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सुप्रीम कोर्ट ने POCSO कानून में 'रोमियो-जूलियट' क्लॉज जोड़ने का सुझाव क्यों दिया?

भारत सरकार सहमति की उम्र 18 वर्ष पर अडिग है. POCSO अधिनियम 2012 के मुताबिक इस उम्र से पहले सहमति या असहमति से यौन संबंध बनाना अपराध है

सुप्रीम कोर्ट ने POCSO कानून में 'रोमियो-जूलियट' क्लॉज जोड़ने की बात कही
सुप्रीम कोर्ट ने POCSO कानून में 'रोमियो-जूलियट' क्लॉज जोड़ने की बात कही
अपडेटेड 13 फ़रवरी , 2026

बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को बाल यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO अधिनियम) में 'रोमियो-जूलियट' क्लॉज को जोड़ने का सुझाव दिया है. अदालत के इस सुझाव ने इस संवेदनशील मद्दे पर कानूनी बहसों को एक बार फिर से हवा दे दी है.

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बाल यौन शोषण से निपटने के लिए बनाए गए कानून के तहत किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों को अपराध घोषित किया जाना चाहिए? इसका उद्देश्य कुछ मामलों में 18 से कम उम्र के किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को अपराधीकरण से बचाना है.

इस महीने राजस्थान उच्च न्यायालय ने 17 वर्षीय लड़की के परिवार के जरिए 19 वर्षीय युवक के खिलाफ दर्ज POCSO की FIR को रद्द करने का फैसला सुनाया था. इसके बाद से ही यह बहस तेज हो गई. राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अनिल कुमार उपमान ने स्वैच्छिक संबंध के साक्ष्यों का हवाला देते हुए चेतावनी दी थी कि इस तरह के मामलों में POCSO को बिना कुछ सोचे-समझे लागू नहीं किया जाना चाहिए. खासकर उन मामलों में जहां ये साफ हो कि मामला शोषण के बजाय किशोर प्रेम से जुड़ा है.

अदालत ने पाया कि कठोर कानून किशोरों की वास्तविकताओं की अनदेखी करता है. इसलिए अदालत ने निकट आयु वर्ग के नाबालिगों के बीच सहमति से बने संबंधों के लिए विधायी छूट की सिफारिश की है. यह आदेश 9 जनवरी को दिए गए उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनुराध (2026) मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले के बाद आया है. न्यायमूर्ति संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने पाया कि अंतर-जातीय, अंतर-धार्मिक या सामाजिक रूप से अस्वीकृत संबंधों को रोकने के लिए कई परिवार POCSO कानून का सहारा लेते हैं. साथ ही अदालत ने POCSO के दुरुपयोग के एक पैटर्न को उजागर किया.

अदालत ने आयु संबंधी फर्जी रिकॉर्ड, स्कूली दस्तावेजों की अनदेखी और यहां तक ​​कि युवा दंपतियों पर दबाव डालने के लिए अनिवार्य रिपोर्टिंग प्रावधानों का इस्तेमाल करने के मामलों पर ध्यान दिया. कोर्ट का कहना है कि किशोरों के बीच वास्तविक संबंधों का भी अपराधीकरण किया जा रहा है.

अदालत ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए संसद से आग्रह किया कि वह POCSO कानून में 'रोमियो-जूलियट' क्लॉज को जोड़ने पर विचार करें. कई पश्चिमी देशों में उम्र सीमा के करीब अंतर वाले मामलों को अपवाद की तरह देखा जाता है. इस तरह के मामलों में नाबालिगों या कम आयु अंतर वाले किशोरों के बीच सहमति से बनाए गए संबंधों को अपवाद मानकर कानूनी तौर पर संरक्षण प्रदान किया जाता है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नीतिगत विचार-विमर्श के लिए केंद्रीय विधि सचिव को अपना आदेश भेजा. साथ ही यह दोहराया कि इस कानून का मुख्य मकसद बच्चों को यौन अपराधियों से बचाना है और यह अपरिवर्तनीय है. अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उन दिशानिर्देशों को भी रद्द कर दिया, जिनमें सभी जमानत मामलों में उम्र पता करने के लिए अस्थि-परीक्षण को अनिवार्य किया था. सुप्रीम कोर्ट ने इसे न्यायिक अतिक्रमण बताया है. साथ ही कहा कि किसी इंसान का आयु निर्धारण किशोर न्याय अधिनियम की धारा 94 के तहत वैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए किया जाना चाहिए.

न्यायिक आदेश के पीछे के आंकड़े बताते हैं कि यह चिंता अचानक उत्पन्न नहीं हुई है. दशकों से अविवाहित महिलाओं और किशोरियों के अपहरण/लापता होने के अधिकांश मामले भागकर शादी करने के ही निकले हैं. यहां तक ​​कि जिन मामलों में पुरुष अपनी पत्नियों के अपहरण या लापता होने की FIR दर्ज कराते हैं, उनमें भी अधिकतर आपसी सहमति से भागकर शादी करने का मामला सामने आता है.

राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (NCRB) के जरिए सर्वोच्च न्यायालय के सामने पेश किए गए आंकड़ों से चिंताजनक रुझान सामने आए हैं. 2018 से 2022 के बीच, 16-18 वर्ष की आयु के 6,892 किशोरों को POCSO के तहत गिरफ्तार किया गया. साथ ही भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत बलात्कार के प्रावधानों के अंतर्गत 4,924 किशोरों पर मामले दर्ज किए गए, जिससे अभियोजित किशोरों की कुल संख्या 11,816 हो गई. इस अवधि के दौरान केवल 1,323 मामलों में ही दोषसिद्धि हुई, जो करीब 11 फीसद है.

18-22 वर्ष की आयु के युवाओं मेंइसी अवधि में 76,777 गिरफ्तारियां दर्ज की गईं—जिनमें से 68.4 फीसद POCSO के तहत थीं. कई राज्यों में दोषसिद्धि-से-बरी होने का अनुपात 0.4 से नीचे गिर गया और अक्सर मुकदमा करने वाले के जरिए यह गवाही देने के बाद बरी किया गया कि संबंध सहमति से था.

POCSO के फैसलों के 2022 के विश्लेषण में पाया गया कि 22.9 फीसद मामलों में आरोपी पहले से ही परिचित थे. 18 फीसद मामले पूर्व प्रेम संबंधों से जुड़े मामलों के रूप में सामने आया. राष्ट्रीय स्तर पर दोषसिद्धि दर लगभग 14 फीसद रही, जबकि पश्चिम बंगाल जैसे कुछ राज्यों में बरी होने की दर 50 फीसद से अधिक थी. 2024 की समीक्षा में अध्ययन किए गए 63.1 फीसद बरी होने के मामलों में अदालतों ने स्पष्ट रूप से सहमति की उपस्थिति का जिक्र किया.

बाल अधिकार केंद्र के जरिए 7,000 से अधिक मामलों की जांच करने वाले एक रिसर्च के बाद अनुमान लगाया गया कि लगभग एक चौथाई बाल यौन शोषण (POCSO) के मामले प्रेम संबंधों से जुड़े थे. असम, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में किए गए गंभीर यौन उत्पीड़न के मामलों के एनफोल्ड प्रोजेक्ट 39A अध्ययन में पाया गया कि 25.4 फीसद मामलों में किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने संबंध शामिल थे.

प्रेम संबंधों से जुड़े 82 फीसद मामलों में लड़की ने आरोपी के खिलाफ गवाही देने से इनकार कर दिया था. अत्यधिक लंबित मामलों से जूझ रहे न्यायाधीशों और लंबे कारावास से प्रभावित युवाओं के लिए इन आंकड़ों ने सुधार की मांगों को और भी तेज कर दिया है.

भारत में सहमति की आयु सीमा में नाटकीय परिवर्तन आया है. 1860 के IPC के तहत यह 10 वर्ष थी, जो बाद में 1891 में 12, 1925 में 14 और 1949 में 16 हो गई. 2012 के POCSO अधिनियम ने एक निर्णायक बदलाव किया, जिसमें 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को "बच्चा" माना गया और उनकी सहमति कानूनी रूप से अप्रासंगिक हो गई.

आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 ने IPC की धारा 375 को इस मानक के अनुरूप कर दिया और सहमति की आयु सीमा को बढ़ाकर 18 वर्ष कर दिया. भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 इसी स्थिति को बरकरार रखती है. इससे 16 और 18 वर्ष के बीच की पहले की "अस्पष्टता" दूर हो गई. पहले, सहमति की आयु 16 वर्ष थी, जबकि नाबालिग होने की आयु 18 वर्ष थी, जिससे माता-पिता को सहमति से बने संबंधों के मामलों में भी अपहरण या वैधानिक बलात्कार के प्रावधानों का सहारा लेने की अनुमति मिल जाती थी.

2013 के संशोधनों ने एक सख्त नियम अपनाकर इस अस्पष्टता को दूर करने का प्रयास किया. यह नियम नाबालिग पत्नी को भी दायरे में लाता है. POCSO अधिनियम की धारा 19 किसी भी संदिग्ध अपराध की अनिवार्य रिपोर्टिंग का प्रावधान करती है, जिससे पुलिस स्तर पर विवेकाधिकार की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है.

न्यायपालिका का संदेश थोड़ा जटिल है. ऐसा इसलिए क्योंकि कानून के जरिए बाध्य होने के बावजूद न्यायाधीश संकेत दे रहे हैं कि किशोरों से जुड़े मामलों में वर्तमान ढांचा और व्यापक हो सकता है. जबकि संसद ने सहमति की आयु कम करने का लगातार विरोध किया है, अदालतों ने व्यक्तिगत मामलों में अधिकाधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना शुरू कर दिया है.

स्टेट बनाम हितेश (2025) मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि किशोर प्रेम को अधिकारों के परिप्रेक्ष्य से देखा जाना चाहिए. शोषण तथा सहमति से बने संबंधों के बीच अंतर करना आवश्यक है. बॉम्बे उच्च न्यायालय ने आशिक रामजय अंसारी बनाम महाराष्ट्र राज्य (2023) मामले में यौन स्वायत्तता को सहमति से गतिविधि में संलग्न होने के अधिकार और संरक्षण के अधिकार दोनों को समाहित करने के रूप में मान्यता दी.

सुप्रीम कोर्ट में 2025 की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने टिप्पणी की कि बालिग होने की कगार पर खड़ी किशोरियों से जुड़े "प्रेमी मामलों" को आपराधिक शोषण के बराबर नहीं माना जाना चाहिए. न्यायाधीश ने कहा, "जरा सोचिए, अगर कोई लड़की किसी लड़के से प्यार करती है और उसके माता-पिता के जरिए POCSO का मामला दर्ज कराने के कारण उसे जेल भेज दिया जाता है, तो उस लड़की को कितना सदमा लगता है."

फिर भी न्यायिक असंगति बनी हुई है, क्योंकि अदालतें कई बार इस कानून को बरकरार रखती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि अगर पीड़िता 18 वर्ष से कम आयु की है तो सहमति कानूनी रूप से अप्रासंगिक है. अगस्त 2024 में, सर्वोच्च न्यायालय ने 14 वर्षीय लड़की से जुड़े यौन उत्पीड़न के मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय के जरिए बरी करने के फैसले को पलट दिया था. नाबालिग की सहमति को मान्यता देने पर वैधानिक रोक की पुष्टि की थी. हालांकि, अदालत ने कानूनी प्रक्रिया के दौरान लड़की की पीड़ा का हवाला देते हुए सजा न सुनाने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत दी गई शक्तियों का प्रयोग किया. अदालत ने साफ किया कि इस फैसले को मिसाल के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए.

18 वर्ष की आयु सीमा बच्चों के लिए जानबूझकर बनाया गया कवच क्यों है?

केंद्र सरकार ने इस मामले में किसी भी प्रकार की ढील का स्पष्ट विरोध किया है. फरवरी 2026 में लोकसभा में दिए गए एक जवाब में महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने जोर देकर कहा कि 18 वर्ष की आयु सीमा बच्चों के लिए एक "जानबूझकर बनाया गया कवच" है. उन्होंने चेतावनी दी कि इसे कम करने से तस्करों और दुर्व्यवहार करने वालों को आपसी सहमति से हुए प्रेम प्रसंग के रूप में शोषण को छिपाने का मौका मिल सकता है.

संसदीय स्थायी समितियों ने भी इसी रुख का समर्थन किया है. POCSO विधेयक पर 240वीं रिपोर्ट (2011) ने नाबालिगों की सहमति को मान्यता देने से इनकार कर दिया. 167वीं रिपोर्ट (2012) ने आयु सीमा को बढ़ाकर 18 करने का समर्थन किया और निकट आयु के आधार पर छूट देने का विरोध किया. विधि आयोग की 283वीं रिपोर्ट (2023) ने चेतावनी दी कि आयु सीमा कम करने से POCSO एक कागजी कानून बनकर रह जाएगा, जिससे बाल विवाह और तस्करी के खिलाफ किए जा रहे प्रयासों को नुकसान पहुंचेगा.

सुधार के विरोधियों का तर्क है कि कम उम्र के किशोरों में अक्सर भावनात्मक और तंत्रिका संबंधी मैच्योरिटी की कमी होती है. वे चेतावनी देते हैं कि अपवादों को लागू करने से ऐसे लूपहोल खुल सकते हैं जिन पर बाल शोषण से जूझ रहे देश में नियंत्रण करना मुश्किल होगा. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के 2007 के अध्ययन में पाया गया कि बाल यौन शोषण के आधे से अधिक अपराधी पीड़ित के परिचित थे—परिवार के सदस्य, पड़ोसी, शिक्षक. ऐसे मामलों में सहमति के दावे जबरदस्ती को छिपा सकते हैं.

'रोमियो-जूलियट' प्रावधान के समर्थक ब्रिटेन और कनाडा जैसे न्यायक्षेत्रों का हवाला देते हैं, जहां सहमति की आयु 16 वर्ष है. साथ ही सीमित आयु अंतर वाले साथियों की सुरक्षा के लिए आयु सीमा में निकट के अंतर वाले अपवाद भी मौजूद हैं. इन ढांचों का उद्देश्य किशोर अवस्था के यौन शोषण और किशोर संबंधों के बीच अंतर करना है.

उनका तर्क है कि भारत की वर्तमान व्यवस्था किशोरों के सामान्य व्यवहार को अपराध मानती है, खासकर डिजिटल युग में जहां रिश्ते पारंपरिक सामाजिक सीमाओं से परे बनते हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (2015-16) के आंकड़ों से पता चलता है कि 20-24 वर्ष की आयु की 39 फीसद महिलाओं ने 18 वर्ष की आयु से पहले अपने पहले यौन अनुभव की जानकारी दी. इससे यह संकेत मिलता है कि किशोरावस्था में यौनता असामान्य नहीं है.

कानूनी दुविधा का दौर

अदालत के आदेश के समर्थकों के लिए यह मुद्दा बाल संरक्षण को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे पुनर्व्यवस्थित करना है. वे कुछ सीमित छूटों का प्रस्ताव रखते हैं—उदाहरण के लिए, दो या तीन साल का आयु अंतर—साथ ही जबरदस्ती, सत्ता के दुरुपयोग या तस्करी के लिए सख्त दंड का प्रावधान.

फिलहाल इसको लेकर संसद में कोई संशोधन विधेयक नहीं है, लेकिन राजस्थान से लेकर दिल्ली और सर्वोच्च न्यायालय तक, न्यायिक हस्तक्षेप लगातार बढ़ रहे हैं. तनाव स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है. अदालतें किशोरों के रिश्तों की वास्तविकताओं का सामना कर रही हैं कि कार्यपालिका एक अडिग वैधानिक सुरक्षा कवच की रक्षा कर रही है.

मूल रूप से, यह बहस इस बात की पड़ताल करती है कि क्या बाल संरक्षण कानून अपनी निवारक शक्ति से समझौता किए बिना विकसित हो सकता है. क्या कानून को 17 वर्षीय लड़की के अपने 19 वर्षीय प्रेमी के साथ भाग जाने को उसी तरह मानना ​​चाहिए जैसे 40 वर्षीय यौन अपराधी के जरिए बच्चे का शोषण करने को? या क्या अपवाद बनाने से रोमांस की आड़ में शोषण को सामान्य बनाने का खतरा है?

फिलहाल, न्यायाधीश हर मामले में अलग-अलग निर्णय ले रहे हैं—जमानत दे रहे हैं या फिर FIR रद्द कर रहे हैं. सजा को नरम करने के लिए संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग कर रहे हैं या फिर आरोपी को दंडित कर रहे हैं. हालांकि, इसपर अंतिम निर्णय संसद का है. तब तक, भारत के किशोर एक कानूनी विरोधाभास में फंसे हुए हैं. रिश्ते बनाने की उम्र तो है, लेकिन कानून की नजर में सहमति देने की उम्र नहीं है.

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