भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है. पिछले वर्षों में स्कूलों की संख्या बढ़ी है, रजिस्ट्रेशन में वृद्धि हुई है और डिजिटल सुधारों की रफ्तार भी तेज हुई है. इन सबके बावजूद नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी स्कूल अभूतपूर्व गति से छात्रों को खो रहे हैं.
‘स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया: टेम्पोरल एनालिसिस एंड पॉलिसी रोडमैप फॉर क्वालिटी एन्हांसमेंट’ रिपोर्ट के मुताबिक, 2005 में देश के 71 फीसद छात्र सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे. अब यह संख्या घटकर 49.24 फीसद रह गई है. पहली बार ऐसा हुआ है कि देश के अधिकांश बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ रहे हैं.
यह आंकड़ा एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या परिवारों का सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा कम हो रहा है? वंचित बच्चों को हर तरह से सहयोग देने वाली गैर-लाभकारी संस्था लोटस पेटल फाउंडेशन के संस्थापक और प्रबंध ट्रस्टी कुशल राज चक्रवर्ती का मानना है कि यह गिरावट केवल रजिस्ट्रेशन के बदलते रुझान को नहीं दिखाती.
वे कहते हैं, “यह मूल रूप से भरोसे में कमी को दिखाती है. जो परिवार मुश्किल से निजी स्कूलों की फीस चुका सकते हैं वे भी अपने बच्चों को वहां भेजना पसंद कर रहे हैं क्योंकि वे बेहतर शिक्षा, अनुशासन, तकनीक से जुड़ाव और अच्छे करियर अवसरों को निजी स्कूलों से जोड़कर देखते हैं.”
भारत ने दशकों तक स्कूलों का ढांचा मजबूत करने और रजिस्ट्रेशन बढ़ाने पर काम किया है लेकिन सीखने के परिणाम अब भी कमजोर हैं. नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक कक्षा 5 के बड़ी संख्या में छात्र अभी भी कक्षा 2 स्तर का पाठ पढ़ने या सामान्य गणितीय सवाल हल करने में कठिनाई महसूस करते हैं. चक्रवर्ती कहते हैं, “भारतीय स्कूली शिक्षा का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है. यह माना गया था कि अगर बच्चा स्कूल जा रहा है और स्कूल में भवन है, तो सीखना अपने आप हो जाएगा. हालांकि वास्तविकता कुछ और है.”
जमीनी स्तर पर काम करने वाली संस्था सेंटर फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (CFTI) की संस्थापक और मेंटर ट्रस्टी चित्रलेखा पाटिल भी मानती हैं कि केवल भवन और सुविधाएं शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं कर सकतीं. वे कहती हैं, “कई ग्रामीण कक्षाओं में अब भी बुनियादी पढ़ाई-लिखाई और गणित के लिए पर्याप्त अच्छे शिक्षक नहीं हैं. वास्तविक सुधार के लिए शिक्षकों की क्षमता, सीखने के संसाधनों और लगातार मूल्यांकन में निवेश जरूरी है, केवल इमारतों में नहीं.”
जैसे-जैसे छात्र आगे की कक्षाओं में पहुंचते हैं चुनौतियां और बढ़ जाती हैं. प्राथमिक स्तर पर रजिस्ट्रेशन अपेक्षाकृत बेहतर बना रहता है लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर तेजी से बढ़ती है. इसके पीछे आर्थिक दबाव एक बड़ा कारण है. कम आय वाले परिवारों के लिए किशोर बच्चों को स्कूल में बनाए रखना महंगा पड़ता है. इसमें किताबें, यूनिफॉर्म और परिवहन का खर्च तो शामिल है ही, साथ ही घर की संभावित आय का नुकसान भी होता है.
स्कूल तक पहुंच भी एक बड़ी समस्या है. खासकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में माध्यमिक विद्यालय अक्सर काफी दूर होते हैं. लड़कियों के लिए सुरक्षा, स्वच्छता और लंबी दूरी जैसी चिंताएं कई बार पढ़ाई छोड़ने का कारण बन जाती हैं. पाटिल बताती हैं कि छोटे-छोटे प्रयास भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं. CFTI की ओर से 35,000 से अधिक साइकिलें वितरित किए जाने के बाद कई ग्रामीण लड़कियां परिवहन की समस्या दूर कर अपनी पढ़ाई जारी रख सकीं.
इसके बावजूद बुनियादी सुविधाओं की कमी आज भी लाखों छात्रों को प्रभावित कर रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 1 लाख स्कूलों में अब भी लड़कियों के लिए शौचालय इस्तेमाल के लायक नहीं हैं. किशोरावस्था की लड़कियों के लिए इसका सीधा असर उपस्थिति और पढ़ाई जारी रखने पर पड़ता है. पाटिल कहती हैं, “सुरक्षित शौचालयों की कमी के कारण कई लड़कियां युवावस्था के बाद स्कूल छोड़ देती हैं. मासिक धर्म स्वच्छता से जुड़ी समस्याएं, सामाजिक झिझक और सुविधाओं का अभाव आज भी बड़ी बाधाएं हैं.”
इस बीच शहर और गांव के बीच शिक्षा का अंतर भी बढ़ रहा है. राष्ट्रीय स्तर पर छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार के बावजूद दूरदराज के इलाकों में शिक्षकों की कमी गंभीर बनी हुई है. 1 लाख से अधिक स्कूल अब भी केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं. चक्रवर्ती कहते हैं, “कागजों पर आंकड़े बेहतर दिख सकते हैं लेकिन शिक्षकों का वितरण बेहद असमान है. ग्रामीण स्कूलों में योग्य शिक्षकों को आकर्षित करना और उन्हें बनाए रखना आज भी चुनौती है.”
डिजिटल असमानता इस समस्या को और बढ़ाती है. जहां शहरी स्कूलों में तकनीक का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, वहीं कई ग्रामीण स्कूल अभी भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं. दूसरी ओर तकनीक भारत की शिक्षा नीति का अहम हिस्सा बनती जा रही है. नीति आयोग की रिपोर्ट AI और डिजिटल शिक्षा सुधारों पर जोर देती है जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति के व्यापक लक्ष्यों के अनुरूप है.
हालांकि दोनों विशेषज्ञ सावधानी बरतने की सलाह देते हैं. पाटिल कहती हैं, “तकनीक शिक्षक का विकल्प नहीं हो सकती. अगर कक्षाएं बुनियादी रूप से तैयार नहीं हैं तो डिजिटल पहल का पूरा लाभ नहीं मिल पाएगा.” चक्रवर्ती का मानना है कि AI की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है लेकिन केवल तब जब वह व्यापक शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बने.
वे कहते हैं, “तकनीक तब सबसे प्रभावी होती है जब वह शिक्षकों को मजबूत बनाती है, उनकी जगह नहीं लेती. भविष्य ऐसे मिश्रित मॉडल का है, जहां AI मूल्यांकन, अभ्यास और सामग्री उपलब्ध कराने में मदद करे. जबकि शिक्षक पढ़ाने, मार्गदर्शन देने और भावनात्मक सहयोग की जिम्मेदारी निभाएं.”
रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण पहलू बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक क्षमता पर बढ़ता जोर है. विशेषज्ञ इसका स्वागत करते हैं लेकिन पाटिल चेतावनी देती हैं कि सीखने को केवल परीक्षा परिणामों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए. CFTI की संस्थापक चित्रलेखा पाटिल कहती हैं, “भारत की शिक्षा व्यवस्था अब भी परीक्षा-केंद्रित है. छात्रों का मूल्यांकन मुख्य रूप से अंकों और रैंकिंग के आधार पर होता है. हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है जो समझ और व्यावहारिक ज्ञान को महत्व दे, न कि केवल रटने को.”
असल में स्कूल शिक्षा पर चल रही बहस केवल रजिस्ट्रेशन या तकनीकी सुधारों की नहीं है. यह उस व्यवस्था में भरोसा बहाल करने की बात है जो आज भी करोड़ों बच्चों के लिए बेहतर भविष्य का सबसे बड़ा रास्ता है. सरकारी स्कूलों में घटता रजिस्ट्रेशन निजीकरण के पक्ष में तर्क नहीं बल्कि एक चेतावनी है. लोटस पेटल फाउंडेशन के संस्थापक और प्रबंध ट्रस्टी कुशल राज चक्रवर्ती कहते हैं, “सरकारी शिक्षा भारत में सामाजिक समानता का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है. करोड़ों बच्चों के लिए सरकारी स्कूल कई विकल्पों में से एक नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता हैं.”
चित्रलेखा पाटिल भी इससे सहमत हैं. वे कहती हैं, “समाधान जिम्मेदारी को निजी संस्थानों पर डालना नहीं है. सार्वजनिक स्कूलों को बेहतर बुनियादी ढांचे, मजबूत शिक्षण सहयोग, प्रशिक्षित शिक्षकों और समुदाय के भरोसे के जरिए मजबूत करना होगा.” रिपोर्ट का संदेश साफ है. भारत की शिक्षा चुनौती अब बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने की नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि हर बच्चा चाहे वह किसी भी क्षेत्र, लिंग या आर्थिक पृष्ठभूमि से आता हो स्कूल पहुंचने के बाद गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करे.

