती है.

इस बात को समझने के लिए तीन साल पहले की एक घटना का जिक्र करना जरूरी है. 4 मार्च 2023 को बिहार के सीतामढ़ी निवासी 22 वर्षीय सुरेंद्र कुमार की शादी हो रही थी. लेकिन मंच पर वरमाला पहनने के ठीक बाद उनकी मौत हो गई. सुरेंद्र के परिवार वालों ने बताया कि वरमाला समारोह में बज रहे DJ के तेज संगीत से असहज महसूस करने के बाद वे अचानक मंच पर गिर पड़े थे.

बाद में डॉक्टरों ने बताया सुरेंद्र की मौत हार्ट अटैक से हुई थी और उन्होंने अंदेशा जताया था कि दिल की धड़कन DJ के तेज शोर की वजह से अनियमित हुईं फिर अचानक थम गईं. इसी तरह 25 नवंबर 2022 को वाराणसी के पिपलानी कटरा में एक शादी समारोह में नाचते समय एक व्यक्ति की दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई.

ये दो मौत की घटना महज बानगी हैं. इस तरह हर साल सैकड़ों लोगों को शोर या तेज आवाज के कारण हार्ट अटैक आता है. इनमें से कई की मौत हो जाती है तो कई सालों तक अस्पताल के चक्कर लगाते हैं.

लखनऊ स्थित मेडिकल कॉलेज और अस्पताल KGMU ने अपनी रिसर्च में पाया है कि लंबे समय तक तेज आवाज वाली जगहों पर रहने से इंसान के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंच सकता है. इतना ही नहीं ब्लड प्रेशर गंभीर रूप से बढ़ सकता है. इसके कारण डिप्रेशन और कम नींद आने की भी समस्या हो सकती है.

दरअसल, दिसंबर 2025 में संस्थान के रिसर्चर ने 300 ड्राइवरों पर अध्ययन किया. इनमें 150 ऑटो चालक दिन भर ज्यादा ट्रैफिक शोर वाले क्षेत्र में गाड़ी चलाते थे. जबकि सर्वे में शामिल 150 कार ड्राइवर गाड़ी बंद होने या कम ट्रैफिक क्षेत्र में गाड़ी चलाने के कारण कम शोर के संपर्क में थे.

रिसर्च के दौरान इन लोगों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की जांच की गई. ऑटो चालकों में से 39.3 फीसद में मध्यम एंजायटी की समस्या और 13.3 फीसद में गंभीर एंजायटी की समस्या पाई गई. इसके अलावा, 42 फीसद ऑटो चालकों में मध्यम डिप्रेशन और 12 फीसद में गंभीर डिप्रेशन के लक्षण दिखे.

इसके विपरीत, आधे से अधिक कार ड्राइवरों में डिप्रेशन के कोई लक्षण नहीं दिखे और उनमें से कोई भी गंभीर डिप्रेशन से पीड़ित नहीं था. KGMU के सामुदायिक चिकित्सा विभाग के प्रोफेसर मनीष कुमार मनार ने कहा, "हमारे अध्ययन से पता चलता है कि ध्वनि प्रदूषण न केवल कानों को बल्कि मस्तिष्क, हृदय और भावनात्मक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है. ये परिणाम लगातार यातायात के शोर और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बीच एक मजबूत संबंध दर्शाते हैं."

ऑटो के अंदर शोर का स्तर 84-86 डेसिबल दर्ज किया गया, जबकि कारों के अंदर यह लगभग 74 डेसिबल होता है. डेसिबल ध्वनि मापने की इकाई है, जिसे dB से संक्षिप्त किया जाता है. 70 dB या उससे कम की ध्वनि सुनने के लिए सुरक्षित मानी जाती है.

विशेषज्ञों के मुताबिक लंबे समय तक शोर के संपर्क में रहने पर 10 डेसिबल की वृद्धि भी हानिकारक प्रभाव को दोगुना कर सकती है. ऑटो चालकों में सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर ज्यादा पाया गया. बता दें कि सिस्टोलिक संख्या आपके दिल की धड़कन के दौरान आपकी धमनियों में दबाव को मापती है.

रिसर्चर ने चेतावनी दी कि लंबे समय तक शोर से होने वाला तनाव हृदय रोगों का खतरा बढ़ा सकता है. कई टेम्पो चालकों ने पीठ दर्द, सिरदर्द, बदन दर्द और सांस फूलने की शिकायत भी की, जो शारीरिक तनाव को दर्शाता है. इस रिसर्च से जाहिर होता है कि तेज आवाज के कारण ब्लड प्रेशर बढ़ने से हार्ट अटैक जैसी समस्या हो सकती है.

एक अंग्रेजी अखबार से बातचीत में PGI चंडीगढ़ के डॉ. रविंद्र खैवाल बताते हैं कि तेज शोर से शरीर में तनाव हार्मोन (कोर्टिसोल और एड्रेनालिन) निकलते हैं. इससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है, दिल पर बोझ पड़ता है, नींद खराब होती है और लंबे समय में हृदय रोग, स्ट्रोक और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है.

भारत में ध्वनि प्रदूषण की क्या स्थिति है?

भारत के कई शहरों में ध्वनि प्रदूषण मापने के लिए यंत्र लगे हैं, लेकिन ये नाम मात्र के ही हैं. ध्वनि प्रदूषण को लेकर खबरें या रिपोर्ट भी कम ही सामने आती हैं. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की एक रिपोर्ट 2022 में जारी हुई थी, जिसमें ध्वनि प्रदूषण के मामले में मुरादाबाद को दुनिया का दूसरा सबसे प्रदूषित शहर बताया गया था. मुरादाबाद में ध्वनि स्तर 114 डेसिबल दर्ज किया गया, जबकि दिल्ली में ध्वनि स्तर 83 डेसिबल और कोलकाता में 89 डेसिबल पाया गया.

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में ध्वनि प्रदूषण के मामले में इस साल टॉप पर था, जहां ध्वनि प्रदूषण स्तर 119 डेसिबल दर्ज किया गया था. इन तीन-चार सालों में ध्वनि प्रदूषण को लेकर देश के किसी भी शहर में कोई बड़े कदम नहीं उठाए गए हैं. जबकि कंपनियों, गाड़ियों, निर्माणों की संख्या हर रोज बढ़ रही है. ऐसे में साफ है ध्वनि प्रदूषण के मामले में अब भी भारतीय शहरों की स्थिति में कोई खास सुधार शायद ही आया हो.

विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक 70 डेसिबल से अधिक का शोर के करीब रहने से सुनने की क्षमता खोने का खतरा बढ़ जाता है. भारत सरकार के सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के मुताबिक, आवासीय क्षेत्रों में दिन के समय में सुनने के लिए ध्वनि स्तर 55 डेसिबल सही होता है, जबकि रात के समय 45 डेसिबल तक होना चाहिए.

इसी तरह, व्यवसायिक क्षेत्रों में दिन के समय अधिकतम ध्वनि स्तर 65 डेसिबल और रात के समय 55 डेसिबल होना चाहिए. जबकि, इंडस्ट्रीयल क्षेत्रों में दिन के समय यह 75 डेसिबल और रात के समय 70 डेसिबल तक होना चाहिए.

दिल्ली जैसे शहरों में ध्वनि प्रदूषण कितना खतरनाक है?

मेडिकल की पढ़ाई और रिसर्च करने वाली संस्था CME इंडिया के मुताबिक, सालाना ध्वनि प्रदूषण के कारण 12 हजार से ज्यादा लोग मरते हैं. इनमें ज्यादातर संख्या शहरों में रहने वाले लोगों की है. जहां तक दिल्ली की बात है तो CME के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति शोर और वायु प्रदूषण दोनों के संपर्क में है, तो इसके परिणाम और बुरे हो सकते हैं. इसके कारण धमनियों में सूजन और हार्ट संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानक के मुताबिक, सड़क के ट्रैफिक शोर का दिन-शाम-रात का औसत (Lden) 53 डेसिबल से ज्यादा नहीं होना चाहिए. इससे ज्यादा होने पर यह सेहत को नुकसान पहुंचाने लगता है. अगर मान लें कि दिल्ली काफी व्यस्त और व्यवसायिक क्षेत्र है, तो भी दिन के समय अधिकतम ध्वनि स्तर 65 डेसिबल होना चाहिए. जबकि दिल्ली में औसतन यह 83 डेसिबल है.

इसका मतलब है कि व्यवसायिक क्षेत्र में ध्वनि प्रदूषण मानक से भी 18 डेसिबल ज्यादा. CME की रिपोर्ट मुताबिक, मध्यम आयुवर्ग के लोगों के लिए सड़क यातायात शोर में 10 डेसिबल की वृद्धि से सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर में काफी ज्यादा वृद्धि हो सकती है. यूरोपीय देशों में की गई रिसर्च में पाया गया है कि दिन के 16 घंटे यानी सुबह 7 से रात के 11 बजे तक के दौरान वार्षिक ध्वनि स्तर अगर औसतन 10 डेसिबल ज्यादा रहता है तो इससे आपके पल्स रेट में p

ऐसे में साफ है कि दिल्ली जैसे शहरों में ध्वनि प्रदूषण गंभीर रूप ले चुका है. इसके बावजूद यहां वायु प्रदूषण की बात तो थोड़ी बहुत हो भी जाती है, लेकिन ध्वनि प्रदूषण की बात कोई नहीं करता. परिणाम यह है कि दिल्ली के छात्रों में मुंबई के छात्रों से ज्यादा डिप्रेशन के मामले मिले हैं.

आंध्र प्रदेश की SRM यूनिवर्सिटी के किए गए एक मल्टी-सिटी अध्ययन में यह चिंताजनक तस्वीर सामने आई है. जुलाई से नवंबर 2023 के बीच किए गए इस सर्वे में देश के 8 टियर-1 शहरों दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, बेंगलुरु, पुणे, अहमदाबाद और कोलकाता के 1,628 छात्रों (उम्र 18–29 वर्ष) को शामिल किया गया. सर्वे के अनुसार, करीब 70 फीसद छात्र एंजायटी और 60 फीसद से ज्यादा डिप्रेशन से जूझ रहे हैं. इनमें दिल्ली के छात्रों में सबसे ज्यादा यह समस्या देखी गई है.

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