10 फरवरी को प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) ने बताया कि रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2026 का ड्राफ्ट डॉक्यूमेंट रक्षा मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है. भारत सरकार ने तीन सप्ताह के अंदर आमलोगों से इस पर ऑनलाइन सुझाव मांगे हैं.
रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) से जुड़े नए नियम को बनाने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है. नए नियमों से जुड़े दस्तावेज को अप्रैल से पहले सार्वजनिक होने की उम्मीद है. DAP सशस्त्र बलों के जरिए हथियार, सैन्य उपकरण और बाकी जरूरी चीजों की खरीद के लिए एक प्रमुख फ्रेमवर्क है.
DAP रक्षा और सैन्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करता है तथा स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए एक पारदर्शी और समयबद्ध प्रक्रिया निर्धारित करता है. सीमा सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के बढ़ने और सेना की जरूरत के साजो-सामान को जल्द से जल्द खरीदने के लिए रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया और इससे जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया जा रहा है.
इसके अलावा, DAP 2026 के लागू होने से मौजूदा DAP 2020 की खामियों को दूर किए जाने और प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित किए जाने की उम्मीद है. DAP की लंबी समय-सीमा और प्रक्रियात्मक जटिलता के कारण अक्सर आलोचना होती रही है.
मिल रही जानकारी के मुताबिक, नए DAP में भारतीय सैन्य प्रणाली में चीन निर्मित सामानों पर पूरी कड़ाई से रोक लगाने की बात शामिल की जा सकती है. ड्रोन बनाने में इस्तेमाल होने वाले चीनी पुर्जे पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है. भारतीय सेना के आर्मी डिजाइन ब्यूरो (ADB) ने सैन्य और ड्रोन इंडस्ट्री के टॉप लीडर्स के साथ बातचीत के बाद ऑडिट में पहचाने गए सुरक्षा जोखिमों के आधार पर सैन्य ड्रोनों से चीनी गैजेट्स और सॉफ़्टवेयर को हटाने के लिए एक सख्त नियम बनाने की अपील की है.
गौरतलब है कि रक्षा मंत्रालय ने पिछले साल चीन सीमा पर तैनात किए जाने वाले 400 ड्रोनों की खरीद के तीन अनुबंधों को रद्द कर दिया था. ऐसा इसलिए क्योंकि उनमें इस्तेमाल किए गए चीनी पुर्जों और इलेक्ट्रॉनिक्स से सुरक्षा संबंधी खतरे थे. विशेषज्ञ लंबे समय से चीनी पुर्जों वाले 'मेड इन इंडिया' ड्रोनों की साइबर सुरक्षा संबंधी कमजोरियों के बारे में चेतावनी देते रहे हैं.
सबसे बड़ा खतरा डेटा लीक का है, जिससे संवेदनशील सैन्य अभियानों से संबंधित जानकारी तक दूसरे देशों की आसान पहुंच हो सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, विशेष रूप से संचार मॉड्यूल, कैमरों और नियंत्रण प्रणालियों में अंतर्निहित बैकडोर (सुरक्षा सुविधाओं को दरकिनार करने वाले तंत्र) का उपयोग हो सकता है. इसका इस्तेमाल दुश्मन खुफिया जानकारी निकालने, मिशनों को बाधित करने या यहां तक कि ऑपरेशन के दौरान ड्रोन पर नियंत्रण हासिल करने के लिए कर सकते हैं.
उद्योग जगत के एक जानकार का तर्क है कि भारत में कम लागत वाले चीनी ड्रोनों की संख्या तेजी से बढ़ना, उस खरीद प्रणाली का परिणाम है जो लागत कम करने को प्राथमिकता देते हैं. भले ही इसके बदले सुरक्षा या रणनीतिक मूल्य दांव पर क्यों ना लग जाए. सूत्र ने सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) पर रिवर्स ऑक्शन (RA) तंत्र को इसकी मुख्य खामी बताया है.
इसे ऐसे समझें कि जैसे ही सरकार कोई सामान (जैसे ड्रोन) खरीदने के लिए टेंडर निकालती है. इसके लिए कंपनियां बोली लगाती हैं. सबसे कम कीमत की बोली लगाने वाली कंपनी को L1 कहा जाता है. L1 तय होने के बाद प्रक्रिया रुकती नहीं बल्कि नई शुरुआत हो जाती है. L1 की कीमत अब सिर्फ शुरुआती बिंदु बन जाती है. अब सभी कंपनियां एक-दूसरे से और कम कीमत देने की होड़ में लग जाती हैं. यह एक तरह से कीमत घटाने की रेस बन जाती है.
इस प्रक्रिया से आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा, डेटा जोखिम या दीर्घकालिक स्थिरता जैसे किसी भी सार्थक विचार को हटा दिया जाता है. रिवर्स ऑक्शन इस असंतुलन को और भी गहरा कर देता है. एक सूत्र के मुताबिक, "जब तक आरए (RA) तंत्र में मौलिक रूप से बदलाव नहीं किया जाता, भारत को सस्ते चीनी ड्रोन खरीदने का जोखिम उठाना पड़ेगा. इससे अल्पावधि में मामूली बचत होगी, लेकिन दीर्घकालिक तकनीकी संप्रभुता और सुरक्षा कमजोर होगी."
GeM का रिवर्स ऑक्शन सिस्टम सिर्फ सस्ता सामान लाने पर फोकस करता है, लेकिन गुणवत्ता, सुरक्षा और भारत के अपने उद्योग को नुकसान पहुंचाता है. नतीजा: सस्ते चीनी ड्रोनों का बाजार बढ़ता जा रहा है, जो लंबे समय में देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है.
इस पूरी प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों के मुताबिक, नई विकास प्रक्रिया योजना (DAP) का एक प्रमुख उद्देश्य समयबद्ध खरीद प्रक्रिया को सुनिश्चित करना है, जिसमें आवश्यकता की स्वीकृति (AON) से लेकर अनुबंध समापन तक हर चरण में सख्त समयसीमा तय की जाएगी. ताकि परियोजनाएं वर्षों तक रुकी न रहें.
नए नियमों में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दिए जाने की संभावना है, जिसमें स्वदेशी सामग्री मानदंड, भारतीय निजी उद्योग और MSME को अधिक सपोर्ट और घरेलू स्तर पर विकसित प्रणालियों के लिए अधिक लचीले खरीद मार्ग शामिल होंगे. तत्काल परिचालन आवश्यकताओं के लिए विशेष नियम बनाए जाने की उम्मीद है, जिससे सशस्त्र बलों को निगरानी में कोई समझौता किए बिना लंबी प्रक्रियाओं से बचने की सुविधा मिलेगी.
नई रक्षा नीति में एक और सुधार की उम्मीद है, जो कि बिना लागत और बिना प्रतिबद्धता वाले (NCNC) परीक्षण हैं. अब तक, रक्षा क्षेत्र से जुड़े हथियारों को बनाने वाली कंपनियां परीक्षण का खर्चा खुद ही उठाती थीं. जब तक की उसे कोई अनुबंध नहीं मिल जाए. संभावित नए नियम के तहत, रक्षा मंत्रालय उन कंपनियों के परीक्षण खर्चों का उठाएगा जो परीक्षण में सफल होती हैं और बोली लगने से पहले ही चयनित हो जाती हैं. इससे इन कंपनियों की एक महत्वपूर्ण वित्तीय बाधा दूर होगी और डिफेंस सेक्टर की कंपनियों के बीच अधिक प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहन मिलेगा.

