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गुजरात टारगेट, राजस्थान ट्रांजिट : शराब तस्करी का नेटवर्क कैसे काम करता है?

हरियाणा-पंजाब से निकलने वाली शराब अब संगठित नेटवर्क के जरिए गुजरात पहुंच रही है. तस्कर एस्कॉर्ट गाड़ियां, GPS और बदली नंबर प्लेट का इस्तेमाल कर रहे हैं

झारखंड से बिहार तक सप्लाई का पर्दाफाश (Photo: ITG/ Panjak Kumar)
सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 22 मई , 2026

हरियाणा और पंजाब से निकलने वाली अवैध शराब अब गुजरात तक पहुंचने के लिए राजस्थान में चौक-चौबंद गलियारा बना चुकी है.  राजस्थान के शेखावाटी इलाके से लेकर सिरोही, बाड़मेर, उदयपुर, डूंगरपुर और बांसवाड़ा तक कई ऐसे रूट विकसित हो चुके हैं जिन्हें शराब तस्कर ‘सुपर कॉरिडोर’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. इस बीच पुलिस और आबकारी विभाग लगातार कार्रवाई कर रहे हैं लेकिन तस्करों के नए-नए हथकंडे इन एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं.

रूट ही नहीं, तस्करी के तौर-तरीके भी काफी बदल चुके हैं. पहले शराब तस्करी के लिए बड़े ट्रकों का ज्यादा इस्तेमाल होता था लेकिन अब लग्जरी कार, लग्जरी बस, सीमेंट टैंकर, ऑयल टैंकर, पार्सल कंटेनर और यहां तक कि मोटरसाइकिल का भी इस्तेमाल हो रहा है. कई मामलों में शराब को अनाज, चूरी-खली या ग्रेनाइट-पत्थरों के बीच छिपाकर ले जाया जा रहा है ताकि जांच एजेंसियों को शक न हो.

ऐसा ही एक मामला 15 मई को सामने आया. राजस्थान से गुजरात जा रही एक लग्जरी बस से 28 लाख रुपए की अवैध शराब जब्त की गई. बस की सीटों को इस तरह डिजाइन किया गया था कि नीचे शराब की पेटियां छिपाई गई थीं जबकि ऊपर यात्री आराम से बैठे और लेटे हुए थे. बस में शराब की बदबू आने पर एक यात्री ने पुलिस को सूचना दी. पुलिस ने पूरी बस की तलाशी ली, लेकिन कहीं शराब की कोई बोतल नजर नहीं आई. कुछ सीटों को नीचे तक लोहे से पैक देखकर पुलिस को शक हुआ. सीटों और सवारियों को हटाकर तलाशी ली गई तो शराब का जखीरा बरामद हुआ.

इसी तरह 16 मई को सिरोही की आबूरोड पुलिस ने मावल के पास एक ट्रक पकड़ा जिसमें ग्रेनाइट के बीच गुप्त खाने बनाकर शराब की 150 पेटियां छिपाई गई थीं. ग्रेनाइट स्लैब को बीच से इस तरह काटा गया था कि बाहर से देखने पर वह पूरी स्लैब ही नजर आती थी, लेकिन अंदर बने खानों में शराब की पेटियां छिपाई गई थीं. ये घटनाएं दिखाती हैं कि शराब तस्करी अब बेहद संगठित और चालाकी से की जा रही है.

गुजरात में शराब तस्करी का हरियाणा और पंजाब नेटवर्क इसलिए भी फल-फूल रहा है क्योंकि राजस्थान में इन दोनों राज्यों की तुलना में शराब महंगी है. इसके अलावा इन दोनों राज्यों में शराब की वैध और अवैध फैक्ट्रियां भी बड़ी संख्या में चलती हैं. इसी वजह से तस्कर हरियाणा और पंजाब से शराब लेकर राजस्थान के रास्ते गुजरात पहुंचाते हैं. इसके लिए शेखावाटी क्षेत्र सबसे बड़ा ट्रांजिट जोन बनकर उभरा है. चूरू, सीकर और झुंझुनूं से निकलने वाले कई रूट अजमेर, पाली, सिरोही, बाड़मेर, उदयपुर, डूंगरपुर और बांसवाड़ा होते हुए गुजरात तक जाते हैं. भारतमाला और दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे ने इन रास्तों को और तेज तथा सुविधाजनक बना दिया है.

आबकारी अधिकारी अमरजीत सिंह बताते हैं, "पंजाब में एक्साइज ड्यूटी राजस्थान से कम है, ऐसे में वहां से शराब की ज्यादा तस्करी होती है. हरियाणा में अंग्रेजी शराब राजस्थान से सस्ती होने के कारण वहां से बड़ी खेप शेखावाटी के जरिए गुजरात तक पहुंचाई जाती है."

हरियाणा-पंजाब के शेखावाटी से गुजरात तक शराब रूट 

हरियाणा से शेखावाटी के रास्ते गुजरात तक संचालित इस शराब तस्करी नेटवर्क की लंबाई करीब 700 से 800 किलोमीटर तक है. एक रूट हरियाणा बॉर्डर से सटे चूरू जिले के राजगढ़ से शुरू होता है, जो रतनगढ़, सरदारशहर, कुचामन, अजमेर, पाली और सिरोही होते हुए गुजरात तक पहुंचता है.

एक अन्य रूट हरियाणा से सटे झुंझुनूं जिले के सूरजगढ़, पिलानी और बुहाना से निकलता है जो सीकर, मकराना और पाली होते हुए आबूरोड से गुजरात में प्रवेश करता है.

इसी तरह एक रूट हरियाणा और पंजाब से सटे श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों से शुरू होता है और भारतमाला के जरिए बाड़मेर के बाखासर और सेडवा होते हुए गुजरात में प्रवेश करता है. इसके अलावा, बाड़मेर, जोधपुर और बीकानेर के रास्ते भी शराब की खेप गुजरात तक पहुंच रही है.

राजस्थान के सीमावर्ती इलाके इस नेटवर्क के सबसे अहम हिस्से बन चुके हैं. सिरोही का मावल और मंडार बॉर्डर, बाड़मेर का बाखासर और सेडवा क्षेत्र, उदयपुर का कोटड़ा, झाड़ोल और फलासिया, बांसवाड़ा का कुशलगढ़, बागीदोरा और सज्जनगढ़, तथा डूंगरपुर का रतनपुर, बिछीवाड़ा, मांडली और सिमलवाड़ा क्षेत्र तस्करी के मुख्य मार्ग हैं.

तस्करों का नेटवर्क हद से ज्यादा चालाक होने का एक उदाहरण यह भी है कि शराब से भरे वाहन के आगे एस्कॉर्ट गाड़ियां चलती हैं जो रास्ते में पुलिस नाकाबंदी और जांच की जानकारी लगातार पहुंचाती रहती हैं. कई मामलों में वाहनों की नंबर प्लेट बदली जाती है ड्राइवर बदल दिए जाते हैं और जीपीएस सिस्टम के जरिए पूरी मूवमेंट ट्रैक की जाती है.

पुलिस का मानना है कि यह नेटवर्क केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि कई राज्यों में फैले संगठित गिरोहों द्वारा संचालित किया जा रहा है. बॉर्डर के ग्रामीण इलाकों में तस्करों ने अपने स्थानीय संपर्क विकसित कर लिए हैं.

किसी भी बॉर्डर पर कड़ी निगरानी होने पर तस्कर आसपास के गांवों में पहुंच जाते हैं. वहां से मोटरसाइकिल, ऊंट, बैलगाड़ी और अन्य साधनों से शराब गुजरात तक पहुंचाई जाती है.

सड़कों पर बढ़ती निगरानी के बाद तस्करों ने अब ट्रेनों को भी नया ‘सेफ रूट’ बना लिया है. हाल के दिनों में जयपुर मंडल से गुजरने वाली कई ट्रेनों में लगातार शराब पकड़ी जा रही है. शराब को बैग, ट्रॉली, पार्सल और यहां तक कि ट्रेन के टॉयलेट पैनल में छिपाकर गुजरात भेजा जा रहा है.

भुज-बरेली, आश्रम एक्सप्रेस और साबरमती एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें तस्करों की पसंदीदा मानी जा रही हैं.

पिछले कुछ वर्षों में पुलिस और आबकारी विभाग ने करोड़ों रुपए की शराब जब्त की है और सैकड़ों कार्रवाई की हैं. इसके बावजूद तस्करी का नेटवर्क लगातार फैलता जा रहा है.

पुलिस और आबकारी सूत्रों का कहना है कि केवल छोटी खेप पकड़ने से इस कारोबार पर रोक संभव नहीं है. जब तक इसके पीछे काम कर रहे बड़े सिंडिकेट और वित्तीय नेटवर्क तक नहीं पहुंचा जाएगा, तब तक राजस्थान के रास्ते गुजरात जाने वाली अवैध शराब की सप्लाई पर पूरी तरह लगाम लगाना मुश्किल रहेगा.

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