एक समय था जब मोबाइल फोन पांच-छह साल तक आराम से चल जाता था लेकिन अब उसे हर दो साल में बदलने की जरूरत पड़ने लगी है. इसी तरह, जो लैपटॉप पहले सात-आठ साल तक उपयोग में रहते थे, वे अब अक्सर तीन-चार साल में ही पुराने और अनुपयोगी हो जाते हैं.
कई बार उपभोक्ता अपने उपकरणों की मरम्मत कराना भी चाहते हैं लेकिन उनके लिए जरूरी स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध नहीं होते. अगर इन्हें बनाने वाली कंपनियां अपने सर्विस सेंटरों पर मरम्मत की सुविधा देती भी हैं तो उसकी लागत इतनी अधिक होती है कि नया प्रोडक्ट खरीदना अधिक व्यावहारिक विकल्प लगने लगता है.
इलेक्ट्रॉनिक्स, घरेलू उपकरणों को लेकर यह समस्या आम है. ये अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक बड़ी और व्यवस्थित समस्या के संकेत हैं. यहीं पर ‘राइट टू रिपेयर’ यानी मरम्मत का अधिकार महत्वपूर्ण हो जाता है. किसी उपकरण की मरम्मत में टूटी हुई मोबाइल स्क्रीन बदलने से लेकर सॉफ्टवेयर की खराबी ठीक करने या घिस चुके पुर्जों को बदलने तक सब कुछ शामिल हो सकता है.
मूल रूप से, मरम्मत किसी प्रोडक्ट की उम्र बढ़ाती है, कचरे को कम करती है और मूल्यवान संसाधनों को खत्म होने से बचाती है. इसके अलावा, इससे ई-कचरा घटता है और नए उत्पाद बनाने में लगने वाली ऊर्जा तथा कच्चे माल की खपत भी कम होती है.
हालांकि, मजबूत मरम्मत व्यवस्था या कानून के अभाव में कई कंपनियां अपने प्रोडक्ट को ‘प्लांड ऑब्सोलेसेंस’ रणनीति के आधार पर डिजाइन करती हैं. यह एक ऐसी बिजनेस रणनीति है, जिसके तहत निर्माता जानबूझकर उत्पादों को इस तरह डिजाइन करते हैं कि वे एक निश्चित समय (या उपयोग) के बाद खराब हो जाएं या अनुपयोगी हो जाएं, जिससे उपभोक्ता नया उत्पाद खरीदने के लिए मजबूर हों.
मतलब साफ है कि कंपनियां उत्पादों को जानबूझकर सीमित उम्र वाला बनाया जाता है ताकि लोग उनकी मरम्मत कराने के बजाय नया उत्पाद खरीदें. इससे ‘फेंको और नया खरीदो’ वाली संस्कृति को बढ़ावा मिला है.
सबसे बड़ी बात यह है कि मरम्मत की संस्कृति को अक्सर हतोत्साहित किया जाता है या मुश्किल बना दिया जाता है. इसका परिणाम उपभोक्ताओं पर बढ़ते खर्च, बढ़ते कचरे और मरम्मत से जुड़े स्कील व रोजगार के धीरे-धीरे खत्म होने के रूप में सामने आता है.
निर्माता अक्सर स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता सीमित कर देते हैं, उत्पादों को इस तरह डिजाइन करते हैं कि उनकी मरम्मत कठिन हो, या फिर मरम्मत को केवल अधिकृत सर्विस सेंटरों तक सीमित कर देते हैं, जहां सामानों के मरम्मत में पैसा बहुत ज्यादा लगता है. इस तरह वे मरम्मत बाजार पर लगभग एकाधिकार स्थापित कर लेते हैं.
इन चुनौतियों को गैर-लाभकारी पर्यावरण अनुसंधान संगठन 'टॉक्सिक्स लिंक' की नई रिपोर्ट ‘स्टिच इन टाइम: इवैल्यूएटिंग कंज्यूमर बिहेवियर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स रिपेयर एक्सेसिबिलिटी’ में बताया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, स्किल्ड और प्रमाणित तकनीशियनों की कमी है. साथ ही आधुनिक और मुश्किल टेक्नोलॉजी से बनाए गए सामानों की मरम्मत के लिए आवश्यक आधुनिक उपकरणों तक पहुंच भी सीमित है.
दिल्ली, हैदराबाद, नागपुर, रांची और कोलकाता में की गईं रिसर्च और फील्ड विजिट के आधार पर तैयार इस रिपोर्ट में पाया गया कि मरम्मत की संस्कृति में व्यापक गिरावट आई है. खासकर उच्च आय वर्ग में मरम्मत के बजाय नया उत्पाद खरीदने की प्रवृत्ति बढ़ी है. हालांकि, निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए मरम्मत अब भी एक महत्वपूर्ण और किफायती विकल्प बनी हुई है.
टॉक्सिक्स लिंक के एसोसिएट डायरेक्टर सतीश सिन्हा कहते हैं, “उपभोक्ताओं को उत्पाद बदलने के बजाय मरम्मत की ओर प्रेरित करने के लिए एक मजबूत सर्विस सेंटर वाले सिस्टम को डेवलप करने की जरूरत है.” उनके मुताबिक, भारत में अभी भी एक बड़ा अनौपचारिक मरम्मत क्षेत्र मौजूद है लेकिन उसमें उपभोक्ता विश्वास और गुणवत्ता की गारंटी का अभाव है. मरम्मत संबंधी ढांचा और कानून इस उद्योग को औपचारिक और अधिक भरोसेमंद बना सकते हैं.
टॉक्सिक्स लिंक की वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी स्वाति विशन के मुताबिक, मरम्मत क्षेत्र को मजबूत करने से भारत की सर्कुलर इकोनॉमी (चक्रीय अर्थव्यवस्था) की ओर बढ़ने की प्रक्रिया तेज होगी. मतलब एक ऐसी अर्थव्यवस्था, जिसमें उत्पादन और उपभोग का एक ऐसा मॉडल है, जो कचरे को कम करने और संसाधनों को अधिकतम समय तक उपयोग में बनाए रखने पर केंद्रित है.
इससे कचरा कम होगा, संसाधनों का संरक्षण होगा, कार्बन उत्सर्जन घटेगा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे. यह संयुक्त राष्ट्र के कई सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) जैसे जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन (SDG-12), जलवायु कार्रवाई (SDG-13) तथा सम्मानजनक रोजगार और आर्थिक विकास (SDG-8) को भी समर्थन देगा.
इस व्यवस्था की आवश्यकता इसलिए भी तुरंत है क्योंकि 2022 में भारत चीन और अमेरिका के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ई-कचरा उत्पादक देश था. देश में हर साल लगभग 32 लाख टन ई-कचरा पैदा होता है. भारत पारंपरिक रूप से एक विशाल अनौपचारिक मरम्मत और रखरखाव अर्थव्यवस्था पर निर्भर रहा है. उत्पादों के अधिक जटिल और मरम्मत में कठिन होते जाने के कारण यह तंत्र धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है.
रिपोर्ट में ‘राइट टू रिपेयर’ ढांचे को लागू करने की सिफारिश की गई है, जिसके तहत मूल उपकरण निर्माता (OEM) मरम्मत मैनुअल, डायग्नोस्टिक टूल्स और असली स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराने के लिए बाध्य हों. साथ ही मरम्मत सेवाओं के लिए मानक और प्रमाणन प्रणाली विकसित करने की भी सिफारिश की गई है, ताकि गुणवत्ता सुधरे और वारंटी के माध्यम से उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़े. दरअसल, प्रमाणन प्रणाली एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके जरिए यह सत्यापित किया जाता है कि कोई उत्पाद, सेवा, प्रबंधन प्रक्रिया, या व्यक्ति किसी निर्धारित मानक, नियम या गुणवत्ता के मानदंडों का पालन कर रहा है.
एक अन्य सुझाव यह है कि असली स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति आसान बनाने की कोशिश की जाए और उनके लिए व्यापक वितरण नेटवर्क बनाया जाए. इससे स्पेयर पार्ट्स की कमी दूर होगी, जो अक्सर उपभोक्ताओं को समय से पहले उत्पाद फेंकने के लिए मजबूर करती है. सरकार राष्ट्रीय स्तर पर मरम्मत-कौशल विकास कार्यक्रम भी शुरू कर सकती है, जिससे मरम्मत क्षेत्र मजबूत होगा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे.
2023 में सरकार ने मरम्मत संबंधी जानकारी के लिए राइट टू रिपेयर पोर्टल शुरू किया था. हालांकि, यह पहल अभी सीमित दायरे में है और अब तक केवल 65 कंपनियां ही इससे जुड़ी हैं. भारत को अब एक राष्ट्रीय प्रोडक्ट रिपेयरेबिलिटी इंडेक्स (Product Repairability Index) की जरूरत है, जिससे उपभोक्ता किसी उत्पाद को खरीदने से पहले यह जान सकें कि उसकी मरम्मत कितनी आसान या कठिन होगी. ऐसा सूचकांक निर्माताओं को भी ऐसे उत्पाद डिजाइन करने के लिए प्रोत्साहित करेगा, जिनकी देखभाल और मरम्मत आसान हो.
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
मरम्मत के अधिकार को अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के कई देशों में पहले ही मान्यता मिल चुकी है. ब्रिटेन में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने वाली कंपनियों के लिए स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराना अनिवार्य है, जिससे उपभोक्ता स्वयं मरम्मत कर सकते हैं या स्थानीय मरम्मत सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं.
ऑस्ट्रेलिया में ‘रिपेयर कैफे’ मरम्मत तंत्र का अहम हिस्सा बन चुके हैं, जहां वालंटियर मरम्मत संबंधी कौशल साझा करते हैं और उत्पादों की उम्र बढ़ाने में मदद करते हैं. पिछले कुछ वर्षों से भारत सरकार भी उपभोक्ता मामलों के विभाग की अतिरिक्त सचिव निधि खरे की अध्यक्षता वाली समिति के माध्यम से व्यापक राइट टू रिपेयर ढांचे पर काम कर रही है. मई 2025 में इस समिति ने मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के लिए रिपेयरबिलिटी इंडेक्स पर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी.
उचित कानून बनाकर मरम्मत को उपभोक्ताओं का अधिकार घोषित करना अब बहुत देर से पेंडिंग में पड़ा एक महत्वपूर्ण कदम है. हमें यह समझना होगा कि भारत के लिए यह केवल उपभोक्ता संरक्षण का मुद्दा नहीं है. यह मरम्मत, रीयूज और संसाधनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल की उस पुरानी संस्कृति को बचाने का भी सवाल है, जिसने कई पीढ़ियों से लोगों के ज्ञान, कारीगरी और आजीविका को सहारा दिया है.

