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आक्रोश, उम्मीद और जनसैलाब : जंतर-मंतर से ग्राउंड रिपोर्ट

मेरा ध्यान मंच की बाईं ओर गया जहां सोनम वांगचुक की तस्वीर के साथ भारत का संविधान, रामचरितमानस, बुद्ध और चरखा रखा था. मंच के नीचे कुछ वॉलंटियर्स लेटे थे. बताया गया कि वे कथित तौर पर पुलिस झड़प में घायल हुए हैं.

जंतर मंतर
जंतर मंतर
अपडेटेड 23 जुलाई , 2026

22 जुलाई का दिन था. दिल्ली उमस से परेशान थी लेकिन इसी दिल्ली का एक कोना गर्मी, बरसात, उमस कुछ भी मानने को तैयार नहीं था. केरला हाउस के बाहर से युवाओं का रेला बढ़ा जा रहा था. जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन में मंच के सबसे नजदीक यही एक रास्ता था.

रास्ते में पानी-खाना, कोल्ड ड्रिंक, जूस के लिए अजनबी लोग पूछ रहे थे. जगह-जगह पुलिसकर्मी बैठे थे. मैं जैसे-तैसे अंतिम बैरिकेडिंग पार कर एंट्री गेट तक पहुंचा. मैंने मंच के पास जाने के लिए आइडी दिखाया तो इंडिया टुडे पत्रिका के नाम पर मुझे अस्थाई सीढ़ियों पर तीन-चार लोगों ने चढ़ाया और मैं भीतर जा पहुंचा.

एक पल को लगा जैसे किसी ने मुझे उछालकर फेंक दिया हो. उस ऊंची-सी सीढ़ियों पर पहरेदार की तरह वॉलेंटियर बैठे थे. मंच से देखने पर पता चला कि वहां भीड़ नहीं हुजूम था. स्कूल के बच्चों से लेकर युवा तक तख्ती लेकर खड़े थे. एक निश्चित दूरी के उस पार कुछ युवा बैठे थे. कुछ खड़े थे. कुछ डिवाइडर के तौर पर लगाई बल्लियों पर लटके थे.

बात करने पर पता चला कुछ छात्र अपने माता पिता के साथ आए है्ं. कुछ लड़कियां माता-पिता से झूठ बोलकर, कुछ युवा नौकरी से छुट्टी लेकर तो कुछ ट्रेन से उतरे और सीधा जंतर मंतर पहुंच गए. किसी के बैग में किताबें भरी थीं. किसी में पानी की बोतलें. कुछ संविधान लेकर आए थे और कुछ पोस्टर्स और तिरंगा.

मंच पर लगातार आवाजाही रही. सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास और उनके अन्य साथी बैठे रहे. वृंदा करात, बजरंग पूनिया, पप्पू यादव समेत कई लोग आए और चले गए. मैंने सौरव दास से पूछा, यह तो ग़ैर राजनीतिक मंच था, राजनीतिक कैसे हो गया. उन्होंने कहा, "अभी भी है. हमारी मांगों के साथ जो आएग, उसका स्वागत है."

मेरा ध्यान मंच की बाईं ओर गया जहां सोनम वांगचुक की तस्वीर के साथ भारत का संविधान, रामचरितमानस, बुद्ध और चरखा रखा था. मंच के नीचे कुछ वॉलंटियर्स लेटे थे. बताया गया कि वे कथित तौर पर पुलिस झड़प में घायल हुए हैं.  मंच के पीछे फर्स्ट-ऐड था जिसमें तमाम दवाइयां, पट्टियां रखी थीं.

जिस समय मैं छात्रों से बात कर रहा था, एक युवा ने हाथ पंखा झालना शुरू किया. वहां बहुतेरे युवा बेना झुलाने के ही काम में लगे थे. यह बारी-बारी से चल रहा था.

मैंने देखा कि लगातार पानी, ORS, कोल्ड ड्रिंक, खाना, पित्ज़ा, समोसा, बर्गर, सेब, केले…बहुत कुछ आ रहा है. इतना कि रखा रहे पर कम न पड़े. ये सब कहां से आ रहा था नहीं पता लेकिन लगातार आ रहा था. मैंने मंच पर पूछा, ये सब कहां से आ रहा है? बताया गया कि लोग भेज रहे हैं.

तभी अनाउंसमेंट हुई, "जो पूछ रहा कि फंडिंग कहां से आ रही है, उन्हें बता देना कि इसकी फंडिंग कहां से आ रही है. अपने बिल सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दीजिए ताकि जवाब मिल जाए."

इसके बाद उत्साह बनाए रखने के लिए देशभक्ति गाने चलने लगे.

पुलिस वाले जितनी बार सामने से गुजरे, उतनी बार लूज़र-लूज़र के नारे लगे. पुलिस आती और चुपचाप निकल जाती. मंच से एनाउंसमेंट होती, इन्हें निकल जाने दीजिए. इग्नोर कीजिए. पूरी दुनिया इन्हें देख रही है. इन्होंने जो किया, ये भी जानते हैं.

स्कूल के बच्चों से लेकर प्रतियोगी परीक्षा के छात्र वहां ठसाठस भरे थे. शाम होते-होते ऐसा माहौल हुआ कि तिल फेंकने को जगह नहीं थी.

मैंने युवाओं से बात करनी शुरू की तो पाया कि उनके भीतर आक्रोश बहुत है. हिमाचल से लेकर हैदराबाद तक वे सरकार के शिक्षा के प्रति लचर रवैये को लेकर परेशान हैं. उनका मानना है कि जवाबदेही तय किए बिना व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है. थार से आए महावीर अपने गांव में शिक्षा के सुधार के लिए प्रदर्शन में शामिल होने आए तो मेवाड़ से अकेले बस से चली आईं सीमा अपने भाई और अपने भविष्य के लिए.

24 साल के सोमेश लगातार आगे खिसक रहीं परीक्षाओं की तारीख से तंग आ चुके हैं तो बारहवीं पास कर चुकी एंजल ने क्लैट की परीक्षा दी और वह भी विवादों के घेरे में फंस गई.

इसी भीड़ में जयश्री जैसे कई युवा भी नारे लगाते दिखे जो न तो किसी पेपर लीक के प्रत्यक्ष पीड़ित हैं और न ही किसी बीती विशेष भर्ती परीक्षा के उम्मीदवार. फिर भी वह सैकड़ों किलोमीटर दूर दिल्ली इसलिए आए क्योंकि उन्हें लगता है कि परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा टूटेगा तो उसका असर हर उस युवा पर पड़ेगा जो अपने बेहतर भविष्य का सपना देखता है.

दूर पोस्टर लेकर खड़े मुआन जैसे मणिपुरी युवा पेशेवर की मौजूदगी ने बताया कि जंतर-मंतर का यह आंदोलन  केवल प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहा. इसमें ऐसे लोग भी शामिल हुए जिनकी अपनी पढ़ाई पूरी हो चुकी है, नौकरी लग चुकी है लेकिन जो मानते हैं कि शिक्षा व्यवस्था में भरोसा बना रहना पूरे समाज की जिम्मेदारी है. मुआन ने कहा, "मैं इसलिए आया हूं ताकि सरकार को ये न लगे कि यहां युवा अकेले हैं."

इस बीच क्रांतिकारी युवा संगठन से जुड़ीं छात्रा मुदिता की आवाज में थोड़ी निराशा थी और आक्रोश भी. उनका कहना है, "आंदोलन में छात्रों के मुद्दे पीछे छूट गए हैं. वे पहले दिन से वहां मौजूद हैं लेकिन अब मंच पर बढ़ते वीआइपी कल्चर से निराश हैं. वे मानती हैं कि शिक्षा का मुद्दा व्यापक है, उस पर बात होनी चाहिए लेकिन इधर इस्तीफा छोड़िए, अब बातचीत के लिए राजी हो गए हैं सब. इसके लिए छात्र यहां नहीं आए थे."

जब मैं  प्रोटेस्ट साइट से लौट रहा था, मैंने देखा कि भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है. बाहर निकलना भी मुश्किल हो रहा था. रील बनाने की जैसे होड़ लगी थी. यूट्यूबर्स की बाढ़-सी आ गई हो. युवा नए और रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर आ रहे थे. संभव है कि वे पहली बार किसी प्रदर्शन में शामिल हो रहे हों. बहुत-से लोग यह पूछते हुए आ रहे थे कि आइसक्रीम कहाँ मिल रही है? शायद उनका इस प्रदर्शन से बहुत अधिक लेना-देना न हो लेकिन वे आ रहे हैं.

इसी बीच, छठी क्लास की दो बच्चियां हाथों में तख्तियां लिए खड़ी थीं. जब मैंने उनसे पूछा कि वे यहां क्यों आई हैं तो उन्हें बस इतना पता था कि वे प्रदर्शन में आई हैं. उनके माता-पिता इस बात से खुश थे कि लोग उनकी बेटियों की तस्वीरें खींच रहे हैं.

लौटते समय कानों में जो अंतिम आवाज पड़ी, वह एक लड़की की थी जो केरल हाउस के पास पुलिसकर्मियों पर चिल्लाते हुए कह रही थी, "अगर पुलिस वाले आपके जैसे होते हैं तो आपको शर्म आनी चाहिए."

इस पूरे दृश्य के दो अलग-अलग रूप दिखाई दे रहे थे. एक बड़ा हिस्सा ऐसा था, जो लगातार आता-जाता, बदलता हुआ 'फ़्लोटिंग क्राउड' था, जबकि दूसरा हिस्सा घंटों और कई दिनों से वहीं जमा हुआ था और प्रदर्शन का स्थायी चेहरा बन चुका था.

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