रणनीतिक उथल-पुथल के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इजरायल दौरा सिर्फ एक रस्मी राजनयिक ट्रिप से कहीं ज्यादा था. दो दिनों की लगातार बैठकों, समझौतों और बातचीत के बीच, भारत और इजरायल ने करीब 17 'मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' (MoU) पर साइन किए. इनमें डिजिटल पेमेंट्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), साइबर सिक्योरिटी, खेती, ट्रेड और मैरीटाइम हेरिटेज जैसे मुद्दे शामिल हैं.
यह एक मैच्योर और कई सेक्टर्स वाली पार्टनरशिप का शानदार उदाहरण था. यह दिखाता है कि नई दिल्ली अपनी 'वेस्ट एशिया' पॉलिसी को किस तरह नए सिरे से सेट कर रही है. यह इस बात का भी साफ सिग्नल है कि मिडिल ईस्ट को लेकर भारत का नजरिया अब सिर्फ 'रिएक्टिव' (हालात के हिसाब से काम करने वाला) नहीं रहा, बल्कि यह एक सक्रिय आर्थिक भागीदारी में बदल चुका है.
भारत ने 1992 में ही इजरायल के साथ औपचारिक राजनयिक रिश्ते बनाए थे, लेकिन 2010 के दशक के मध्य तक यह रिश्ता ज्यादातर हथियारों की खरीद और एग्रीकल्चर के कुछ प्रोजेक्ट्स तक ही सीमित रहा. जानकारों का मानना है कि 2017 में पीएम मोदी का ऐतिहासिक इजरायल दौरा (जो किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला दौरा था) एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. उस दौरे ने दोनों देशों के बीच एक स्ट्रक्चर्ड और भरोसेमंद रिश्ते की नींव रखी, जो रणनीतिक तालमेल और नेताओं की आपसी बॉन्डिंग पर टिका था.
पिछले एक दशक में, यह पार्टनरशिप लगातार मज़बूत हुई है. अरब देशों के साथ अपने पुराने रिश्तों को बनाए रखते हुए, भारत ने इजरायल और अरब वर्ल्ड के साथ अपने रिश्तों को 'डी-हाइफनेट' कर दिया. भारत ने साफ कर दिया कि उसके हित स्वतंत्र हैं और एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. इस सधी हुई कूटनीति के दम पर नई दिल्ली ने इजरायल के साथ रिश्ते गहरे किए और उसी वक्त खाड़ी देशों के साथ भी अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को बढ़ाया, जिसकी बुनियाद ट्रेड, इन्वेस्टमेंट, एनर्जी सिक्योरिटी और सुरक्षा सहयोग पर टिकी है.
2025 तक, 'गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल' (जिसमें सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन शामिल हैं) के साथ भारत का बाइलेटरल ट्रेड करीब 178.6 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था. यह भारत के कुल ग्लोबल ट्रेड का 15 फीसद से भी ज्यादा है. खाड़ी देशों के इस गुट के लिए भारत का एक्सपोर्ट 57 बिलियन डॉलर को पार कर गया, जबकि इम्पोर्ट (जिसमें ज्यादातर एनर्जी से जुड़ी चीजें हैं) लगभग 122 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया.
2022 में 'कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट' (CEPA) साइन होने के बाद से भारत और यूएई का ट्रेड 100 बिलियन डॉलर को पार कर गया है, जो इस आर्थिक एकीकरण का सीधा फायदा दिखाता है. पिछले साल दिसंबर में, भारत और ओमान ने अपना खुद का CEPA साइन किया, जिससे भारत को ओमान के बाजारों में खास एंट्री मिली. इसके तहत 98 फीसद से ज्यादा टैरिफ लाइन्स को ड्यूटी-फ्री कर दिया गया और इसमें सर्विसेज़ व इन्वेस्टमेंट की छूट भी शामिल है. ओमान के साथ बाइलेटरल ट्रेड वित्त वर्ष 2025 में पहले ही लगभग 10.6 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था, जिसमें ग्रीन एनर्जी, इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी सेक्टर्स में भारत का इन्वेस्टमेंट 5 बिलियन डॉलर से ज्यादा रहा.
भारत-इजरायल के रिश्ते कोई अपवाद नहीं थे, बल्कि वेस्ट एशिया में नई दिल्ली की रणनीतिक पहुंच का ही एक हिस्सा थे. 2025 में, निवेशकों का भरोसा बढ़ाने और आर्थिक रिश्तों को गहरा करने के लिए भारत और इजरायल ने एक 'बाइलेटरल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी' साइन की. दोनों देशों के बीच व्यापार FY25 में लगभग 3.6 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया. वहीं, डिफेंस को-ऑपरेशन भी मजबूत बना रहा, जहां इजरायल भारत के सबसे बड़े डिफेंस सप्लायर्स में से एक है और जॉइंट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स भी चल रहे हैं.
25 फरवरी को जब मोदी तेल अवीव में उतरे, तो वह एक ऐसे डिप्लोमेटिक माहौल में दाखिल हुए जो मौकों और पेचीदगियों, दोनों से भरा था. अक्टूबर 2023 के हमास हमलों और उसके बाद गाजा में हुए संघर्ष के चलते वेस्ट एशिया में तनाव बना हुआ था, और इजरायल को अपने ही इलाके में आंशिक रूप से अलग-थलग होना पड़ा था. इजरायल की संसद 'नेसेट' में मोदी का भाषण (जो किसी भी भारतीय पीएम का पहला भाषण था) दोस्ती, सम्मान और पार्टनरशिप पर जोर देने वाला था. उन्होंने बहुत सधे हुए अंदाज में वेस्ट एशिया में शांतिपूर्ण समाधान के लिए भारत के पुराने समर्थन की बात भी रखी और साथ ही सुरक्षा, तकनीक व आर्थिक सहयोग पर इजरायल के साथ साझा हितों की भी पुष्टि की.
इस दौरे के केंद्र में वे 17 MoU थे जो इस रिश्ते की गहराई और विविधता को दिखाते हैं. भारत के UPI को इजरायल के 'Masav' सिस्टम से जोड़ने वाला MoU एक बहुत बड़ी कामयाबी था. इससे दोनों देशों के बीच तेज, सस्ते और ज्यादा सुरक्षित क्रॉस-बॉर्डर ट्रांजैक्शन हो सकेंगे. यह एग्रीमेंट न सिर्फ बिजनेस को आसान बनाता है, बल्कि दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी की एक नई धुन भी छेड़ता है. इसी के साथ, भारत की 'इंटरनेशनल फाइनेंसियल सर्विसेज सेंटर्स अथॉरिटी' और 'इजराइल सिक्योरिटीज अथॉरिटी' के बीच हुआ समझौता फिनटेक रेगुलेशन और इनोवेशन में बेहतर तालमेल की नींव रखेगा.
टेक्नोलॉजी और सिक्योरिटी को-ऑपरेशन भी चर्चा के केंद्र में रहे. इन समझौतों में AI, साइबर सिक्योरिटी, डेटा शेयरिंग और 'होराइजन स्कैनिंग' जैसी पहल शामिल हैं. ये ऐसे संस्थागत मैकेनिज्म हैं जिन्हें लंबे समय तक चलने वाली क्षमताएं बनाने, मिलकर सॉल्यूशन तैयार करने और एक्सपर्टीज शेयर करने के लिए डिजाइन किया गया है. आज के दौर में जब साइबर खतरे बॉर्डर पार कर चुके हैं, तो ये MoU इस समझ को दिखाते हैं कि सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और तकनीक आपस में जुड़े हुए हैं. भारत के पास स्केल और टैलेंट का एक बड़ा पूल है, जबकि इजरायल अपनी गहरी टेक्निकल एक्सपर्टीज और तेजी लेकर आता है. ये दोनों मिलकर एक टिकाऊ पार्टनरशिप का इकोसिस्टम बना रहे हैं.
एग्रीकल्चर, जो कि सहयोग का एक पुराना क्षेत्र रहा है, उस पर भी नए सिरे से ध्यान दिया गया. इंडिया-इजराइल इनोवेशन सेंटर फॉर एग्रीकल्चर अब प्रिसिजन फार्मिंग, क्लाइमेट-रेसिलिएंट फसलों (यानी जो मौसम की मार सह सकें) और एक्वाकल्चर तकनीकों पर फोकस कर रहा है. फील्ड विजिट और तकनीकी आदान-प्रदान में सीधे तौर पर समस्याओं को सुलझाने और नॉलेज ट्रांसफर पर जोर दिया गया. यह दिखाता है कि इस रणनीतिक साझेदारी को जमीन पर लोगों के लिए असल नतीजे देने होंगे.
कमर्शियल आर्बिट्रेशन, रेगुलेटरी तालमेल और इन्वेस्टमेंट प्रमोशन पर हुए समझौतों के जरिए ट्रेड को आसान बनाने और संस्थागत कड़ियों को और मजबूत किया गया. इन कदमों का मकसद रुकावटों को कम करना, भरोसा बनाना और मार्केट तक पहुंच बढ़ाना है. भारत और इजरायल के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) की शुरुआती बातचीत भी हुई. यह उस बड़े पैटर्न का हिस्सा है जिसमें भारत खाड़ी देशों और इजरायल, दोनों के साथ एक ही समय पर अपने ट्रेड एग्रीमेंट्स को मजबूत करना चाहता है.
इस FTA की बातचीत में गुड्स, सर्विसेज़, कस्टम को-ऑपरेशन, सैनिटरी उपाय, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (IPR) और इन्वेस्टमेंट के नियम शामिल हैं. यह मौजूदा 3.6 बिलियन डॉलर के ट्रेड बेस से कहीं आगे जाकर गहरे आर्थिक एकीकरण का ढांचा तैयार करता है.
इन कदमों के पीछे का रणनीतिक लॉजिक बिल्कुल साफ है. आर्थिक जुड़ाव जियो-पॉलिटिकल तालमेल को पूरा करता है. भारत अपने लिए अलग-अलग मार्केट्स, टेक्नोलॉजिकल पार्टनरशिप और सप्लाई-चेन इंटीग्रेशन तलाश रहा है. वहीं, इजरायल को भारत के विशाल मार्केट में एंट्री मिलती है और वह मिलकर हाई-टेक सॉल्यूशंस बना सकता है.
वेस्ट एशिया को लेकर मोदी सरकार का नजरिया, जिसे अक्सर 'प्रैग्मैटिक डिप्लोमेसी' (व्यावहारिक कूटनीति) कहा जाता है, जानबूझकर 'बाइनरी चॉइस' (यानी दो में से कोई एक चुनना) से बचता रहा है. दशकों पुराने उस रवैये को बदलकर, जिसमें अरब और इजरायल के साथ रिश्तों को एक-दूसरे का विरोधी माना जाता था, नई दिल्ली ने एक ऐसा 'नेटवर्क्ड स्ट्रेटेजिक जियोग्राफी' बनाया है जहां भारत अपनी एनर्जी सप्लाई सुरक्षित करता है, रेमिटेंस (विदेशों में काम कर रहे भारतीयों से देश में पैसे का ट्रांसफर) को आसान बनाता है, ट्रेड कॉरिडोर का विस्तार करता है और पूरे इलाके में टेक्नोलॉजी के तार जोड़ता है.
घरेलू मोर्चे पर भी, इस दौरे ने एक 'असरदार लेकिन संतुलित' फॉरेन पॉलिसी दिखाने के लिए ध्यान खींचा, जो सुरक्षा, तकनीक और आर्थिक मौकों को एक साथ जोड़ती है. इजरायल के लिए, मोदी के दौरे ने क्षेत्रीय अनिश्चितता के इस वक्त में एक पार्टनर के रूप में भारत की अहमियत को रेखांकित किया. जानकारों ने नोट किया कि मोदी और नेतन्याहू के बीच के मजबूत निजी संबंधों ने क्षेत्रीय तनावों के बावजूद इस रफ्तार को बनाए रखने में मदद की है.
हालांकि, आलोचक चेतावनी देते हैं कि इस पार्टनरशिप को गहरा करने के लिए बहुत सधे हुए कदमों की जरूरत है. फिलिस्तीन मुद्दे पर भारत का ऐतिहासिक रुख (जो बातचीत से शांति की वकालत करता है और एकतरफा फैसलों का विरोध करता है) अब भी संवेदनशील बना हुआ है. नई दिल्ली अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाते हुए शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए एक बहुत ही सावधान संतुलन बनाए हुए है.
बिजनेस और इनोवेटर्स के लिए, यह दौरा और समझौते ठोस मौकों का इशारा हैं. फिनटेक कंपनियां UPI के क्रॉस-बॉर्डर इंटीग्रेशन का फायदा उठाने की तैयारी कर रही हैं. AI स्टार्टअप्स को जॉइंट रिसर्च में रास्ते खुलते दिख रहे हैं. एग्रीकल्चर से जुड़ी कंपनियां टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और नॉलेज शेयरिंग की उम्मीद कर रही हैं. दौरे के दौरान बने संस्थागत ढांचे का मकसद यह है कि सरकारें बदलने, आर्थिक उतार-चढ़ाव और क्षेत्रीय अस्थिरता के बावजूद यह सहयोग लगातार चलता रहे.
26 फरवरी की शाम जब मोदी का काफिला तेल अवीव से रवाना हुआ, तो इस दौरे की अहमियत बिल्कुल साफ थी. मोदी राज में भारत-इजरायल के रिश्ते अब एक बहुआयामी, ठोस और नतीजों पर टिके रहने वाली पार्टनरशिप में बदल चुके हैं. डिजिटल फाइनेंस से लेकर एग्रीकल्चर तक, इनोवेशन से लेकर ट्रेड के ढांचों तक, दोनों देश सहयोग का एक ऐसा मॉडल बना रहे हैं जो टिकाऊ है, विविधता से भरा है और साझा हितों से जुड़ा है. स्ट्रेटेजिक कम्पटीशन और आर्थिक बदलावों वाली इस दुनिया में, भारत और इजरायल यह दिखा रहे हैं कि कूटनीति, तकनीक, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को जोड़ते हुए, आपसी फायदे के लिए द्विपक्षीय पार्टनरशिप का ढांचा कैसे तैयार किया जा सकता है.
नई दिल्ली के लिए, यह सिर्फ एक द्विपक्षीय रिश्ता नहीं है, बल्कि एक बड़े 'जियो-इकोनॉमिक आर्किटेक्चर' का हिस्सा है जो भारत को 21वीं सदी में बाजारों, इनोवेशन और रणनीतिक साझेदारियों के चौराहे पर सबसे अहम जगह पर खड़ा करता है.

