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रेरा और कंज्यूमर फोरम पर सुप्रीम कोर्ट सख्त; इन्हें रिटायर्ड अफसरों का 'पुनर्वास केंद्र' क्यों बताया?

पेंडिंग मामलों, नियुक्तियों के पैटर्न और संस्थागत गिरावट के हवाले से सुप्रीम कोर्ट ने भारत की अर्द्ध-न्यायिक संस्थाओं जैसे RERA और कंज्यूमर फोरम की जवाबदेही पर सवाल खड़े किए हैं

सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
अपडेटेड 25 फ़रवरी , 2026

इस फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने बेहद तल्ख और सीधी टिप्पणियां करते हुए भारत की उन रेगुलेटरी बॉडीज को हकीकत का आईना दिखाया है, जिनका काम उपभोक्ताओं की सुनवाई करना है. बिना कोई बड़ा ढांचागत आदेश दिए, कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है कि लोगों को जल्द न्याय देने के लिए बनी संस्थाएं, खासकर 'रेरा' (RERA) और उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम, नागरिकों के लिए मजबूत 'प्रहरी' रहने के बजाय, अधिकारियों और जजों के लिए पोस्ट-रिटायरमेंट डेस्टिनेशंस बनकर रह गई हैं.

यहां सबसे अहम सवाल यह है: जब सरकार में रिटायरमेंट की उम्र 60 साल है, तो एक रिटायर्ड अधिकारी इन अर्द्ध-न्यायिक निकायों में काम करने के लिए अचानक इतना काबिल कैसे हो जाता है? और क्या सरकार वाकई काबिल अफसरों को चुनती है या सिर्फ उन लोगों पर एहसान करती है जो उसके हाथों की कठपुतली रहे हैं, ताकि उन्हें कुछ और साल की नौकरी मिल जाए? क्या इस चक्कर में गैर-सरकारी क्षेत्रों के योग्य और हकदार लोगों की अनदेखी की जा रही है?

ये टिप्पणियां दो अलग-अलग सुनवाइयों में आईं, लेकिन मिलकर एक चिंताजनक संस्थागत तस्वीर पेश करती हैं. हिमाचल प्रदेश रेरा दफ्तर की शिफ्टिंग से जुड़ी कार्यवाही के दौरान, चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने राज्यों में रेरा के कामकाज पर असंतोष जताया. कोर्ट ने पाया कि घर खरीदारों की सुरक्षा के लिए बनी इन संस्थाओं में कई जगहों पर रिटायर्ड नौकरशाहों का दबदबा है. बेंच ने सवाल उठाया कि क्या ये वाकई परेशान खरीदारों की मदद कर रहे हैं? सख्त लहजे में बेंच ने संकेत दिया कि अगर ऐसी संस्थाएं अंततः सिर्फ डिफ़ॉल्टर बिल्डरों का ही रास्ता आसान कर रही हैं, तो इनके मकसद पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है.

जब संसद ने 2016 में रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट यानी रेरा कानून बनाया था, तो इसे भारत के अपारदर्शी रियल एस्टेट सेक्टर की बेहतरी के लिए एक लंबे समय से प्रतीक्षित कदम माना गया था. कानून ने प्रोजेक्ट्स की जानकारी में पारदर्शिता, समय पर शिकायत निवारण और डेवलपर्स के लिए वित्तीय अनुशासन का वादा किया था. अपनी जीवनभर की कमाई घर में लगाने वाले लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए, रेरा को देरी और धोखाधड़ी के खिलाफ पहला भरोसेमंद कवच माना गया था.

हालांकि, करीब एक दशक बाद, राज्यों में इसका प्रदर्शन एक जैसा नहीं रहा है. सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डेटा और आधिकारिक जानकारी बताती है कि 2026 की शुरुआत तक देशभर में रेरा के पास 1.20 लाख से ज्यादा शिकायतें पेंडिंग हैं. अकेले महाराष्ट्र में 40,000 से ज्यादा मामले हैं, जबकि कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में भी भारी बैकलॉग है. हालांकि कानून में 60 दिनों के भीतर निपटारे की बात कही गई है, लेकिन कई मामले अब 18 से 36 महीने तक खिंच रहे हैं. सरकारी आंकड़ों ने यह भी संकेत दिया है कि केवल 45 फीसद रजिस्टर्ड प्रोजेक्ट्स ही रेरा नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं.

जो घर खरीदार उन फ्लैट्स की EMI भर रहे हैं जो उन्हें मिले ही नहीं, उनके लिए यह देरी बढ़ते आर्थिक बोझ में बदल जाती है, वे अक्सर किराया और लोन की किस्तें दोनों चुकाते हैं, जबकि कानूनी लड़ाई रेंगती रहती है. कानून के वादे और जमीनी हकीकत के बीच की इसी बढ़ती खाई ने कोर्ट की नाराजगी को भड़काया है.

कोर्ट की चिंता का एक मुख्य बिंदु रिटायरमेंट के बाद की नियुक्तियों का पैटर्न है. कई राज्यों में, रेरा प्राधिकरणों की अध्यक्षता या स्टाफिंग मुख्य रूप से रिटायर्ड आईएएस और राज्य सिविल सेवा के अधिकारियों की ओर से की जाती है. बेंच ने सवाल उठाया कि क्या इस तरह की अत्यधिक निर्भरता उस विशेष, उपभोक्ता-केंद्रित चरित्र को कमजोर करने का जोखिम पैदा करती है जिसकी कानून ने मूल रूप से कल्पना की थी.

कोर्ट ने रिटायर्ड अधिकारियों को सेवा देने से मना नहीं किया. उसकी चिंता अधिक स्ट्रक्चरल थी: क्या मौजूदा नियुक्ति प्रणाली रियल एस्टेट, अर्बन प्लानिंग, वित्त और उपभोक्ता संरक्षण में डोमेन एक्सपर्ट्स को पर्याप्त प्राथमिकता देती है? नीति पर्यवेक्षकों का लंबे समय से तर्क रहा है कि विशेष रेगुलेटर तब सबसे अच्छा काम करते हैं जब प्रशासनिक अनुभव को तकनीकी और क्षेत्रीय ज्ञान के साथ संतुलित किया जाए.

धारणा का मुद्दा भी उतना ही महत्वपूर्ण है. चूंकि कई नियुक्त अधिकारी पहले हाउसिंग या शहरी विकास विभागों को संभाल चुके होते हैं, आलोचकों का कहना है कि यह नज़रिया, चाहे उचित हो या अनुचित, खरीदार के भरोसे को कम कर सकता है. कोर्ट की टिप्पणियां बताती हैं कि यह धारणा की समस्या अब गंभीर रूप से न्यायिक रडार पर आ गई है.

रेरा सुनवाई के कुछ ही दिनों बाद, चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमालिया बागची की एक और बेंच ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत बने उपभोक्ता विवाद निवारण निकायों पर ध्यान दिया. यहां भी, कोर्ट का लहजा बेहद स्पष्ट था. बेंच ने कहा कि कंज्यूमर फोरम रिटायर्ड जजों के लिए 'आराम की नौकरी' नहीं बन सकते, खासकर उन क्षेत्रों में जहां मुकदमों का बोझ बहुत कम है.

कोर्ट के सामने रखे गए डेटा ने काम के बोझ में भारी असंतुलन का खुलासा किया. कई पूर्वोत्तर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने पेंडिंग मामलों की संख्या दहाई में बताई, अरुणाचल प्रदेश में 59, सिक्किम में 64, मिजोरम में 94, मणिपुर में 166, और लक्षद्वीप व अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में तो और भी कम संख्या.  कोर्ट ने संस्थागत खर्च और काम के वास्तविक बोझ के बीच के अंतर को नोट किया, साथ ही यह भी माना कि पहले के न्यायिक निर्देश शायद क्षेत्रीय वास्तविकताओं को पूरी तरह ध्यान में रखे बिना बहुत व्यापक थे.

महत्वपूर्ण रूप से, बेंच ने उन राज्यों से वैकल्पिक प्रस्ताव मांगे जहां 1,000 से कम मामले पेंडिंग हैं, जिसमें मामलों को नामित हाई कोर्ट जजों के माध्यम से निपटाने की संभावना भी शामिल है. संकेत स्पष्ट था: संस्थागत डिजाइन वास्तविक वर्कलोड को दर्शाना चाहिए, न कि बस 'ऑटोपायलट' मोड पर चलना चाहिए.

कुल मिलाकर, कोर्ट की फरवरी की ये टिप्पणियां भारत के बढ़ते अर्द्ध-न्यायिक (Quasi-judicial) ढांचे के साथ एक व्यापक बेचैनी की ओर इशारा करती हैं. पिछले दो दशकों में, सरकारों ने नियमित अदालतों पर बोझ कम करने और सब्जेक्ट-स्पेसिफिक एक्सपर्टीज देने के लिए विशेष ट्रिब्यूनल बनाए हैं. सैद्धांतिक रूप से यह मॉडल सही लगता है. हालांकि, व्यवहार में विभिन्न क्षेत्रों में इसका प्रदर्शन बहुत अलग-अलग रहा है.

सुप्रीम कोर्ट तीन मिलते-जुलते रुझानों के बारे में चिंतित लग रहा है: उन निकायों में लगातार पेंडेंसी जिन्हें फास्ट-ट्रैक होना चाहिए था, राज्यों में स्टाफिंग का असमान पैटर्न, और बढ़ती धारणा कि रिटायरमेंट के बाद की नियुक्तियां संस्थागत संस्कृति को आकार दे रही हैं. इनमें से कोई भी मुद्दा नया नहीं है. जो नया है, वह है वह तीखापन जिसके साथ कोर्ट ने अब उन्हें खुली कार्यवाही में व्यक्त किया है.

भले ही इन सुनवाइयों में सीधे तौर पर फैसला नहीं सुनाया गया, लेकिन RTI व्यवस्था के तहत सूचना आयोगों को लेकर भी लंबे समय से ऐसी ही चिंताएं रही हैं. देश भर में, लगभग 3 लाख आरटीआई अपीलें और शिकायतें पेंडिंग हैं, जिसमें अकेले केंद्रीय सूचना आयोग के पास 28,000 से अधिक मामले हैं. देश भर में अधिकांश कमिश्नर रिटायर्ड नौकरशाह हैं, एक ऐसा पैटर्न जिसे पारदर्शिता कार्यकर्ता उस 'वॉचडॉग' भूमिका को कुंद करने वाला मानते हैं जिसकी आरटीआई ढांचे के तहत कल्पना की गई थी.

इस समानता को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है. चाहे रियल एस्टेट रेगुलेशन हो, उपभोक्ता संरक्षण हो या पारदर्शिता लागू करना हो, वही स्ट्रक्चरल सवाल बार-बार सामने आते रहते हैं: नियुक्ति किसकी हो रही है, मामले कितनी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, और क्या विशेष निकाय परिणाम दे रहे हैं?

नीति निर्माताओं के लिए, कोर्ट की टिप्पणियां तात्कालिकता और जटिलता दोनों पैदा करती हैं. रेरा जैसे ट्रिब्यूनल्स को पूरी तरह से खत्म करना अव्यावहारिक माना जाता है, क्योंकि सिविल कोर्ट पहले से ही भारी पेंडेंसी के बोझ तले दबे हैं. फिर भी मौजूदा स्थिति को बनाए रखने से जनता के भरोसे में और गिरावट का जोखिम है.

नीतिगत और कानूनी हलकों में अब जिस बात पर चर्चा हो रही है, वह है नपा-तुला सुधार यानी कैलिबरेटेड रिफॉर्म: नियुक्तियों के लिए टैलेंट पूल को व्यापक बनाना, संस्थागत ताकत को वास्तविक वर्कलोड के साथ जोड़ना, छोटे राज्यों में बुनियादी ढांचे में सुधार करना, और अर्द्ध-न्यायिक निकायों के लिए सख्त प्रदर्शन निगरानी शुरू करना. कोर्ट ने खुद कम पेंडेंसी वाले क्षेत्रों में लचीलेपन का संकेत दिया, जो कठोर एकरूपता के बजाय स्ट्रक्चरल प्रयोग के लिए खुलेपन का सुझाव देता है.

पोजेशन ऑर्डर्स का इंतजार कर रहे लाखों घर खरीदारों, सेवा विवादों से लड़ रहे उपभोक्ताओं और आरटीआई अपील करने वाले नागरिकों के लिए, यह बहस अकादमिक नहीं है. ये निकाय ठीक इसलिए बनाए गए थे क्योंकि सामान्य दीवानी मुकदमेबाजी बहुत धीमी और बहुत महंगी थी. यदि विशेष फोरम भी उन्हीं देरी की नकल करने लगते हैं जिन्हें ठीक करने के लिए वे बने थे, तो इसकी विश्वसनीयता की कीमत बहुत भारी हो सकती है.

सुप्रीम कोर्ट ने कोई व्यापक फेरबदल का आदेश नहीं दिया है. लेकिन उसका संदेश स्पष्ट है: अर्द्ध-न्यायिक संस्थाओं को अपने अस्तित्व का औचित्य 'प्रदर्शन' के माध्यम से साबित करना होगा, न कि केवल वैधानिक उपस्थिति या रिटायरमेंट के बाद के स्टाफिंग पैटर्न से. सरकारें इसे एक वास्तविक सुधार के क्षण के रूप में मानती हैं या क्रमिक गिरावट को जारी रहने देती हैं, यह भारत के उपभोक्ता न्याय ढांचे की भविष्य की विश्वसनीयता तय करेगा.

फिलहाल, कोर्ट ने एक चेतावनी भरा शॉट फायर कर दिया है. सिस्टम की प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि यह एक टर्निंग पॉइंट बनता है या पेंडेंसी और संस्थागत डिजाइन के साथ भारत के लंबे संघर्ष में बस एक और कड़े शब्दों वाला आदेश बनकर रह जाता है.

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