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भारत का 'फ्लाइट प्लान': क्या दिल्ली बन सकता है ग्लोबल एविएशन हब?

इंडिया टुडे इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्क्लेव में एविएशन इंडस्ट्री के दिग्गज विदेह जयपुरियार और कपिल कौल ने इस बात पर मंथन किया कि भारत ग्लोबल एविएशन मैप पर अपनी जगह कैसे बना सकता है

इंडिया टुडे इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्क्लेव, 2026
इंडिया टुडे इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्क्लेव, 2026
अपडेटेड 27 फ़रवरी , 2026

25 फरवरी को नई दिल्ली में हुए 'इंडिया टुडे इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्क्लेव' में 'Airports at scale: Making mark at the global aviation map' सेशन में भविष्य को लेकर एक बहुत ही रियलिस्टिक चर्चा हुई. जैसे-जैसे भारत का एविएशन मार्केट फिर से हाई-ग्रोथ मोड में आ रहा है, इंडस्ट्री के दिग्गजों का मानना है कि देश इस वक्त एक बड़े टर्निंग पॉइंट पर खड़ा है. अब सवाल यह नहीं है कि क्या भारत के पास 'ग्लोबल हब' बनने के लिए पर्याप्त ट्रैफिक है, बल्कि सवाल यह है कि क्या पॉलिसी, सेफ्टी और इंफ्रास्ट्रक्चर इस मौके का फायदा उठाने के लिए उतनी तेजी से एक साथ आ सकते हैं?

दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड के CEO विदेह जयपुरियार और CAPA इंडिया के CEO और डायरेक्टर कपिल कौल ने वह रोडमैप और साथ ही इसके रिस्क सामने रखे, जो यह तय करेंगे कि क्या भारत वाकई ग्लोबल एविएशन मैप पर अपनी जगह बना पाएगा.

इस पूरी बहस के केंद्र में एक तथ्य है: भारत के पास पहले से ही डिमांड है. जयपुरियार ने कहा, "ग्लोबल हब बनने के लिए जो चाहिए, वो हमारे पास है क्योंकि हमारे पास पैसेंजर्स हैं." दशकों से, भारतीय यात्री, खासकर जो नॉर्थ अमेरिका जाते हैं, उन्हें मिडिल-ईस्ट और साउथईस्ट-एशिया के हब से होकर गुजरना पड़ता है. जयपुरियार के मुताबिक, नॉर्थ अमेरिका जाने वाले मुश्किल से 11-12 प्रतिशत भारतीय ही नॉन-स्टॉप सफर करते हैं; बाकी लोग विदेशों से कनेक्टिंग फ्लाइट लेते हैं, जिससे विदेशी एयरलाइंस और एयरपोर्ट्स को ट्रांजिट रेवेन्यू के तौर पर अरबों रुपये का फायदा होता है. जयपुरियार और कौल, दोनों का मानना है कि यह जो रेवेन्यू बाहर जा रहा है, वही भारत के लिए एविएशन का सबसे बड़ा मौका है.

अगर सिर्फ नक्शे के नजरिए से देखें, तो दिल्ली का दावा बहुत मजबूत है. कौल ने बताया कि "भौगोलिक स्थिति के लिहाज से, दिल्ली कई अन्य हब के मुकाबले ज्यादा बेहतर जगह पर है." दुबई से अलग, जिसने अपना मॉडल काफी हद तक ट्रांसफर ट्रैफिक पर बनाया है, दिल्ली को अपने विशाल और तेजी से बढ़ते होम मार्केट का भी फायदा मिलता है. कौल ने कहा, "दिल्ली के लिए दूसरा बड़ा फायदा यह है कि यह एक जबरदस्त होमग्रोन मार्केट है." उन्होंने इशारा किया कि भारत में विदेश जाने वाले यात्रियों की मांग आने वाले दशकों तक बढ़ती रहेगी.

लेकिन सिर्फ अच्छी लोकेशन से ही हब नहीं बनते. फ्लीट की ताकत, एयरलाइंस के बड़े लक्ष्य और पॉलिसी को लेकर क्लैरिटी भी उतनी ही मायने रखती है, और यहीं पर भारत ऐतिहासिक रूप से लड़खड़ाता रहा है. जयपुरियार ने माना कि देश में "लॉन्ग-हॉल यानी लंबी दूरी की उड़ानों के बड़े विजन वाली एक मजबूत एयरलाइन की कमी थी", जिसकी वजह से खाड़ी और यूरोपीय एयरलाइंस ने भारत के लॉन्ग-हॉल ट्रैफिक पर अपना दबदबा बना लिया.

हालांकि, अब यह समीकरण बदलता दिख रहा है. एयर इंडिया के वाइड-बॉडी विमानों की वापसी और इंडिगो के लॉन्ग-हॉल प्लान्स के साथ, पूरा इकोसिस्टम अब एक लाइन में आता दिख रहा है. कौल का अनुमान है कि इन दोनों एयरलाइंस के जरिए, भारत में अगले एक दशक में करीब 150 और वाइड-बॉडी विमान आ सकते हैं. यह एक ऐसा स्केल है जो कनेक्टिविटी की पूरी तस्वीर बदल सकता है. कौल ने जरूरी चीजों को गिनाते हुए कहा, "सब कुछ मौजूद है: लोकेशन का फायदा, एयरपोर्ट की कैपेसिटी और फ्लीट की ग्रोथ."

फिर भी, उन्होंने चेतावनी दी कि हब के विकास का काम सिर्फ एयरपोर्ट ऑपरेटर के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. उन्होंने कहा कि सरकारी पॉलिसी, खासकर रेवेन्यू शेयर, टैक्सेशन और एक्सेस इंफ्रास्ट्रक्चर ही यह तय करेंगे कि हब का यह विजन कमर्शियल तौर पर कामयाब हो पाएगा या नहीं.

दिल्ली एयरपोर्ट पहले से ही बहुत हाई इंटेंसिटी पर काम कर रहा है, और सेफ तरीके से इसे बढ़ाना एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है. जयपुरियार ने बताया कि एयरपोर्ट अभी रोजाना करीब 1,500 एयरक्राफ्ट मूवमेंट को हैंडल करता है और 2,200 से ज्यादा के आंकड़े तक पहुंचने की तैयारी कर रहा है. उन्होंने कहा, "हम इस बात को लेकर बहुत सचेत हैं कि बढ़ते ट्रैफिक के साथ, हमें सेफ्टी अवेयरनेस के अगले लेवल पर जाने की जरूरत है."

इस भारी भीड़ को मैनेज करने के लिए, दिल्ली एयरपोर्ट 'इक्विपमेंट पूलिंग' और 'स्टैंड-बेस्ड ग्राउंड हैंडलिंग' का प्रयोग कर रहा है, जो कि हांगकांग से प्रेरित एक तरीका है. इंटरनल स्टडीज बताती हैं कि इससे एयरसाइड पर वाहनों की आवाजाही करीब 30 प्रतिशत तक कम हो सकती है, जिससे टक्कर का खतरा काफी हद तक घट जाएगा.

लेकिन सिर्फ हार्डवेयर सुधारने से काम नहीं चलेगा. कौल बार-बार जिस एक मुद्दे पर वापस लौट रहे थे, वह था सेफ्टी रिफॉर्म. उनकी चेतावनी बिल्कुल साफ थी: भारत अपने एविएशन सेफ्टी आर्किटेक्चर को पूरी तरह बदले बिना एग्रेसिव ग्रोथ हासिल नहीं कर सकता. कौल ने कहा, "एयर सेफ्टी अब एक राष्ट्रीय मुद्दा है. सच कहूं तो हम इसे बस कालीन के नीचे नहीं छिपा सकते." उन्होंने मैनपावर, सर्विलांस क्वालिटी और रेगुलेटरी कैपेसिटी में सिस्टम की कमियों को पहचानने के लिए एक पारदर्शी नेशनल 'व्हाइट पेपर' लाने की मांग की.

यह चिंता भविष्य को लेकर है. भारत पहले ही रोजाना हजारों उड़ानों को हैंडल कर रहा है, और अगले पांच से सात सालों में यह ट्रैफिक दोगुना हो सकता है. कौल ने बताया कि इंस्पेक्टर्स को ट्रेनिंग देने और निगरानी सिस्टम को अपग्रेड करने में अक्सर तीन से पांच साल का समय लगता है, जिसका मतलब है कि सुधार तुरंत शुरू होने चाहिए. उन्होंने जोर देते हुए कहा, "आपको इस देश में हवाई सुरक्षा व्यवस्था को प्राथमिकता देनी होगी." उन्होंने चेतावनी दी कि बार-बार होने वाले हादसे ग्लोबल लेवल पर भरोसे को तोड़ सकते हैं, वो भी तब जब भारत खुद को एक बड़े हब के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है.

सुरक्षा के अलावा, कई स्ट्रक्चरल रुकावटें भी हैं. एक बड़ा मुद्दा टैक्स का असमान माहौल है, खासकर NCR में एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर लगने वाला वैट. कौल ने बताया कि यह 50 किलोमीटर के दायरे में ही बहुत ज्यादा बदल जाता है. उनका मानना था कि इस तरह की विसंगतियां एयरलाइन के इकोनॉमिक्स  और हब की प्लानिंग को और उलझा देती हैं.

एक और रणनीतिक सवाल सामने आता है: भारत असल में कितने हब चाहता है? मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और दिल्ली, सभी हब बनने का सपना देख रहे हैं. ऐसे में कौल ने 'ओवर-फ्रैगमेंटेशन' (यानी चीजों के बहुत ज्यादा बंटने) के खिलाफ आगाह किया. अगर ट्रैफिक फैल जाता है, तो भारत एक या दो ग्लोबल लेवल के 'मेगा-हब' बनाने के बजाय कई छोटे और कमजोर 'गेटवे' बनाने का जोखिम उठाएगा.

पैसेंजर एक्सपीरियंस एक और बड़ा मोर्चा है. जयपुरियार के मुताबिक देश के सुरक्षा माहौल को देखते हुए भारत के सिक्योरिटी प्रोटोकॉल का सख्त होना समझ आता है, लेकिन उन्होंने कहा कि सुरक्षा से समझौता किए बिना सुविधा को बेहतर बनाने की गुंजाइश है. उन्होंने ट्रांसफर के लिए "वन-स्टॉप सिक्योरिटी", जो कि यूरोपीय देशों की तरह है, को लागू करने पर नागरिक उड्डयन मंत्रालय और ब्यूरो ऑफ सिविल एविएशन सिक्योरिटी के साथ चल रही चर्चाओं की ओर इशारा किया, जिससे कनेक्शन टाइम काफी कम हो सकता है. ये बदलाव, भले ही टेक्निकल हों, हब के कड़े मुकाबले के लिए बहुत जरूरी हैं, क्योंकि अक्सर कुछ मिनटों का अंतर ही एयरलाइन के नेटवर्क के फैसलों को तय करता है.

अंत में, जयपुरियार ने एयरपोर्ट से जुड़े कमर्शियल इकोसिस्टम के बढ़ते महत्व को उजागर किया. दिल्ली का एयरोसिटी इलाका पूरे साल 85-90 प्रतिशत होटल ऑक्यूपेंसी पर काम करता है, जो मुख्य रूप से बिजनेस ट्रैवलर्स की वजह से है. "एयरपोर्ट सिटी एक बिजनेस सेंटर बन रहा है," उन्होंने कहा. उनका तर्क था कि हब के ट्रैफिक, मीटिंग्स और ट्रांजिट के दौरान रुकने वाले यात्रियों को बनाए रखने के लिए मजबूत 'एयरोट्रोपोलिस' का विकास बहुत जरूरी है. एम्स्टर्डम से लेकर ज्यूरिख तक के ग्लोबल उदाहरण बताते हैं कि कामयाब हब अब सिर्फ ट्रांसपोर्ट नोड्स नहीं, बल्कि इंटीग्रेटेड इकोनॉमिक जोन के रूप में काम कर रहे हैं.

दोनों दिग्गजों का अंतिम फैसला 'सावधानी भरी उम्मीद' वाला है. उनका तर्क है कि भारत एक असली ग्लोबल एविएशन हब बनाने के इतने करीब पहले कभी नहीं था. ट्रैफिक उछाल पर है, एयरलाइंस आखिरकार लॉन्ग-हॉल एयरक्राफ्ट का ऑर्डर दे रही हैं और एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार हो रहा है. लेकिन यह मौका हमेशा के लिए खुला नहीं रहेगा.

सही मायनों में "ग्लोबल एविएशन मैप पर अपनी छाप छोड़ने" के लिए, भारत को फ्लीट ग्रोथ, सेफ्टी रिफॉर्म, टैक्स रेशनलाइजेशन और एक्सेस इंफ्रास्ट्रक्चर को एक साथ मिलाते हुए, तालमेल बिठाकर आगे बढ़ना होगा. जैसा कि कौल की चेतावनी से पता चलता है, सिस्टम को मजबूत किए बिना सिर्फ बड़े लक्ष्य रखना उल्टा पड़ सकता है. फिलहाल, सारी जरूरी चीजें टेबल पर मौजूद हैं. क्या भारत एक परफेक्ट हब की रेसिपी तैयार कर पाएगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि देश अपनी अगली 'एविएशन टेक-ऑफ' को कितनी तेजी और समझदारी के साथ अंजाम देता है.

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