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धरती की सबसे खतरनाक घटना की गवाह कश्मीर की गुर्युल घाटी को कब मिलेगी वैज्ञानिक पहचान?

क़रीब 25 करोड़ साल पहले हुए 'द ग्रेट डाइंग' के अवशेष मिलते हैं कश्मीर की इस घाटी में.

Kashmir's guryul fossils
कश्मीर की गुर्युल घाटी में मिले अवशेष
अपडेटेड 10 फ़रवरी , 2026

पिछले कई दशकों तक कश्मीर के बाहरी इलाकों में ब्रिटिश वैज्ञानिकों की मौजूदगी एक आम नज़ारा थी. ये लोग यहां की वादियों की खूबसूरती से ज़्यादा उन चट्टानों में दिलचस्पी रखते थे जिनमें धरती के इतिहास के सबसे बड़े रहस्य छिपे हैं. यह कहानी विशाल डायनासोरों के धरती पर आने से भी करीब 25 करोड़ साल पहले शुरू हो जाती है. तब जीवन ने सबसे बड़ा संकट झेला था.

श्रीनगर से करीब 20 किलोमीटर दक्षिण में ज़बरवान पहाड़ियों के आसपास बसे खोनमोह और ज़ेवान गांवों के लोग अक्सर हैरान रह जाते थे. कभी विदेशी वैज्ञानिक घोड़ों पर आते दिखते थे और बाद के वर्षों में एंबेसडर कारों में. उनका मकसद एक ही था, विशाल चट्टानों से नमूने इकट्ठा करना. बाद में पता चला कि यह इलाका गुर्युल घाटी है.

यह घाटी धरती के इतिहास की सबसे बड़ी सामूहिक विलुप्ति की घटना का गवाह है. जिसे वैज्ञानिक ‘ग्रेट डाइंग’ कहते हैं. इस घटना में समुद्र में रहने वाले करीब 90 प्रतिशत जीव और ज़मीन पर मौजूद लगभग 70 प्रतिशत जीवन हमेशा के लिए खत्म हो गया था. दुनिया के बेहद चुनिंदा और दुर्लभ भूवैज्ञानिक स्थलों में शामिल गुर्युल को अक्टूबर 2025 में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी GSI ने अंतरराष्ट्रीय महत्व का राष्ट्रीय भू-धरोहर स्थल घोषित किया. हालांकि कश्मीर में दशकों तक चले हालात की वजह से इस मान्यता में काफी देरी हुई. इस दौरान GSI और जापानी वैज्ञानिकों द्वारा की गई वर्षों की गहन रिसर्च भी लंबे समय तक वैश्विक मंच से दूर रही.

गुर्युल में मौजूद पर्मियन-ट्रायसिक दौर के अवशेष उस समय को दर्ज करते हैं जब करीब 25 करोड़ 10 लाख साल पहले धरती पर जीवन पेलियोजोइक युग से मेसोजोइक युग में दाखिल हुआ. आसान शब्दों में कहें तो यही वह समय था जब ट्रायलोबाइट्स, विशाल दलदली जंगल और पुराने जीवन रूप खत्म हुए और एक लगभग खाली धरती पर आगे चलकर डायनासोरों का युग शुरू हुआ. वैज्ञानिक इसे प्रकृति की जीवित प्रयोगशाला मानते हैं. यही वजह है कि गुर्युल भारत को यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में फॉसिल साइट्स की श्रेणी में जगह दिलाने की क्षमता रखता है.

GSI के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इंडिया टुडे को बताया कि गुर्युल को लेकर यूनेस्को में प्रस्ताव भेजने की तैयारी की जा रही है. इसमें सांस्कृतिक महत्व, ऐतिहासिक भूमिका और जैव विविधता से जुड़े पहलुओं को शामिल किया जाएगा. अधिकारी के मुताबिक प्रस्ताव पर काम चल रहा है और जल्द ही इसे औपचारिक रूप दिया जाएगा. फिलहाल भारत के पास यूनेस्को की अस्थायी सूची में 69 स्थल शामिल हैं. नियम के मुताबिक यूनेस्को हर साल हर देश से सिर्फ एक ही स्थल को अंतिम मंजूरी देता है, जिससे प्रतिस्पर्धा और भी कड़ी हो जाती है.

गुर्युल की सबसे बड़ी ताकत उसके फॉसिल्स की मोटाई है. यह इसे चीन के मेशान सेक्शन से अलग बनाती है, जो लंबे समय से पर्मियन-ट्रायसिक सीमा के लिए वैश्विक संदर्भ बिंदु माना जाता रहा है. GSI के दस्तावेज़ों के अनुसार गुर्युल में फॉसिल की मोटाई 2.6 मीटर से 6.1 मीटर तक पाई जाती है, जबकि चीन में यह मोटाई सिर्फ 0.27 मीटर से 0.36 मीटर के बीच है. वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर 1990 के दशक के आख़िरी वर्षों में कश्मीर में चरम उग्रवाद के कारण रिसर्च बाधित न हुई होती, तो गुर्युल को इस सीमा के लिए ग्लोबल स्ट्रैटोटाइप साइट घोषित किया जाना लगभग तय था.
GSI की एक विस्तृत रिपोर्ट में कहा गया है कि गुर्युल दुनिया के उन गिने-चुने स्थानों में शामिल है जहां पर्मियन-ट्रायसिक समय का पूरा सेक्शन सुरक्षित है. यहां Hindeodus parvus और Otoceras woodwardi जैसे अहम फॉसिल पाए जाते हैं. इसके अलावा ये खानमोह फॉर्मेशन के भीतर वैश्विक स्तर पर बायो-ज़ोनेशन स्टडी के लिए बेहद उपयोगी है.

1993 में इंटरनेशनल कमीशन ऑन स्ट्रैटिग्राफी के तहत बने पर्मियन-ट्रायसिक बाउंड्री वर्किंग ग्रुप ने चार जगहों को ग्लोबल स्ट्रैटोटाइप के लिए चुना था. इनमें चीन का मेशान, कश्मीर का गुर्युल, चीन का शांगसी और तिब्बत का सेलॉन्ग शामिल थे. लेकिन बाद की रिसर्च में शांगसी और सेलॉन्ग में जरूरी फॉसिल प्रमाण नहीं मिले और कश्मीर में राजनीतिक हालात बाधा बन गए. नतीजतन मेशान को वैश्विक मान्यता मिल गई.

अब विशेषज्ञ दोबारा इंटरनेशनल कमीशन ऑन स्ट्रैटिग्राफी के सामने गुर्युल को प्रमुख संदर्भ स्थल के रूप में पेश करने की तैयारी कर रहे हैं. गुर्युल पर पिछले चार दशकों से काम कर रहे और जम्मू विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के पूर्व प्रमुख जी एम भट्ट का कहना है कि 2007 से यूरोप, अमेरिका, चीन और कई अन्य देशों के 38 वैज्ञानिक इस स्थल पर रिसर्च कर चुके हैं. उनके मुताबिक गुर्युल से लगातार नई जानकारियां सामने आ रही हैं और हाल ही में ऐसे फॉसिल मिले हैं जो अब तक चर्चा में रहे फॉसिल्स से करीब 27 लाख साल अधिक पुराने हैं. 2028 में होने वाला इंटरनेशनल जियोलॉजिकल कांग्रेस भी गुर्युल को वैश्विक मंच पर लाने का एक अहम मौका माना जा रहा है, जहां दुनिया भर के हजारों भूवैज्ञानिक एक साथ जुटते हैं.

भूवैज्ञानिक रूप से विही जिले के नाम से जाना जाने वाला गुर्युल लंबे समय से ब्रिटिश भूवैज्ञानिकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है. माना जाता है कि 1886 में ब्रिटिश वैज्ञानिक रॉबर्ट ए सी गॉडविन ऑस्टिन ने यहां पहली बार फॉसिल की पहचान की थी. इसका ज़िक्र सर वॉल्टर लॉरेंस की मशहूर किताब वैली ऑफ कश्मीर में भी मिलता है. इसके बाद से ये इलाका अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के लिए अध्ययन का अहम केंद्र बन गया. 2013 में कनाडा के भूवैज्ञानिक माइकल एडवर्ड ब्रुकफील्ड की एक रिसर्च ने गुर्युल को दुनिया की पहली दर्ज सुनामी घटनाओं से भी जोड़ा. उन्होंने इसका संबंध साइबेरियन ट्रैप्स में हुए ज्वालामुखी विस्फोटों से जोड़ा जिन्हें ग्रेट डाइंग की बड़ी वजह माना जाता है. हालांकि कई वैज्ञानिकों ने इसे स्थानीय भूकंपीय गतिविधि मानते हुए इस निष्कर्ष पर आपत्ति भी जताई है.

GSI की मान्यता से गुर्युल के संरक्षण को लेकर उम्मीदें तो जगी हैं लेकिन चिंताएं अब भी बनी हुई हैं. खोनमोह इलाका औद्योगिक गतिविधियों का भी केंद्र है और भट्ट का आरोप है कि जम्मू कश्मीर स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन यानी J&K SIDCO व्यावसायिक हितों के लिए गुर्युल के इलाके में दखल दे रहा है.

गुर्युल ने सालों तक सीमेंट कंपनियों और स्थानीय खनन का दबाव झेला है. भट्ट और अन्य वैज्ञानिकों के लंबे संघर्ष के बाद 2017 में सरकार ने इसे संरक्षित स्थल घोषित किया. हालांकि इसे अंतरराष्ट्रीय फॉसिल पार्क के रूप में विकसित करने की योजना अब तक कागज़ों से बाहर नहीं आ सकी है.

भट्ट का कहना है कि J&K SIDCO की निर्माण गतिविधियों के कारण वैज्ञानिकों की साइट तक पहुंच भी प्रभावित हो रही है. उनके मुताबिक इससे यह सवाल उठता है कि हम अपने बेशकीमती प्राकृतिक धरोहरों को लेकर कितने गंभीर हैं. हालात की गंभीरता का अंदाज़ा 2007 में ब्रुकफील्ड द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे गए पत्र से भी लगाया जा सकता है जिसमें उन्होंने गुर्युल के संरक्षण की अपील की थी.

वैज्ञानिकों का कहना है कि GSI द्वारा किसी स्थल को भू-धरोहर घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है. सोसाइटी ऑफ अर्थ साइंटिस्ट्स के सचिव और GSI के पूर्व उप महानिदेशक सतीश त्रिपाठी के मुताबिक जब तक ऐसे स्थलों के संरक्षण के लिए ठोस कानूनी ढांचा नहीं बनेगा तब तक वे खनन और अतिक्रमण के खतरे में बने रहेंगे. उन्होंने इन स्थलों को जियो-पार्क के रूप में विकसित कर पर्यटन से जोड़ने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया.

2021 में यूनेस्को ने भू-विविधता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी और इसे भविष्य की विरासत बचाने के लिए अहम माना. गुर्युल को मिली मान्यता से कश्मीर में जियो-टूरिज्म की संभावनाएं ज़रूर बढ़ी हैं लेकिन घाटी में फैले दूसरे कई फॉसिल स्थल अब भी बेहद खराब हालत में हैं और खनन माफिया और अतिक्रमण के खतरे से जूझ रहे हैं.

वनस्पति विज्ञान के शिक्षक रऊफ हमज़ा बोधा का कहना है कि सभी फॉसिल स्थलों का संरक्षण जरूरी है. उनके अनुसार सरकार को फॉसिल म्यूज़ियम स्थापित करने चाहिए और शैक्षणिक संस्थानों को ऐसे स्थलों की शैक्षणिक यात्राओं के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. बोधा और उनके सहयोगी मंज़ूर जाविद ने 2021 में दक्षिण कश्मीर के अहर्बल, डक्सुम और कोकरनाग जैसे प्रमुख पर्यटन स्थलों में 40 करोड़ साल से भी पुराने फॉसिल स्थलों की खोज का दावा किया था.

बजट 2026 ने विरासत संरक्षण को लेकर कुछ नई उम्मीदें ज़रूर दिखाई हैं. बजट में 15 पुरातात्विक स्थलों को सांस्कृतिक केंद्र बनाने का प्रस्ताव रखा गया है. कश्मीर में यह उम्मीद की जा रही है कि गुर्युल भी इस खास सूची में अपनी जगह बना सकेगा और आखिरकार उसे वह पहचान मिलेगी जिसका गुर्युल दशकों से हकदार रहा है.

- कलीम गीलानी

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