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महंगाई और बढ़ी, आगे राहत की उम्मीद क्यों नहीं दिख रही?

देश में खुदरा महंगाई सितंबर में बढ़कर 5.54 फीसदी पर पहुंच गई है और अक्टूबर में इसके 6 फीसदी के करीब पहुंचने का अनुमान है

Consumer price index-based inflation rose to 5.54% in September from 4.83% in August
खाद्य वस्तुओं में महंगाई ज्यादा बढ़ी है (सांकेतिक तस्वीर)
अपडेटेड 15 अक्टूबर , 2026

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, खुदरा महंगाई अगस्त के 4.84 फीसदी से बढ़कर सितंबर में 5.54 फीसदी हो गई. यह जनवरी के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) की संशोधित श्रृंखला के तहत भी यह महंगाई का सबसे ऊंचा स्तर है. ग्रामीण क्षेत्रों में महंगाई 6.08 फीसदी रही जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 4.88 फीसदी दर्ज की गई.

खुदरा महंगाई लगातार चौथे महीने RBI के 4 फीसदी के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है. इसकी मुख्य वजह खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें हैं. सितंबर में खाद्य महंगाई बढ़कर 7.36 फीसदी हो गई. इसमें सब्जियों की ऊंची कीमतों का बड़ा योगदान रहा. चीनी, फल, खाद्य तेल, अनाज और दूध की कीमतों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई. RBI की महंगाई लक्ष्य व्यवस्था के तहत इसकी ऊपरी सीमा 6 फीसदी है.

क्रिसिल के मुताबिक, महंगाई बढ़ने के पीछे तीन प्रतिकूल परिस्थितियां एक साथ जिम्मेदार हैं. इनमें आंकड़ों से जुड़ा आधार प्रभाव, प्याज की कीमतों में तेज उछाल और घरेलू बाजार को प्रभावित करने वाली कई जिंसों की वैश्विक कीमतों में असामान्य रूप से एक साथ हुई बढ़ोतरी शामिल है. इन जिंसों में चावल, गेहूं, मक्का, वनस्पति तेल और चीनी शामिल हैं. सितंबर में कुल खाद्य महंगाई में इनका हिस्सा करीब पांचवां भाग रहा, जबकि अप्रैल में यह लगभग 15 फीसदी था.

HSBC ने एक रिसर्च रिपोर्ट में कहा है, "अक्टूबर में महंगाई 6 फीसदी के करीब पहुंच रही है जो RBI के महंगाई लक्ष्य की ऊपरी सीमा है." अक्टूबर के पहले 10 दिनों में सब्जियों की कीमतों में कुछ नरमी आई. सरकार के दखल के बाद चीनी के दाम भी घटे. सरकार ने इसके लिए स्टॉक रखने की सीमा तय करने और शुल्क-मुक्त आयात जैसे कदम उठाए. हालांकि, आगे महंगाई की स्थिति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.

आशंका है कि RBI ब्याज दरों में और बढोतरी कर सकता है
आशंका है कि RBI ब्याज दरों में और बढोतरी कर सकता है

रिपोर्ट में कहा गया है, "अल नीनो की स्थिति और मजबूत होने की आशंका है. इससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं." रिपोर्ट में लागत बढ़ने के दूसरे संभावित दबावों की ओर भी ध्यान दिलाया गया. 

गैर-खाद्य वस्तुओं की थोक महंगाई और खुदरा महंगाई के बीच का अंतर बताता है कि उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की बढ़ी लागत का पूरा बोझ अभी उपभोक्ताओं पर नहीं डाला गया है. अक्टूबर में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों के दाम बढ़ाए गए. इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई.

अगर सितंबर में महंगाई में आया उछाल लगातार ऊंची महंगाई की शुरुआत साबित होता है या कीमतों पर दबाव और बढ़ता है तो मौद्रिक नीति को और सख्त करने की जरूरत बढ़ सकती है. ब्याज दरें बढ़ने से भारत और अमेरिका के बीच ब्याज दरों का अंतर भी बढ़ सकता है. इससे रुपए को कुछ सहारा मिलने की संभावना है.

भारतीय स्टेट बैंक के समूह मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष के मुताबिक महंगाई की आगे की स्थिति को लेकर कई जोखिम बने हुए हैं. इनमें मानसून की कमी, अल नीनो का प्रभाव और ऊर्जा समेत दूसरी जिंसों की ऊंची कीमतें शामिल हैं. इन वजहों से आपूर्ति पक्ष से महंगाई का दबाव बना रह सकता है.

उन्होंने यह भी कहा कि महंगाई का दबाव अब उपभोग की वस्तुओं की व्यापक श्रेणी में फैल रहा है. “उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में 75 फीसदी भार रखने वाली वस्तुओं में महंगाई बढ़ी है. ऐसी वस्तुओं की संख्या अगस्त में 25 थी जो सितंबर में बढ़कर 31 हो गई. इससे पता चलता है कि महंगाई का दबाव अब ज्यादा वस्तुओं पर दिखने लगा है.”

घोष कहते हैं, "इस पृष्ठभूमि में रुपए की लगातार कमजोरी को देखते हुए हमारा मानना है कि नीतिगत ब्याज दर 6 फीसदी तक पहुंच सकती है. महंगाई पर काबू पाने और भविष्य में कीमतों को लेकर लोगों की उम्मीदों को स्थिर रखने के लिए मौद्रिक नीति को सोच-समझकर लेकिन मजबूती से सख्त करना पड़ सकता है."

उनका कहना है कि महंगाई कम करने के लिए RBI दो विकल्पों पर विचार कर सकता है. पहला विकल्प ब्याज दरों को धीरे-धीरे बढ़ाने का है. इसके तहत सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) दर में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी की जा सकती है. इससे यह दर 5.75 फीसदी से बढ़कर 6 फीसदी हो जाएगी. इसके बाद दिसंबर में रेपो दर 25 आधार अंक बढ़ाई जा सकती है. इस तरह MSF दर आखिरकार 6.25 फीसदी तक पहुंच जाएगी.

दूसरा विकल्प दिसंबर की मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो दर को सीधे 50 आधार अंक बढ़ाने का है. इससे महंगाई पर काबू पाने के लिए RBI की प्रतिबद्धता का अधिक मजबूत संकेत मिलेगा. घोष के मुताबिक दोनों विकल्पों में से किसे चुना जाएगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि महंगाई का दबाव कितने समय तक बना रहता है और आने वाले महीनों में रुपए का प्रदर्शन कैसा रहता है.

आखिरकार RBI का फैसला महंगाई, खाद्य और ऊर्जा की कीमतों तथा रुपए की चाल पर निर्भर करेगा. उसकी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना होगी कि आपूर्ति में अस्थायी बाधाओं के कारण पैदा हुआ महंगाई का दबाव व्यापक और लंबे समय तक बने रहने वाली समस्या न बन जाए.

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