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हिंदुत्व के मैदान में बीजेपी को चुनौती देने की तैयारी में सपा?

पीडीए की राजनीति के साथ अब सपा राम मंदिर और सनातन के मुद्दों को भी अपनी रणनीति का हिस्सा बना रही है. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी का सियासी दायरा और संदेश दोनों बदलते दिखाई दे रहे हैं

Akhilesh Yadav, Yogi Adityanath
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)
अपडेटेड 30 जुलाई , 2026

संसद परिसर में 29 जुलाई को समाजवादी पार्टी के सांसदों के हाथों में स्टील का एक 'दान पात्र' था. उसके चारों ओर अखिलेश यादव, डिंपल यादव और पार्टी के अन्य सांसद खड़े थे. वे प्रतीकात्मक रूप से दूसरे सांसदों से 'दान' मांग रहे थे. यह विरोध प्रदर्शन किसी आर्थिक मदद के लिए नहीं था बल्कि अयोध्या के राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी के मामले को लेकर बीजेपी सरकार को कठघरे में खड़ा करने की एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था.

संसद के भीतर उसी समय परीक्षा में नकल रोकने और पेपर लीक पर सख्त कार्रवाई से जुड़ा संशोधन विधेयक चर्चा में था लेकिन समाजवादी पार्टी ने संसद के बाहर दान पात्र के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की कि जो सरकार करोड़ों श्रद्धालुओं के चढ़ावे की सुरक्षा नहीं कर सकी, वह युवाओं के भविष्य की रक्षा का दावा कैसे कर सकती है.

अखिलेश यादव ने इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहा कि यदि सरकार श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े दान की सुरक्षा नहीं कर पाई, तो उससे पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोकने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती. वहीं डिंपल यादव ने कहा कि यह केवल चोरी का मामला नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा प्रश्न है.

संसद का यह दृश्य केवल एक दिन का विरोध प्रदर्शन नहीं था. इसके पीछे उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव तक चलने वाली एक बड़ी रणनीति की झलक दिखाई दे रही है.

अलग-अलग मुद्दों पर सरकार का घेराव 

29 जुलाई को लोकसभा में पेपर लीक रोकने संबंधी संशोधन विधेयक पारित होने के बाद विपक्ष के भीतर यह चर्चा तेज हुई कि सरकार के खिलाफ अगला प्रभावी राजनीतिक मुद्दा क्या होगा.

जानकारी के अनुसार समाजवादी पार्टी चाहती है कि विपक्ष अब अयोध्या के राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी और ट्रस्ट से जुड़े विवादों को प्रमुखता से उठाए. वहीं कांग्रेस छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और कथित पेलेट गन के इस्तेमाल के मुद्दे को जारी रखना चाहती है. दोनों दल इस बात पर भी सहमत बताए जाते हैं कि संसद के भीतर सरकार को अलग-अलग मुद्दों पर लगातार घेरा जाए.

राजनीतिक रूप से देखें तो सपा के लिए राम मंदिर का मुद्दा केवल भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है. इसके जरिए पार्टी उस नैरेटिव को चुनौती देना चाहती है, जिसमें राम मंदिर को बीजेपी की सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि माना जाता है.

अखिलेश यादव लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी लड़ाई मंदिर या भगवान राम से नहीं बल्कि मंदिर प्रबंधन में कथित अनियमितताओं और जवाबदेही के सवाल से है. यही वजह है कि संसद में दान पात्र का प्रदर्शन केवल विरोध नहीं बल्कि एक राजनीतिक प्रतीक बन गया.

सपा का बदलता हिंदुत्व मॉडल

2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में 37 सीटें जीतने के बाद समाजवादी पार्टी ने महसूस किया कि केवल जातीय समीकरणों के भरोसे 2027 का विधानसभा चुनाव नहीं जीता जा सकता. अब पार्टी अपनी पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति के साथ एक नया सांस्कृतिक संदेश भी जोड़ रही है.

इसी रणनीति के तहत सैफई में बन रहे केदारेश्वर महादेव मंदिर को विशेष महत्व दिया जा रहा है. मंदिर का निर्माण अंतिम चरण में है और सावन के दौरान इसके पूर्ण होने की उम्मीद है. इसके उद्घाटन को बड़े धार्मिक आयोजन के रूप में आयोजित करने की तैयारी है, जिसमें संत समाज और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को आमंत्रित करने की योजना है.
 

सैफई में निर्माणाधीन केदारेश्वर महादेव मंदिर

इसके बाद अखिलेश यादव के अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन करने की भी रणनीति बनाई गई है. दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी लंबे समय से अखिलेश यादव पर राम मंदिर न जाने का आरोप लगाती रही है. ऐसे में मंदिर दर्शन केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं बल्कि एक राजनीतिक जवाब भी होगा.

सपा यह संदेश देना चाहती है कि वह सनातन विरोधी नहीं है और बीजेपी का हिंदुत्व पर एकाधिकार स्वीकार नहीं करती. इसी कारण पिछले कुछ समय में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मुद्दे से लेकर राम मंदिर चढ़ावा विवाद तक लगभग हर धार्मिक बहस में पार्टी सक्रिय दिखाई दे रही है.

क्यों महत्वपूर्ण है यह रणनीति?

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि समाजवादी पार्टी पहली बार हिंदुत्व की राजनीति से सीधे टकराने के बजाय उसे पुनर्परिभाषित करने की कोशिश कर रही है.

लखनऊ के जय नारायण डिग्री कॉलेज में राजनीतिक शास्त्र विभाग के प्रोफेसर ब्रजेश मिश्र का कहना है कि सपा अब 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की पुरानी राजनीति नहीं कर रही बल्कि 'सांस्कृतिक वैधता' हासिल करने का प्रयास कर रही है. उनके अनुसार पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि धार्मिक आस्था किसी एक दल की बपौती नहीं हो सकती और मंदिरों में पारदर्शिता की मांग करना भी धार्मिक सम्मान का हिस्सा है.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रो. रविकांत का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव ने विपक्ष को यह संकेत दिया कि अयोध्या में बीजेपी की हार केवल स्थानीय नाराजगी नहीं थी बल्कि धार्मिक प्रतीकों के साथ-साथ शासन और जवाबदेही के मुद्दे भी मतदाताओं को प्रभावित करते हैं. उनके अनुसार यदि सपा राम मंदिर के मुद्दे को 'भ्रष्टाचार बनाम आस्था' की बहस में बदलने में सफल रहती है तो बीजेपी के लिए यह असहज स्थिति हो सकती है.

राजनीतिक टिप्पणीकार सुशील पांडेय मानते हैं कि अखिलेश यादव अब बीजेपी के वैचारिक क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं. पहले विपक्ष हिंदुत्व के सवाल पर रक्षात्मक दिखाई देता था लेकिन अब सपा उसी मैदान में जाकर यह कह रही है कि मंदिर का सम्मान और भ्रष्टाचार के खिलाफ सवाल दोनों साथ-साथ खड़े हो सकते हैं. यह बदलाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जाएगा.

हालांकि विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इस रणनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सपा आरोपों को केवल राजनीतिक नारे तक सीमित रखती है या लगातार तथ्यों और जवाबदेही की मांग के साथ आगे बढ़ाती है.

यदि जांच आगे बढ़ती है या नए तथ्य सामने आते हैं तो यह मुद्दा लंबे समय तक राजनीतिक रूप से जीवित रह सकता है लेकिन यदि जांच ठंडी पड़ती है या विपक्ष के पास नए तथ्य नहीं आते तो इसका प्रभाव सीमित भी हो सकता है.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि हिंदुत्व बीजेपी का सबसे मजबूत राजनीतिक आधार है और विपक्ष उससे दूरी बनाकर चलता है. लेकिन समाजवादी पार्टी अब अलग रास्ता चुनती दिखाई दे रही है.

एक तरफ वह पीडीए के जरिए सामाजिक न्याय की राजनीति को आगे बढ़ा रही है, वहीं दूसरी तरफ राम मंदिर, महादेव मंदिर, संत समाज और धार्मिक आयोजनों के जरिए सांस्कृतिक स्वीकार्यता भी हासिल करना चाहती है. राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी का मुद्दा इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा बनता दिखाई देता है.

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