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पायलटों की मेंटल फिटनेस की जांच कितनी जरूरी, मौजूदा प्रक्रिया क्यों है नाकाफी?

पायलटों की मानसिक सेहत पर नजर रखने के लिए दुनिया भर में कई स्तरों वाली व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाती है. इसमें बार-बार मेडिकल जांच, साथ काम करने वालों की निगरानी और कई अन्य उपाय शामिल हैं

दुनियाभर में पायलटों के मानसिक स्वास्थ्य की जांच की अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं (फोटो : AI)
अपडेटेड 23 अक्टूबर , 2026

किसी पायलट के ड्रग्स-शराब की जांच से पता चल सकता है कि उसने ड्यूटी के दौरान कोई नशीला पदार्थ तो नहीं लिया है. लेकिन इससे अवसाद, चिंता, आत्महत्या के विचार, काम के दबाव से होने वाली थकान, नींद की गंभीर समस्या या दूसरी मनोवैज्ञानिक परेशानियों के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है. ये समस्याएं फैसले लेने की क्षमता और कामकाज को प्रभावित कर सकती हैं. 

फोर्टिस हॉस्पिटल्स के मानसिक स्वास्थ्य विभाग के निदेशक डॉ. समीर पारीख कहते हैं, "इसलिए मानसिक रूप से फिट होने का आकलन करने के लिए एक अलग व्यवस्था की जरूरत है. इसमें एक बार के लैब टेस्ट के बजाय बार-बार चिकित्सकीय आकलन, प्रमाणित जांच प्रक्रियाएं, व्यवहार पर नजर रखना और गोपनीय तरीके से समस्याओं की जानकारी देने की व्यवस्था शामिल होनी चाहिए."

दुनिया भर में विमानन सुरक्षा से जुड़े नियमों में मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के आकलन को अलग-अलग माना गया है. अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) के नियमों के मुताबिक, पायलटों की मेडिकल जांच में उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, दोनों का आकलन करना जरूरी है.

इसका मकसद सिर्फ मानसिक रोगों का पता लगाना नहीं है बल्कि यह देखना भी है कि किसी बीमारी या परेशानी से पायलट के लाइसेंस के तहत सुरक्षित तरीके से विमान उड़ाने की क्षमता तो प्रभावित नहीं होगी. ICAO ने विमानन सुरक्षा से जुड़ी चिकित्सा व्यवस्था में बचाव और सहकर्मी सहायता कार्यक्रमों पर भी लगातार जोर दिया है.

यूरोप और अमेरिका में इसके लिए थोड़े अलग तरीके अपनाए जाते हैं. यूरोपीय संघ विमानन सुरक्षा एजेंसी (EASA) पायलटों के नियमित उड़ान संचालन शुरू करने से पहले मनोवैज्ञानिक आकलन जरूरी मानती है. वह विमानन कंपनियों के लिए सहायता कार्यक्रमों को भी अनिवार्य बनाती है. 

अमेरिका में जरूरत पड़ने पर पायलटों की मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों से जांच कराई जाती है (सांकेतिक तस्वीर)
अमेरिका में जरूरत पड़ने पर पायलटों की मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों से जांच कराई जाती है (सांकेतिक तस्वीर)

अमेरिका में संघीय विमानन प्रशासन (FAA) की नियमित विमानन चिकित्सा जांच के अलावा जरूरत पड़ने पर मनोचिकित्सा या मनोविज्ञान के विशेषज्ञों से भी आकलन कराया जाता है. ऐसा तब किया जाता है जब पायलट के मेडिकल इतिहास, लक्षणों या व्यवहार से कोई चिंता पैदा होती है. इनमें से कोई भी व्यवस्था सिर्फ एक तय अंतराल पर होने वाले ' मेंटेल हेल्थ टेस्ट' पर निर्भर नहीं है.

भारत में भी इसी तरह कई स्तरों वाली व्यवस्था अपनाई गई है. नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) ने 2023 के मेडिकल सर्कुलर 01 के जरिए विमानन चिकित्सा जांच की व्यवस्था में मानसिक स्वास्थ्य के आकलन को शामिल किया. यह सर्कुलर 31 मई, 2023 से लागू हुआ. 

क्लास 1, 2 और 3 की मेडिकल जांच के दौरान DGCA से मान्यता प्राप्त चिकित्सा जांचकर्ताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे खास तौर पर अवसाद, चिंता, पैनिक डिसऑर्डर और शराब या मन को प्रभावित करने वाले पदार्थों के दुरुपयोग जैसी समस्याओं पर ध्यान दें.

हालांकि DGCA ने स्पष्ट किया है कि हर पायलट की हर नियमित मेडिकल जांच के दौरान विस्तृत मनोचिकित्सकीय आकलन कराना न तो प्रभावी होगा और न ही खर्च के लिहाज से व्यावहारिक. इसकी वजह यह है कि गंभीर मानसिक रोगों का पहले से अनुमान लगाना मुश्किल होता है. 

इसके बजाय DGCA ने नियमित मेडिकल जांच के दौरान मानसिक स्वास्थ्य का आकलन जल्दी करने और किसी तरह की चिंता सामने आने पर आगे की जांच कराने की सिफारिश की है. सरकार ने 2025 में संसद में भी इन प्रावधानों को दोहराया था.

DGCA के सर्कुलर में सहकर्मी सहायता कार्यक्रम शुरू करने, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा प्रशिक्षण देने और विशेषज्ञों की मदद उपलब्ध कराने की भी बात कही गई है. पायलटों की भर्ती के दौरान विमानन कंपनियों को क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट की निगरानी में प्रमाणित मनोवैज्ञानिक आकलन कराने के लिए प्रोत्साहित किया गया है. इसमें सोचने-समझने की क्षमता, व्यक्तित्व और मानसिक विकारों से जुड़े लक्षणों की जांच की जाती है. इसके लिए COMPASS, रेवेन प्रोग्रेसिव मैट्रिसेस, NEO PI-R और MMPI-2 जैसे जांच टूल्स का सुझाव दिया गया है.

शोध से भी पता चलता है कि कई स्तरों वाली यह व्यवस्था क्यों जरूरी है. एयरोस्पेस मेडिसिन एंड ह्यूमन परफॉर्मेंस में 2022 में प्रकाशित एक सिस्टमेटिक रिव्यू में 58 अध्ययनों का विश्लेषण किया गया. इसमें पायलटों की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर अलग-अलग अध्ययनों में काफी अंतर पाया गया. समीक्षा में यह भी सामने आया कि पायलट अपनी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की जानकारी कम देते हैं.

इसलिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ बेहतर जांच विकसित करना नहीं है. विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य समय के साथ बदलता रहता है. पायलट मेडिकल क्लीयरेंस खोने के डर से अपने लक्षण छिपा सकते हैं.

इसके अलावा, कोई एक मनोवैज्ञानिक जांच भविष्य में होने वाली मानसिक बीमारी का भरोसेमंद अनुमान नहीं लगा सकती. इसलिए मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभावी नजर रखने के लिए यह जरूरी है कि विमानन कंपनियां और रेगुलेटर इस व्यवस्था पर कितना निवेश करने को तैयार हैं. इसमें नियमित अंतराल पर चिकित्सकीय जांच, प्रशिक्षित जांचकर्ता, सहकर्मियों की ओर से व्यवहार संबंधी जानकारी और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञों से आकलन कराना शामिल है.

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