21-22 फरवरी की रात जब भारत ने अमेरिका को खबर दी कि उसके अधिकारी 23-24 फरवरी की मीटिंग के लिए वाशिंगटन नहीं आएंगे, तो यह सिर्फ मीटिंग टालना नहीं था. यह एक बहुत ही सोचा-समझा फैसला था.
यह फैसला तब आया जब कुछ ही दिन पहले अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने वहां की ट्रेड पॉलिसी की पूरी तस्वीर ही बदल दी. कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाया कि राष्ट्रपति के पास मनमाने तरीके से 'टैरिफ' थोपने की ताकत नहीं है.
चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स के इस फैसले ने डोनाल्ड ट्रंप के दौर के उस 'संरक्षणवाद' की कानूनी नींव हिला दी, जिसके दम पर वे दूसरे देशों पर भारी टैक्स लगाते थे.
अचानक ज़मीन खिसकते देख ट्रंप प्रशासन ने आनन-फानन में कंट्रोल वापस पाने की कोशिश की. उन्होंने 1974 के ट्रेड एक्ट की 'धारा 122' का इस्तेमाल किया. यह एक ऐसा पुराना नियम है जो राष्ट्रपति को बिना संसद की मंज़ूरी के 150 दिनों के लिए 15 फीसद तक टैक्स लगाने की छूट देता है.
नतीजा यह हुआ कि अमेरिका ने पूरी दुनिया के लिए एक जैसा 'अस्थाई टैक्स' लगा दिया. पहले इसे 10 फीसद रखा गया और फिर बढ़ाकर 15 फीसद कर दिया गया. अमेरिका यह दिखाना चाहता था कि कोर्ट के झटके के बावजूद वह सख्त है, लेकिन असल में उसने कई अलग-अलग टैक्सों की जगह एक 'टाइम-बाउंड' टैक्स लगा दिया.
भारत के लिए इस अचानक हुए बदलाव ने पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया. जिस ट्रेड डील का ड्राफ्ट तैयार हो रहा था, वह पुराने टैक्स ढांचे पर टिका था. उसमें भारत को मिलने वाली छूट (Generalized State of Preference) और अमेरिका के खेती व मेडिकल सामानों को भारत में एंट्री देने जैसी कई बातों पर सहमति बननी थी.
अब उस बातचीत की टेबल पर मौजूद हर 'नंबर' धुंधला हो गया है. भारत के वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि यह मीटिंग टालना 'पीछे हटना नहीं, बल्कि रणनीति बदलना' है. भारत यह साफ़ तौर पर जानना चाहता है कि यह 15 फीसद वाला टैक्स आगे भी रहेगा या 150 दिन बाद खत्म हो जाएगा? और सबसे बड़ी बात ये कि अमेरिका की संसद (कांग्रेस) इस पर क्या रुख अपनाती है.
ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के पास संसद में बहुत मामूली बहुमत है. ऐसे में इस टैक्स को 150 दिन से आगे ले जाने के लिए ट्रंप प्रशासन को पसीना बहाना पड़ सकता है. जब तक यह तस्वीर साफ़ नहीं होती, भारत ऐसी किसी डील को फाइनल नहीं करना चाहता जिसकी वैल्यू रातों-रात खत्म हो जाए.
सावधानी के पीछे पुराना कड़वा अनुभव भी है. पिछले एक दशक में भारत ने देखा है कि अमेरिका कभी उदारीकरण की बात करता है तो कभी अकेले अपने फैसले थोपता है. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने एक बार फिर दिखा दिया कि वहां की सरकार के साथ किया गया समझौता भी कोर्ट या संसद कभी भी पलट सकती है. भारत अब ऐसे किसी जाल में नहीं फंसना चाहता जो खुद अमेरिका के राजनीतिक और कानूनी झगड़ों की भेंट चढ़ जाए.
इस देरी से भारत का पलड़ा भी थोड़ा भारी हुआ है. फरवरी की शुरुआत तक पलड़ा अमेरिका की तरफ था क्योंकि भारत टैक्स में राहत चाहता था. लेकिन कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिकी सरकार के पास सौदेबाजी की ताकत कम हो गई है. अब वह जो भी छूट देगी, उसे वहां की अदालतों में चुनौती दी जा सकती है.
भारत को कोई जल्दी नहीं है. पिछले साल अमेरिकी टैक्स के बावजूद भारत का एक्सपोर्ट 6.8 फीसद बढ़कर 86 अरब डॉलर पहुंच गया. भारत और अमेरिका के बीच कुल व्यापार (गुड्स और सर्विस मिलाकर) 2024 में 212 अरब डॉलर के पार था.
रिश्ते इतने मजबूत हैं कि एक मीटिंग टलने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन अमेरिका के लिए यह स्थिति थोड़ी असहज है. वह इस डील को एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर दिखाना चाहता था. वहीं मोदी सरकार के लिए, टैक्स के इस उतार-चढ़ाव के बीच जल्दबाजी में दस्तखत करना घाटे का सौदा लग सकता था.
यह ब्रेक एक सीधा संदेश देता है: भारत के लिए 'रफ़्तार' से ज्यादा 'भरोसा' और 'नियम' मायने रखते हैं. यह हमारे स्टील, एल्युमीनियम और ऑटो सेक्टर के कारोबारियों को भी भरोसा देता है कि उनकी चिंताओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाएगा.
जानकारों का कहना है कि समझौते का 80 फीसद हिस्सा तैयार था. अब खेती, डेटा और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी जैसे जो मुद्दे बचे हैं, वे सब टैक्स के गणित पर टिके हैं. एक अधिकारी ने चुटकी लेते हुए कहा, "जब बेस नंबर ही बदल गया हो, तो आप प्रतिशत पर मोलभाव कैसे कर सकते हैं?"
फिलहाल पूरी दुनिया में अनिश्चितता का माहौल है. वियतनाम, थाईलैंड और मलेशिया जैसे देश जो अब तक चीन-अमेरिका झगड़े का फायदा उठा रहे थे, वे भी अब भारत की तरह ही 15 फीसद टैक्स के दायरे में आ गए हैं.
ऐसे माहौल में भारत का संयम समझदारी भरा है. सरकार अब देखेगी कि क्या अमेरिकी संसद इस टैक्स को चुनौती देती है या क्या अमेरिकी कंपनियां ही इसके खिलाफ खड़ी होती हैं. अगर 150 दिन बाद यह टैक्स खुद ही खत्म हो जाता है, तो बातचीत फिर से पुख्ता ज़मीन पर शुरू होगी.
आज के दौर में व्यापार सिर्फ टैक्स का खेल नहीं, भरोसे का खेल है. वाशिंगटन की फ्लाइट टालना शायद छोटी बात लगे, लेकिन यह वो पल है जब नई दिल्ली ने तय किया कि भारत-अमेरिका व्यापार की अगली किश्त 'सियासी दिखावे' से नहीं, बल्कि 'रणनीतिक धैर्य' से लिखी जाएगी.

