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मोदी सरकार की ‘पीएम मित्र पार्क’ योजना क्या सच में देश के कपड़ा उद्योग को पूरी तरह बदल देगी?

कपड़ा मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव रोहित कंसल के मुताबिक, भारतीय अर्थव्यवस्था में करीब 176 अरब डॉलर का योगदान देने वाला कपड़ा उद्योग अब तक के सबसे महत्वाकांक्षी बदलाव की बढ़ने वाला है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 26 फ़रवरी , 2026

भारत के कपड़ा उद्योग का लंबा इतिहास रहा है. देश और दुनिया के प्राचीन व्यापार मार्गों से लेकर आधुनिक निर्यात गलियारों तक इस उद्योग का दबदबा बना हुआ है. आज कपड़ा उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था में करीब 176 अरब डॉलर (लगभग 16 लाख करोड़ रुपए) का योगदान देता है.

यह सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 2-3 फीसदी का योगदान देता है और करीब 4.5 करोड़ लोग इस क्षेत्र में प्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त कर रहे हैं. यही कारण है कि भारतीय कपड़ा उद्योग कृषि के बाद रोजगार देने वाला दूसरा सबसे बड़ा सेक्टर है.

इस क्षेत्र में निर्यात लगभग 40 अरब डॉलर के आसपास है, जबकि घरेलू बाजार का अनुमान 135-140 अरब डॉलर है. नीति निर्माता अब इस उद्योग को 350 अरब डॉलर तक ले जाना चाहते हैं. हालांकि, अपने विशाल आकार के बावजूद, कपड़ा उद्योग एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है.

25 फरवरी को नई दिल्ली में आयोजित इंडिया टुडे इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्क्लेव 2026 में बोलते हुए, केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव रोहित कंसल ने कहा कि कपड़ा उद्योग के बुनियादी ढांचे को लेकर चर्चा में बड़ा बदलाव आया है. उन्होंने कहा, "इस क्षेत्र के विकास के लिए चर्चा अब केवल राजमार्गों और बंदरगाहों तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़े औद्योगिक पार्क और इस क्षेत्र से जुड़े लोगों की उत्पादकता, गुणवत्ता तथा तकनीकी क्षमता बढ़ाने पर केंद्रित है."

इस रणनीति के केंद्र में 'पीएम मित्र पार्क' हैं, जो फाइबर और कपड़ा उद्योग की पूरी चेन को एक साथ लाने के लिए डिजाइन किए गए हैं. पारंपरिक कपड़ा उत्पादक राज्यों में ऐसे सात पार्क विकसित किए जाएंगे, जिनमें से प्रत्येक लगभग 1,000 एकड़ में फैला होगा. इसका उद्देश्य साझा सुविधाओं जैसे- लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी और ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करना है, जो छोटे समूह अपने दम पर हासिल नहीं कर सकते."

कंसल ने आगे कहा, "भारत में पारंपरिक कपड़ा उद्योग का विकास लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के जरिए किसानों, दस्तकारों, बुनकरों के समूहों को आपस में जोड़कर किया गया है. ये पूरे सिस्टम बेकार नहीं हुए हैं, बल्कि इसे आधुनिक बनाने और उन्नत करने की आवश्यकता है."

उन्होंने बताया कि पहले के कपड़ा पार्क आमतौर पर लगभग 100 एकड़ के होते थे, जिनमें लगभग 100 करोड़ रुपए का निवेश होता था. इन पार्कों में करीब 2,000 नौकरियां पैदा होती थीं. ये नए पार्क उनसे 10 गुना बड़े हैं, जिनमें प्रति पार्क लगभग 10,000 करोड़ रुपए का अनुमानित निवेश होगा. इन पार्कों में करीब 1,000-1,500 करोड़ रुपए की बुनियादी ढांचागत लागत आएगी.

हर एक पार्क में करीब 1,00,000 रोजगार पैदा होने की उम्मीद है. कंसल ने इस बारे में विस्तार से बताते हुए कहा, "सात पार्कों में हम 70,000 करोड़ रुपए के निवेश करने जा रहे हैं. इससे करीब 20 लाख नौकरियों की उम्मीद है. यह किसी भी लिहाज से महत्वपूर्ण है." इन पार्कों को बनाने का काम अंतिम चरण में पहुंचने वाला है. इनके इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाने में कुल लागत करीब 15,000 करोड़ रुपए होगी. अभी 4,000 करोड़ रुपए का काम चल रहा है, और लगभग 1,000 करोड़ रुपए पहले ही खर्च किए जा चुके हैं.

पार्कों के लिए करीब 7,000 एकड़ भूमि अधिग्रहीत की जा चुकी है और लगभग 2,000 एकड़ भूमि आवंटित की जा चुकी है. तेलंगाना में व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो चुका है, जबकि मध्य प्रदेश में भूमि आवंटित कर दी गई है. 2027-28 तक इन पार्कों में पूरी तरह से काम शुरू होने की उम्मीद है.

भारत का कपड़ा उद्योग असाधारण रूप से व्यापक है, इसलिए बड़े पैमाने पर उत्पादन करना अब अनिवार्य हो गया है. हमारे पास कच्चे माल की उपलब्धता से लेकर तैयार कपड़ों के निर्यात तक की एक मजबूत श्रृंखला है. हालांकि, कुछ समस्याएं भी हैं, जैसे कपास की खेती गुजरात या महाराष्ट्र में होती है, उसकी कताई तमिलनाडु में, प्रसंस्करण सूरत में और सिलाई कहीं और होती है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि छोटी उत्पादन इकाइयों के कारण हम कई दूसरे देशों से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं. कंसल ने बताया कि भारत कपास और कृत्रिम रेशों के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक बना हुआ है. उन्होंने कहा, "हम धागे, कपड़े और कपड़ों के प्रमुख उत्पादक और निर्यातक हैं. हम कपड़ा मशीनरी का निर्माण भी करते हैं. भले ही बांग्लादेश अधिक कपड़ा निर्यात करता हो, लेकिन भारत संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में निर्यात करता है. हम वैश्विक स्तर पर शीर्ष कपड़ा निर्यातकों में लगातार शुमार रहते हैं."

कंसल ने कहा कि पारंपरिक क्लस्टरों का आधुनिकीकरण एक बड़ी प्राथमिकता है. उन्होंने कहा, "कपड़े के उत्पादन का लगभग 80 फीसदी हिस्सा दशकों से विकसित हुए जैविक क्लस्टरों में केंद्रित लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) से आता है. मशीनरी को बेहतर करना, कपड़ा उद्योग के लिए वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट, इस उद्योग से जुड़े नियम-कानूनों का डिजिटलीकरण करके आसान बनाना, इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण आदि मोदी सरकार के एकीकृत कपड़ा कार्यक्रम का हिस्सा हैं." जैविक क्लस्टरों से मतलब उस स्ट्रक्चर से है, जिसमें किसान, बुनकर, व्यापारी सब एक-दूसरे से जुड़े होते हैं.

कंसल का मानना है कि कुछ क्लस्टर इस क्षेत्र में पहले ही प्रगति कर चुके हैं. तमिलनाडु का तिरुप्पुर, जो भारत के ऐसे ही प्रमुख क्लस्टरों में से एक है. यहां करीब 15,000 निर्यात करने वाली इकाइयां हैं. ये कंपनियां पानी, ऊर्जा और मजदूरों को लेकर बने नियमों का सही से पालन कर रहे हैं. यहां पानी साफ करने और दोबारा इस्तेमाल करने के लिए आधुनिक यंत्र लगे हैं. दरअसल, यूरोपीय देशों में कपड़ा आयात करने से पहले पर्यावरण और बाल मजदूरी आदि से जुड़े नियमों का कड़ाई से पालन होता है. सरकार इसीलिए इन क्षेत्र की कंपनियों पर विशेष ध्यान दे रही है.

यही कारण है कि गुजरात के सूरत स्थित सिंथेटिक कपड़ा उद्योग ने कारखानों की चिमनियों से निकलने वाली हानिकारक गैसों और कणों की निगरानी शुरू कर दी है. हरियाणा के पानीपत ने घरेलू कपड़ा के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई है. केंद्र सरकार इस पूरे इंडस्ट्री को आपस में जोड़कर हर तरह की तकनीक को शेयर करने पर जोर दे रही है.

वैश्विक व्यापार राजनीति ने इस मामले में गंभीरता बढ़ा दी है. हाल के वर्षों में अमेरिकी टैरिफ नीतियों को लेकर चल रही खींचतान ने खरीदारी के फैसलों को प्रभावित किया है. मामूली टैरिफ संबंधी नुकसान भी कपड़ों के बड़े ऑर्डर को प्रभावित कर सकते हैं. कपड़ा उद्योग जगत ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि भारत की एकीकृत मूल्य श्रृंखला (डिजाइन, उत्पादन, वितरण प्रक्रिया से जुड़ी एकल चेन) से उन्हें लाभ है, लेकिन कपड़ों की अंतिम कीमत अक्सर खरीदारों के फैसले को निर्धारित करती है.

यही कारण है कि नए व्यापारिक समझौते को एक संतुलन के रूप में पेश किया जा रहा है. रोहित कंसल ने कहा, "स्थिरता के मामले में कपड़ा क्षेत्र एक हरा-भरा परिवर्तन (Green Transformation) से गुजर रहा है. हमारे पास ऐसे क्लस्टर हैं, जहां जीरो लिक्विड डिस्चार्ज सिस्टम (शून्य तरल निर्वहन प्रणाली) लगे हैं. सोलर ऊर्जा का अच्छा इस्तेमाल हो रहा है और रीसाइक्लिंग की अर्थव्यवस्था अब काफी बड़ी हो चुकी है. एकीकृत कपड़ा कार्यक्रम में पानी की बुनियादी सुविधाओं, रीसाइक्लिंग हब और सर्टिफिकेशन पर जोर है. हम वैल्यू चेन में खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल नहीं करने के लिए पायलट प्रोग्राम चला रहे हैं. पानी, रसायन, उत्सर्जन और ऊर्जा- ये सभी क्षेत्र हमारे फोकस में हैं."

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