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सिक्किम के CM की भावुक अपील ने कैसे पूर्वोत्तर के साथ नस्लीय भेदभाव की असलियत याद दिलाई?

पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव न तो नया है और न ही अचानक हो रहा है. भेदभाव की ये भावनाएं अब सामान्य हो चुकी हैं और रोजमर्रा के सामाजिक व्यवहार में गहराई से समाई हुई हैं.

सिक्किम CM प्रेम सिंह तमांग (फाइल फोटो)
सिक्किम CM प्रेम सिंह तमांग (फाइल फोटो)
अपडेटेड 26 फ़रवरी , 2026

दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश के छात्रों के साथ कथित नस्लीय दुर्व्यवहार की घटना पर 24 फरवरी को सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग ने फेसबुक पोस्ट के जरिए प्रतिक्रिया दी. उन्होंने मुद्दे पर ज्यादा घुमाव-फिराव के बिना स्पष्ट और साफ संदेश देने की कोशिश की.

तमांग ने दिल्ली के मालवीय नगर में हुई घटना को 'चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण' बताया. साथ ही इस बात पर जोर दिया कि पूर्वोत्तर भारत राष्ट्र का अभिन्न अंग है. उन्होंने देश के अन्य हिस्सों के लोगों को साथी नागरिकों की गरिमा, समानता और पारस्परिक सम्मान के बुनियादी सिद्धांतों की याद दिलाई.  

मुख्यमंत्री ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा, "नई दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश की महिलाओं के साथ हुई नस्लीय भेदभाव की हालिया घटना चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है. ऐसी घटनाएं हमें हर समय गरिमा और आपसी सम्मान बनाए रखने के महत्व की याद दिलाती हैं."

उन्होंने आगे कहा, "पूर्वोत्तर हमारे राष्ट्र का अभिन्न अंग है और प्रत्येक नागरिक गरिमा, समानता और सम्मान का हकदार है. आइए हम एक-दूसरे के प्रति सचेत रहें और समझ, गरिमा तथा पारस्परिक सम्मान पर आधारित समाज के निर्माण के लिए निरंतर प्रयास करते रहें."

इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर पूर्वोत्तर के एक नेता की यह संयमित अपील अपने आप में बहुत कुछ कहती है. पूर्वोत्तर के नेताओं ने दशकों से यह सीखा है कि भारत की मुख्य भूमि में आक्रोश का उतना प्रभाव नहीं पड़ता, जितना अंतरात्मा की पुकार वाली विनम्र अपीलों का. फिर भी, पूर्वोत्तर के लोगों के साथ बार-बार घटने वाली ऐसी घटनाएं संकेत देती हैं कि केवल अंतरात्मा की आवाज अब पर्याप्त नहीं रह गई है.

भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के लोगों के प्रति नस्लवाद न तो नया है और न ही अचानक हो रहा है. यह अब सामान्य हो चुका है और रोजमर्रा के सामाजिक व्यवहार में गहराई से समाया हुआ है. पूर्वोत्तर के भारतीयों को अक्सर विदेशी समझ लिया जाता है, उन्हें 'चीनी' कहकर ताना दिया जाता है, शारीरिक बनावट के आधार पर अपशब्द कहे जाते हैं, और भारतीय शहरों में सालों तक रहने के बावजूद उन्हें हमेशा 'बाहरी' ही माना जाता है.

दिल्ली जैसे शहरों में पूर्वोत्तर की महिलाओं को बाकी महिलाओं की तुलना में अतिरिक्त असुरक्षा और डर का सामना करना पड़ता है, क्योंकि नस्लीय भेदभाव अक्सर यौन उत्पीड़न और मोरल पुलिसिंग में बदल जाता है. मालवीय नगर जैसी घटनाएं इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनकी वजह बहुत मामूली होती है. धूल, शोर, पार्किंग या पानी जैसे विवाद भारत के शहरों में रोजाना होते हैं. ये विवाद शायद ही कभी हिंसा या नस्लीय गाली-गलौज में बदलते हैं, जब तक पीड़ित व्यक्ति 'स्पष्ट रूप से अलग' न दिखे.

मालवीय नगर में धूल को लेकर हुई बहस का नस्लीय गाली-गलौज में बदलना दिखाता है कि ये पूर्वाग्रह कितने गहरे तक समाए हुए हैं. इन घटनाओं को गौर से देखने पर अंदाजा लगता है कि यहां नस्लवाद का भौगोलिक पहलू भी अहम भूमिका निभा रहा है. दिल्ली की पहचान महानगर और वैश्विक शहर के रूप में होती है, इसके बावजूद लंबे समय से इस शहर में पूर्वोत्तर के प्रवासी लोगों के लिए रहना आसान और सुरक्षित नहीं है.

2014 में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश के छात्र नीडो तानिया की हत्या और पिछले दिसंबर देहरादून में त्रिपुरा के छात्र अंजेल चकमा की हत्या, पूर्वोत्तर के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव के हालिया उदाहरण हैं. पूर्वोत्तर के छात्रों और श्रमिकों की बड़ी संख्या इन शहरों में होने के बावजूद उनके प्रति लोगों के रवैये में कोई नरमी नहीं आई है, बल्कि कई मामलों में हालात और ज्यादा खराब हुए हैं.

समस्या की एक वजह लोगों की अज्ञानता है, लेकिन उससे भी बड़ी वजह सालों से पूर्वोत्तर के लोगों को लेकर एक जैसी सोच का चले आना है. पूर्वोत्तर सांस्कृतिक रूप से तो अनोखा है, लेकिन राजनीतिक रूप से हाशिए पर है. स्कूली पाठ्यपुस्तकों में इसके इतिहास को नजरअंदाज कर दिया जाता है. देश की लोकप्रिय मीडिया भी इस क्षेत्र को केवल विद्रोह तक सीमित कर देता है.

आम बोलचाल में पूर्वोत्तर की एक सपाट पहचान बन जाती है, जो राज्यों, समुदायों और संस्कृतियों के बीच के अंतर को मिटाकर अमानवीकरण को आसान बना देती है. इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कानूनी उपाय मौजूद हैं. लेकिन, हर बड़ी घटना के बाद सलाहकार समितियां, हेल्पलाइन और विशेष पुलिस इकाइयां बना दी जाती हैं.

यहां तक कि केंद्र सरकार ने 2001 में उत्तर पूर्वी क्षेत्र के विकास मंत्रालय की स्थापना की, ताकि इस क्षेत्र के विकास पर ध्यान केंद्रित किया जा सके, जिसके महत्व पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार जोर दिया है. फिर भी, जैसा कि मालवीय नगर की घटना से पता चलता है, नीति और वास्तविकता के बीच का अंतर अभी भी बहुत बड़ा है. पीड़ित अब भी आरोपी पक्ष के जरिए बदला लिए जाने या अनदेखी के डर से दुर्व्यवहार की रिपोर्ट करने में हिचकिचाते हैं. पुलिस की प्रतिक्रियाएं बेहद गंभीर नहीं होती हैं. अक्सर ऐसे मामलों को नस्लीय हिंसा की अभिव्यक्ति के बजाय मामूली मोहल्ले के झगड़े के रूप में देखा जाता है.

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