scorecardresearch

केजरीवाल के बॉयकॉट के बावजूद हाई कोर्ट से सरकारी वकील की नियुक्ति क्यों?

दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली शराब नीति केस से जुड़े मामले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक का केस लड़ने के लिए एमिकस क्यूरी यानी न्याय मित्रों को नियुक्त करने का फैसला किया है

अरविंद केजरीवाल और जस्टिस स्वर्णकांता (फाइल फोटो)
अरविंद केजरीवाल और जस्टिस स्वर्णकांता (फाइल फोटो)
अपडेटेड 11 मई , 2026

दिल्ली आबकारी नीति केस में पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने हाई कोर्ट में जस्टिस स्वर्णकांता के बेंच के सामने पेश होने से इनकार कर दिया था.

ऐसे में 5 मई को जस्टिस स्वर्णकांता ने इस मामले में सुनवाई को आगे बढ़ाने के लिए बड़ा फैसला लिया था. अदालत ने साफ किया कि आरोपियों की गैरमौजूदगी में भी इस मामले की सुनवाई होगी.

इसके लिए कोर्ट की ओर से केजरीवाल समेत तीनों अनुपस्थित रहने वाले आरोपियों के लिए एमिकस क्यूरी यानी न्याय मित्र नियुक्त करने की घोषणा की गई है.

इसके बाद से ही यह सवाल उठने लगा है कि जस्टिस स्वर्णकांता केजरीवाल की मर्जी के बिना ही उनके लिए सरकारी वकील क्यों नियुक्त कराया और कोर्ट को इस मामले में सुनवाई के लिए इतनी जल्दबाजी क्यों है?
 
सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता के जरिए इस पूरे मामले के कानूनी पक्ष को आसान भाषा में समझते हैं:
 
केजरीवाल के बायकॉट के बावजूद एमिकस क्यूरी यानी न्याय मित्र या स्वतंत्र वकील की नियुक्ति क्यों हो रही है?

सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता के मुताबिक, केजरीवाल, सिसोदिया और पाठक के पेश नहीं होने के बावजूद जज को गुण-दोष के आधार पर अपील में सुनवाई और फैसला करना होगा. इसके लिए तीन सीनियर वकीलों की एमिकस यानी स्वतंत्र वकील के तौर पर नियुक्ति की जा रही है.

इस मामले में केजरीवाल के अलावा 22 अन्य आरोपी हैं. संविधान के अनु-22 (1) के अनुसार लोगों को मर्जी का वकील और निष्पक्ष ट्रायल का अधिकार है लेकिन इसकी आड़ में पक्षकारों के जरिए मनमाफिक बेंच के लिए जजों की फोरम शॉपिंग नहीं की जा सकती. जब वादी या वकील जानबूझकर अपने मामले को किसी विशेष न्यायाधीश या न्यायालय में स्थानांतरित करने का प्रयास करते हैं तो उसे फोरम शॉपिंग कहते हैं.

वकील विराग के मुताबिक, अन्य पक्षकारों के जवाब और तर्कों के आधार पर हाई कोर्ट में सुनवाई के बाद केजरीवाल के खिलाफ एकतरफा फैसला हो सकता है.
 
क्या केजरीवाल इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं?

विराग गुप्ता के मुताबिक तीनों आरोपियों ने पत्र लिखकर विरोध प्रदर्शित करते हुए जानबूझकर पेश नहीं होने का निर्णय लिया है, इसलिए उन्हें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के आधार पर सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलेगी. हालांकि हाई कोर्ट में फाइनल फैसला प्रतिकूल होने पर स्पेशल के जज के फैसले को बहाल करने की मांग के साथ केजरीवाल नए सिरे से सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलील दे सकते हैं.

मुकदमे की सुनवाई में जल्दी-जल्दी तारीख क्यों?

सुप्रीम कोर्ट के वकील गुप्ता बताते हैं कि हाई कोर्ट में CBI  की अपील पर केजरीवाल के अलावा 22 अन्य आरोपी हैं. इस अपील में सभी पक्षकारों का लिखित जवाब भी नहीं आया है. मामले में जवाब देने के लिए केजरीवाल को नया नोटिस भेजा जाना चाहिए.

पुराने लंबित मामलों को छोड़कर केजरीवाल मामले में जल्दी-जल्दी तारीख देकर सुनवाई करने से पुराने मुकदमों की सुनवाई में देर होती है. यह समझ से परे है कि यह सब जानते हुए भी जस्टिस शर्मा और केजरीवाल इस मामले को जरूरत से ज्यादा तूल क्यों दे रहे हैं. जल्दबाजी में हो रही सुनवाई से केजरीवाल के आरोपों को भी ताकत मिलेगी.
 
गर्मी की छुट्टी के बाद रोस्टर के अनुसार जज बदल सकते हैं तो आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट में मुकदमों की सुनवाई जजों के रिटायरमेंट तक उसी बेंच में होती है लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट में रोस्टर बदलने के साथ इस मामले की सुनवाई स्वर्णकांता शर्मा के बजाय किसी अन्य जज की बेंच के सामने हो सकती है.

बतौर विराग, गर्मी की छुट्टियों के बाद दिल्ली हाई कोर्ट में रोस्टर बदलने पर नए जज के सामने मामले की सुनवाई होने पर केजरीवाल की रिक्यूजल वाली एप्लीकेशन (कानूनी आवेदन है, जिसके द्वारा किसी मामले में पक्षकार अदालत से कुछ अनुरोध करता है) निरर्थक हो जाएगी. अगर जस्टिस शर्मा इस मामले में पार्ट हर्ड का न्यायिक आदेश पारित करें तो रोस्टर बदलने के बावजूद मामले की सुनवाई जस्टिस शर्मा के सामने ही होगी. 

पार्ट हर्ड का मतलब यह है कि अगर अदालत ने मामले की सुनवाई शुरू कर दी है लेकिन कार्यवाही पूरी नहीं हुई है और इसे अगली तारीख तक के लिए स्थगित कर दिया गया.
 
सीनियर वकील को वकालतनामा कैसे मिलेगा?

वकील गुप्ता के मुताबिक, पश्चिम बंगाल बनाम शिवानंद पाठक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2001 में कहा था कि न्याय सिर्फ होना ही नहीं बल्कि दिखना भी चाहिए. उसके अनुसार गरीब या असहाय लोगों को निःशुल्क कानूनी सहायता देने के लिए प्रावधान है. हालांकि,  केजरीवाल और दो अन्य लोग अगर मुकदमा नहीं लड़ना चाहते तो उनके लिए कोर्ट के जरिए जबरन सीनियर एडवोकेट की नियुक्ति कानूनी तौर पर कितना जायज है? इस सवाल का जवाब अब हर कोई जानना चाहता है.

जिला अदालत में केजरीवाल की तरफ से सीनियर वकीलों की बड़ी टीम थी लेकिन हाई कोर्ट की अर्जी में खुद पैरवी करने के बाद जस्टिस शर्मा के सामने सुनवाई के बहिष्कार का निर्णय लिया है. ऐसे में अगर जज सीनियर वकील को नियुक्त करते हैं तो उसके लिए पहले एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड या अन्य वकील को नियुक्त करना होगा जो सीनियर एडवोकेट को ब्रीफ कर सके. अगर केजरीवाल ने वकालतनामा देने से मना कर दिया तो सीनियर एडवोकेट किस आधार पर पैरवी  करेंगे? यह सवाल बेहद गंभीर और महत्वपूर्ण हो जाता है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि केजरीवाल वकालतनामा नहीं देंगे इसकी पूरी संभावना है.

वकालतनामा एक कानूनी दस्तावेज है, जो किसी व्यक्ति (मुवक्किल) के जरिए अपने वकील को अदालत में उनका पक्ष रखने, पैरवी करने और केस से जुड़े दस्तावेज दाखिल करने के लिए अधिकृत (Authorize) करने के लिए दिया जाता है.

विराग का मानना है कि एमिकस यानी न्याय मित्र सामान्यतः स्वतः लिए गए सु मूटो मामलों में जजों की मदद के लिए नियुक्त किए जाते हैं. केजरीवाल का पक्ष रखने के लिए नियुक्त वकीलों को कोर्ट के आदेश के बाद पक्षकारों की तरफ से वकालतनामा की जरूरत पड़ेगी. अगर उन्हें सिर्फ जज की मदद के लिए एमिकस के तौर पर नियुक्त किया गया तो उन्हें केजरीवाल के पक्ष में बहस करने वाले वकील नहीं माना जाएगा.

सीनियर वकील की फीस का भुगतान कौन करेगा?

विराग बताते हैं कि अगर सरकारी खर्चे में केजरीवाल को सीनियर एडवोकेट मिला तो भविष्य में और लोग भी ऐसी मांग कर सकते हैं.  इस मुकदमे में कई सारे पक्षकार हैं. सामान्य तौर पर जो लोग अपना पक्ष नहीं रखना चाहें उनके खिलाफ एकतरफा फैसला होता है.

अभियोजन पक्ष में सरकारी वकील को भी सरकार से पैसा मिलेगा और आरोपी के वकीलों को भी सरकार की तरफ से भुगतान होना गलत है. इस मामले में आरोपियों को विशेष राहत देना कानून के शासन के सिद्धांत के खिलाफ होगा.
 
केजरीवाल के आरोपों के बावजूद कोर्ट में अवमानना का मामला क्यों नहीं चल रहा?

विराग के मुताबिक, केजरीवाल या कोई भी नागरिक अदालत या जजों के खिलाफ सत्याग्रह करके जेल जाने का विकल्प अपना सकता है. हालांकि, सत्याग्रह की आड़ में न्यायिक प्रशासन में बाधा डालना और न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को दांव में लगाना पूरी तरह से गलत है. जस्टिस शर्मा के 20 अप्रैल के फैसले में जो निष्कर्ष दिए गए थे, उनके अनुसार केजरीवाल के खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला बन सकता है.

जस्टिस शर्मा के अनुसार उनकी योग्यता और फैसलों का निर्धारण नेतागिरी से नहीं हो सकता और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ही सक्षम संस्थान हैं. केजरीवाल के आरोप व्यतिगत जज के बजाय पूरी न्यायिक संस्था को बदनाम करने का प्रयास हैं. केजरीवाल के आरोपों से जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के साथ पूरी न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को आघात पहुंचा है, इसलिए इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अवमानना की कारवाई शुरु करने के बारे में निर्णय ले सकते हैं.

हालांकि, अवमानना की कारवाई शुरू करने की बजाय जज ने मामले की सुनवाई करने का फैसला लिया है. पूर्व कानून मंत्री स्व. शांतिभूषण और केंद्रीय मंत्री निशिकांत दुबे के मामलों से लगता है कि नेताओं और रसूखदार लोगों के मामलों में सामान्य तौर पर जज अवमानना की कार्रवाई शुरु करने से बचते हैं.

Advertisement
Advertisement