भारत में रोजगार के अवसर पैदा करने का काम बड़े पैमाने पर शहरों तक ही सीमित रहा है. शहरों में ही सबसे ज्यादा निवेश और प्रतिभाएं पहुंचती हैं. हालांकि अब छोटे कस्बों और शहरों में भी कई नए कारोबार उभर रहे हैं.
ऐसे में जिलों के लिए स्थानीय अर्थव्यवस्था, संस्कृति, पहचान और जरूरतों के आधार पर रोजगार पैदा करने की अपनी रणनीति तैयार करना जरूरी हो गया है.
नई दिल्ली में हाल ही में द/नज फाउंडेशन की ओर से आयोजित सामाजिक प्रभाव से जुड़े कार्यक्रम चर्चा 2026 में ‘विकसित जिलों के लिए विकसित भारत: आजीविका और स्थानीय आर्थिक विकास को गति देना’ विषय पर आयोजित पैनल चर्चा का मुख्य मुद्दा यही था.
केंद्र सरकार के पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय (DoNER) के सचिव श्रीनिवास कातिकिथला ने कहा कि भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है, लेकिन यह कुछ खास केंद्रों और गलियारों तक ही सीमित है. ऐसे में भारत के 800 जिलों में से 200-250 जिले ऐसे हो सकते हैं जहां भौगोलिक स्थिति के कारण शहरीकरण नहीं हो पाएगा.
कातिकिथला ने कहा कि इन जिलों में किए जाने वाले प्रयास शहरी केंद्रों की जरूरतों से अलग होने चाहिए. यहां उद्यमिता पर ध्यान दिया जा सकता है. इसी तरह शहरी केंद्रों में गिग सेवाएं खुदरा कारोबार, भोजन और परिवहन समेत कई क्षेत्रों में सेवाएं उपलब्ध कराने का अवसर देती हैं.
कातिकिथला ने कहा, "एक जिला ऐसी पहचान रखने वाली इकाई है, जिसकी अपनी संस्कृति और पहचान है. यह इतनी बड़ी है कि बड़े स्तर पर काम किया जा सके और इतनी छोटी भी कि बारीकियों पर ध्यान दिया जा सके."
उन्होंने कहा कि इसके लिए जिला प्रशासकों को जिला प्रबंधकों की तरह काम करने की जरूरत है. उन्हें क्षेत्र में आने वाले हर व्यक्ति, चाहे वह आगंतुक हो, पर्यटक, नौकरी तलाशने वाला या निवेशक, उसकी जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए.
नीति आयोग के कार्यक्रम निदेशक इश्तियाक अहमद ने कहा कि वास्तविक आर्थिक विकास के लिए आखिरी छोर पर रहने वाले आखिरी परिवार तक भी इसका लाभ पहुंचना जरूरी है. इसके लिए स्थानीय जिलों को विकास का अपना मॉडल तैयार करना होगा.
नागालैंड की विधायक हेकानी जखालू ने कहा कि स्थानीय अर्थव्यवस्था पर लंबे समय तक असर डालने के लिए चार प्रमुख पक्षों को मिलकर काम करना होगा. इनमें उद्यमी, सरकार, समुदाय या जमीनी स्तर पर रहने वाले लोग और उस क्षेत्र के मार्गदर्शक या विशेषज्ञ शामिल हैं.
भारत में संयुक्त राष्ट्र महिला की उप प्रतिनिधि कांता सिंह ने किसी भी जिले के विकास में प्रशासन की अहम भूमिका पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि कोई गैर-सरकारी संगठन या कारोबार बड़े स्तर पर बदलाव नहीं ला सकता.
सिंह ने कहा, "जिलाधिकारी या जिला मजिस्ट्रेट मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की तरह काम कर सकते हैं और वहां निवेश ला सकते हैं." उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे भारतीय पुलिस सेवा (IPS) की अधिकारी किरण बेदी ने दिल्ली की तिहाड़ जेल की प्रभारी रहते हुए 200 से ज्यादा गैर-सरकारी संगठनों को वहां काम करने के लिए जोड़ा. इससे कैदियों को सम्मान के साथ जीने का अवसर मिला और उन्हें आजीविका का रास्ता भी मिला. उन्होंने कहा कि यह जेल सुधार का एक मॉडल बन गया.
सिंह ने कहा कि विकास समावेशी होना चाहिए. इसके लिए समाज के सभी वर्गों की जरूरतों को समझना और उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना जरूरी है. इनमें महिलाएं, LG उन्होंने कहा, "मेरे बारे में कोई फैसला मेरी भागीदारी के बिना नहीं होना चाहिए."

