18 अप्रैल को ओडिशा के बालूगांव स्थित भारतीय नौसेना के प्रमुख प्रशिक्षण केंद्र INS चिल्का से एक अग्निवीर प्रशिक्षु का शव फंदे से लटका हुआ बरामद किया गया. इस घटना ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
मृतक की पहचान बिहार के भोजपुर जिले के सरीपुर गांव निवासी 19 वर्षीय विकास कुमार के रूप में हुई है. उसके पिता पिंटू साह ने बालूगांव थाने में दर्ज शिकायत में बताया कि विकास करीब दो महीने पहले अग्निवीर के रूप में प्रशिक्षण केंद्र में शामिल हुआ था.
प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, 18 अप्रैल की रात INS चिल्का परिसर के जिम के अंदर विकास की कथित तौर पर फांसी लगाने से मौत हुई. हालांकि, परिवार ने आत्महत्या के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है. पिता का कहना है कि उनका बेटा आत्महत्या जैसा कदम उठाने वाला नहीं था. उन्होंने मौत की परिस्थितियों की निष्पक्ष व गहन जांच की मांग की है.
परिवार को नौसेना अधिकारियों ने अगली सुबह उसकी अस्वाभाविक मौत की सूचना दी. बाद में पिंटू साह INS चिल्का पहुंचे और बेटे के शव की पहचान की. पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. फॉरेंसिक टीम ने घटनास्थल का निरीक्षण किया है. पोस्टमार्टम के बाद शव परिवार को सौंप दिया गया.
इससे पहले 8 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के अग्निवीर प्रशिक्षु कार्तिक यादव भी इसी तरह संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाए गए थे. अधिकारी इस प्रशिक्षण केंद्र में इतने कम अंतराल में हुई इन दो मौतों के कारणों की जांच कर रहे हैं. विकास कुमार के पिता पिंटू साह ने बताया कि विकास अपनी मां से नियमित रूप से बात करता था, लेकिन उसने कभी किसी परेशानी का जिक्र नहीं किया था.
मौत की पहली घटना
बीते 17 फरवरी को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के मोहम्मदपुर गांव निवासी 19 वर्षीय कार्तिक यादव को भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था. इसके बाद कार्तिक बालूगांव स्थित भारतीय नौसेना प्रशिक्षण केंद्र पहुंचा. कुछ दिनों की ट्रेनिंग के बाद 7 अप्रैल को उसने अपनी मां को फोन कर बताया कि वह प्रशिक्षण पूरा किए बिना नौकरी से इस्तीफा देना चाहता है और उसने इस्तीफे के पत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा.
हालांकि, कार्तिक की मां ने कथित तौर पर इस्तीफे के पत्र पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया और उसे प्रशिक्षण जारी रखने के लिए समझाया. घटना वाले दिन उसने दोपहर करीब 12 बजे फिर मां को फोन किया और प्रशिक्षण जारी न रखने की इच्छा जताई. लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उसकी मां ने उसे फिर से ट्रेनिंग पूरी करने के लिए मनाने की कोशिश की.
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, वह कठोर प्रशिक्षण कार्यक्रम को लेकर कथित तौर पर मानसिक तनाव में था. बीते 9 अप्रैल को उसने प्रशिक्षण केंद्र के बैरक नंबर 7 के अंदर रस्सी के सहारे फांसी लगाकर कथित रूप से आत्महत्या कर ली. इसके बाद पिता राजकुमार ने बालूगांव थाना क्षेत्र के अंतर्गत नौसेना पुलिस चौकी में बेटे की आत्महत्या को लेकर शिकायत दर्ज कराई थी.
हर साल 100 से 140 जवान करते हैं आत्महत्या
जुलाई 2024 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, अग्निवीर के पहले बैच में भी लगभग 50 जवानों ने बीच में ही ट्रेनिंग छोड़ दी थी. यही नहीं, साल 2023 में 11 अक्टूबर को जम्मू में मृत पाए गए 19 वर्षीय अग्निवीर अमृतपाल सिंह को सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई नहीं दिए जाने पर सेना की आलोचना हुई थी. इसके जवाब में इंडियन आर्मी ने X पर एक पोस्ट साझा की थी. इसमें इस बात का जिक्र था कि साल 2001 से भारतीय सेना में हर साल 100 से 140 जवान आत्महत्या करते हैं. वहीं कांग्रेस पार्टी के एक्स-सर्विसमैन सेल के राष्ट्रीय अध्यक्ष कर्नल रोहित चौधरी के मुताबिक, अब तक 40 से अधिक अग्निवीरों ने आत्महत्या की है.
आखिर इसकी वजह क्या है? कर्नल रोहित चौधरी कहते हैं, "इसकी तीन वजहें हैं. पहला ट्रेनिंग, दूसरा सिलेक्शन और तीसरा सेफ्टी ऑफ करियर. जहां तक ट्रेनिंग की बात है, उसे कम कर दिया गया है. रेगुलर आर्मी को पहले एक साल ट्रेनिंग दी जाती है, फिर छह महीने उसे उसकी यूनिट में ट्रेन किया जाता है. अगले तीन से चार साल तक वह बस रंगरूट रहता है, जिससे वह शारीरिक और मानसिक तौर पर मजबूत बनकर तैयार होता था. अग्निवीरों के साथ यह पूरी प्रक्रिया ही छोटी कर दी गई है. चार साल के करियर में छह महीने ट्रेनिंग और छह महीने की छुट्टी है. बचे हुए तीन साल में वह काम करेगा या फौज की तरह तैयार होगा?"
दूसरी चीज सिलेक्शन है. पुरोहित के मुताबिक, "फौज में भर्ती होने के लिए पांच मिनट में दौड़ का पैरामीटर सेट करते थे, हमें 4:30 मिनट में ही मजबूत लड़के मिल जाते थे. अब अग्निवीरों के लिए छह मिनट का पैरामीटर सेट कर दिया गया है. स्टैंडर्ड तो यहीं कमजोर कर दिया गया. चयन में कई तरह के समझौते किए जा चुके हैं."
तीसरा कारण सेफ्टी ऑफ करियर है. कर्नल चौधरी के अनुसार, "रेगुलर आर्मी और अग्निवीरों के बीच बहुत अंतर हो गया है. अग्निवीर को न शहीद का दर्जा मिलता है और न ही मुआवजा. अगर वह देश के लिए जान दे भी दे, तो उसके परिवार का भविष्य सुरक्षित नहीं है. रेगुलर आर्मी में शहीद होने पर सर्विस की उम्र तक की पूरी सैलरी, परिवार को मेडिकल, कैंटीन और बच्चों को शिक्षा आदि की सुविधा मिलती है. जब अग्निवीर अपना भविष्य ही सुरक्षित नहीं देख पाएगा, तो वह दबाव कैसे झेलेगा? कार्यकाल पूरा करने के बाद भी वह पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक दबाव के बीच ही बाहर आता है."
वे आगे यह भी कहते हैं, "इन आत्महत्याओं को देखते हुए नई गाइडलाइन यह है कि अग्निवीरों को संवेदनशील और अधिक दबाव वाले क्षेत्रों में तैनात नहीं किया जाता है. यही नहीं, इन पर विशेष निगरानी भी रखी जाती है. इन सबके बीच राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित होती है. फौज की नौकरी को पूरा गांव मनाता था, लेकिन अग्निवीर की नौकरी को कोई सेलिब्रेट नहीं कर रहा है. ऊपर से जो लोग चार साल के बाद सेवा जारी नहीं रख पाते, वे अलग सामाजिक दबाव के बीच घर लौट रहे हैं. इसमें वे खुद को कमतर आंक रहे होते हैं."
कर्नल रोहित अग्निवीर स्कीम पर भी सवाल उठाते हैं. वे कहते हैं, "सेना से बाहर निकलने के बाद भी उनके अंदर वह सैन्य अनुशासन नहीं आ पाता जो कठोर ट्रेनिंग और साथियों के साथ दुश्मनों से लड़ने से आता है. हर साल 50 हजार से अधिक युवा बाहर आ रहे हैं और आगे भी आते रहेंगे. बमुश्किल दो हजार को नौकरी मिल रही है, बाकी क्या करेंगे? जब सैन्य संस्कार नहीं रहेंगे, तो ये प्रशिक्षित गनमैन के अलावा कुछ नहीं होंगे. यह आने वाले समय में खतरनाक साबित होने जा रहा है."

