"मैं यहां रोज़ी-रोटी कमाने आया था, लेकिन खतरनाक बमों और मिसाइलों के हमलों के बीच जान बचाना मुश्किल हो गया है. मैं मोदी जी और भारत सरकार से अनुरोध करता हूं कि हमें यहां से सुरक्षित निकाल लें." यह अपील दुबई में काम करने वाले एक भारतीय मजदूर की है जो इंस्टाग्राम पर काफी शेयर हो रही है.
इस तरह की कई आवाजें और पोस्ट हैं जिनके जरिए मदद की गुहार लगाई जा रही हैं. जंग के बीच ईरान समेत खाड़ी और पश्चिम एशिया के अन्य देशों में करीब 90 लाख से अधिक भारतीय रह रहे हैं. इनकी सुरक्षा को लेकर 1 मार्च की रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास पर तीन घंटे सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) की बैठक चली.
CCS की बैठक से ठीक तीन दिन पहले प्रधानमंत्री मोदी इजरायल दौरे पर थे. इस दौरान भारत और इजरायल के बीच एक संयुक्त वक्तव्य जारी हुआ जिसे 26 फरवरी को भारत के विदेश मंत्रालय ने सार्वजनिक किया. इसके 36वें बिंदु में अगले पांच वर्षों में 50,000 अतिरिक्त भारतीय कामगारों को इजरायल भेजने की बात कही गई है.
जंग के माहौल में कामगार भेजने का फैसला क्यों?
इजरायल में अक्सर एयर डिफेंस सायरन गूंजते रहते हैं, जब आम नागरिक हमलों के साये में जी रहे हैं और जब लगातार क्षेत्रीय तनाव बना हुआ है तब भारत सरकार की तरफ अतिरिक्त कामगार भेजने की बात क्यों?
अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अरुण कुमार के अनुसार, "भारतीय कामगारों को इजरायल भेजने का निर्णय आंशिक रूप से घरेलू बेरोज़गारी और रणनीतिक कूटनीतिक कारणों से जुड़ा हो सकता है. उनके मुताबिक, जटिल भू-राजनीतिक हालात में ऐसे समझौते दो देशों के संबंधों को मजबूत करते हैं.”
वे यह भी कहते हैं कि इजरायल में फिलहाल श्रमबल की कमी है. पहले बड़ी संख्या में फिलिस्तीनी कामगार वहां काम करते थे, लेकिन सुरक्षा कारणों से अब उनकी संख्या सीमित है. कृषि, निर्माण, प्लंबिंग, सामान्य श्रम और आईटी जैसे क्षेत्रों में कामगारों की आवश्यकता बनी हुई है, जिसे भारत पूरा कर सकता है.
वहीं, विदेश नीति विशेषज्ञ प्रोफेसर राजन कुमार का मानना है कि ऐसे समझौते तात्कालिक परिस्थितियों से परे लंबी रणनीति के तहत किए जाते हैं. हालांकि, उनका मानना है कि जब क्षेत्रीय युद्ध की आशंका बनी हो, तब इस तरह के निर्णय स्वाभाविक रूप से सवालों के घेरे में आते हैं.
भारत की विदेश नीति पारंपरिक रूप से इजरायल और फिलिस्तीन के मुद्दे पर संतुलित रही है. ऐसे में उच्चस्तरीय दौरे और श्रम समझौते वैश्विक स्तर पर संदेशों की व्याख्या को प्रभावित कर सकते हैं.
'मेक इन इंडिया’ के बावजूद विदेशों में रोजगार की जरूरत क्यों?
प्रोफेसर अरुण कुमार मानते हैं कि केवल अभियान चलाने से रोजगार सृजन संभव नहीं होता; इसके लिए ठोस संरचनात्मक निवेश की जरूरत होती है. बजट में पूंजीगत व्यय (कैपिटल एक्सपेंडिचर) बढ़ाने के साथ-साथ श्रम-प्रधान क्षेत्रों जैसे, ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और मनरेगा जैसी योजनाओं में लगातार निवेश जरूरी है.
भारत में 20 से 40 वर्ष आयु वर्ग के बीच बेरोजगारी एक गंभीर चुनौती है. लोग बड़ी तादाद में बाहर काम रहे हैं इसीलिए खाड़ी देशों से आने वाला धन यानी रेमिटेंस भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश है.
अगर पश्चिम एशिया में जंग फैली तो क्या असर होगा?
विदेश मामलों के जानकार राजन कुमार के मुताबिक अगर क्षेत्रीय संघर्ष व्यापक रूप लेता है, तो भारत के सामने दोहरी चुनौती होगी. पहली, 90 लाख से अधिक भारतीयों की सुरक्षा और दूसरा, रेमिटेंस में संभावित गिरावट.
1990-91 के खाड़ी युद्ध के दौरान भारत ने बड़े पैमाने पर रेस्क्यू अभियान चलाया था. उस समय विदेशी मुद्रा संकट भी गहराया था, हालांकि वर्तमान में भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार है. फिर भी, रेमिटेंस में कमी का असर रोजगार और घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.
इस बार भी CCS की बैठक में पश्चिमी एशिया में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा और संभावित निकासी योजनाओं पर चर्चा की गई है. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए सभी संबंधित देशों के साथ मिलकर काम करेगा, वहीं केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने बताया कि सरकार विदेश में भारतीय दूतावासों के संपर्क में है और हालात पर नजर रखे हुए है. उन्होंने यूक्रेन से भारतीयों की सफल निकासी का उदाहरण देते हुए भरोसा दिलाया कि संकट की स्थिति में सरकार कार्रवाई करेगी.
हालांकि पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल जे.एस. सोढ़ी कहते हैं कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो 90 लाख से अधिक लोगों को निकालना बेहद जटिल होगा. वे इसकी वजहों पर बात करते हुए कहते हैं कि एक तो विमान में औसतन 300–350 यात्रियों को लाया जा सकता है. वहीं इतने बड़े पैमाने पर निकासी के लिए सैकड़ों उड़ानों की जरूरत होगी.
इसके अलावा रेस्क्यू के दो प्रमुख रास्ते- हवाई और समुद्री रास्ते होते हैं. अगर एयरस्पेस बंद हो या बंदरगाह असुरक्षित हो तो बड़े पैमाने पर सुरक्षित निकासी कठिन हो जाती है. ऐसे में युद्धविराम या मानवीय गलियारे (Humanitarian Corridor) की सहमति आवश्यक हो सकती है.
इस पूरे परिदृश्य में भारत एक नाजुक संतुलन की स्थिति में खड़ा है. एक ओर रणनीतिक साझेदारियां और वैश्विक कूटनीति, दूसरी ओर लाखों भारतीयों की सुरक्षा और आर्थिक प्रभाव का संतुलन. आने वाले दिनों में अगर परिस्थितियां मुश्किल होती गईं तो सरकार की मुश्किलें भी बढ़ सकती हैं.

