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जलवायु परिवर्तन के लक्ष्य पूरे हों और विकास भी न रूके! क्या है भारत का नया रास्ता?

भारत अपनी जलवायु परिवर्तन की नीति को औद्योगिक विकास, ऊर्जा सुरक्षा और जियो-पॉलिटिकल स्थिति के साथ जोड़ रहा है

सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 30 मार्च , 2026

25 मार्च को केंद्रीय कैबिनेट ने भारत के अपडेटेड 'नेशनली डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशंस' (NDCs) को मंजूरी दे दी. यह जलवायु परिवर्तन को लेकर देश की कोशिशों और एक बंटी हुई दुनिया में उसकी स्थिति को तय करने वाला एक बेहद अहम पल है. यह फैसला ऐसे वक्त में आया है जब अमेरिका (डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में) पहले ही अपने प्रमुख जलवायु परिवर्तन से जुड़े अपने वादों से पीछे हट चुका है, जिससे पेरिस समझौते के बाद बनी नाजुक सहमति डगमगा गई है.

इस संदर्भ में देखें, तो भारत का NDC कदम सिर्फ लक्ष्यों को अपडेट करना नहीं है. यह ग्रोथ, एनर्जी ट्रांजिशन और जियो-पॉलिटिकल हकीकत के बीच तालमेल बिठाने वाले मध्य मार्ग  को तलाशने की एक सोची-समझी कोशिश है. इस अपडेटेड फ्रेमवर्क के आंकड़े इस 'बैलेंसिंग एक्ट' के पैमाने को रेखांकित करते हैं. भारत ने अब 2030 तक अपनी जीडीपी की 'एमिशन इंटेंसिटी (उत्सर्जन तीव्रता) ' को 2005 के स्तर से 45 प्रतिशत तक कम करने का वादा किया है, जो पहले के 33 से 35 प्रतिशत के टारगेट से ज्यादा है.

इसका लक्ष्य गैर-जीवाश्म ईंधन से अपनी कुल स्थापित बिजली क्षमता का 50 प्रतिशत हासिल करना भी है, जो पहले 40 प्रतिशत था. इसके साथ ही, जंगल और पेड़ों के जरिए 2.5 से 3 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर एक अतिरिक्त 'कार्बन सिंक' बनाने का वादा भी बरकरार रखा गया है. ये लक्ष्य एक ऐसे ट्रैक पर सेट किए गए हैं जो पहले ही ठोस नतीजे दे चुका है.

भारत ने 2005 और 2020 के बीच अपनी एमिशन इंटेंसिटी को करीब 36 प्रतिशत तक कम कर दिया है, और 2030 की डेडलाइन से काफी पहले ही अपने पुराने टारगेट के करीब पहुंच गया है. 2025 के मध्य तक, देश ने तय समय से पांच साल पहले ही 50 प्रतिशत 'नॉन-फॉसिल' क्षमता का आंकड़ा पार कर लिया. करीब 524 गीगावाट के कुल पावर सिस्टम में लगभग 267 गीगावाट क्षमता नॉन-फॉसिल स्रोतों से है. सिर्फ 2025 के कैलेंडर वर्ष में ही 44.5 गीगावाट की रिकॉर्ड रिन्यूएबल क्षमता जोड़ी गई. सोलर क्षमता 2014 के 3 गीगावाट से कम से बढ़कर आज 140 गीगावाट के पार पहुंच गई है, जबकि पवन ऊर्जा 55 गीगावाट को पार कर गई है. इन बदलावों ने भारत के पावर सेक्टर के ढांचे को ऐसे बदलना शुरू कर दिया है जिसकी एक दशक पहले कल्पना करना भी मुश्किल था.

फिर भी, अंदरूनी डेटा उन मजबूरियों की तरफ इशारा करता है जो भारत का रास्ता तय करते हैं. आधी से ज्यादा 'इंस्टॉल्ड कैपेसिटी' नॉन-फॉसिल स्रोतों से आने के बावजूद, अभी असल बिजली उत्पादन का सिर्फ 28 प्रतिशत हिस्सा ही 'क्लीन' है. कोयला अभी भी करीब 70 प्रतिशत बिजली पैदा करता है, जो लगातार पावर देने में इसकी अहमियत को दिखाता है. औद्योगीकरण, शहरीकरण और बढ़ती आय के कारण इस दशक में बिजली की मांग सालाना 6 से 7 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है. इसलिए, भारत का ट्रांजिशन उन विकसित देशों की कॉपी नहीं कर सकता जो अब पूरी तरह से एमिशन कम करने की कोशिश कर रहे हैं. भारत को एक ही समय में अपना विस्तार भी करना है और 'डीकार्बोनाइज' भी करना है.

ये दोहरे उद्देश्य ही 'इंटेंडेड नेशनली डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशंस' (INDCs) की निरंतरता और उसमें आए बदलाव को समझाते हैं. 2015 का फ्रेमवर्क जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों को साधने और विकास के लिए जगह देने पर आधारित था. उसमें लचीलापन था और शर्तों पर जोर दिया गया था. लेकिन नया अपडेटेड NDC इसे जमीन पर उतारने पर ज्यादा टिका है. यह घरेलू नीतियों से गहराई से जुड़ा है, 2030 तक 500 गीगावाट रिन्यूएबल टारगेट के साथ अलाइन है, और 'नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन' (जो सालाना 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन बनाने का लक्ष्य रखता है) व 'प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम' (PLI) जैसी पहलों से सपोर्टेड है.

PLI स्कीम सोलर मॉड्यूल, बैटरी और क्लीन टेक्नोलॉजी में घरेलू क्षमता बना रही है. स्टेकहोल्डर्स के साथ बातचीत पूरी होने के बाद, PMO अब मैन्युफैक्चरिंग के नेशनल मिशन का रिव्यू कर रहा है, जिसमें क्लीनटेक मैन्युफैक्चरिंग पर खास फोकस है. यह बदलाव 'इरादे से डिलीवरी' की तरफ है, लेकिन विकास और डीकार्बोनाइजेशन के बीच संतुलन बनाने का बुनियादी उसूल जस का तस है.

जो चीज सबसे ज्यादा बदली है, वह है ग्लोबल कॉन्टेक्स्ट जिसमें भारत यह ट्रांजिशन कर रहा है. अमेरिका के क्लाइमेट वादों से पीछे हटने से फाइनेंस के फ्लो में अनिश्चितता आ गई है और मल्टीलेटरल कोशिशें कमजोर पड़ी हैं. यूरोपियन यूनियन (EU) की अगुवाई में यूरोप अभी भी आक्रामक लक्ष्यों (जैसे 1990 के स्तर से 2030 तक एमिशन में 55 प्रतिशत की कमी) का पीछा कर रहा है, लेकिन वह एनर्जी सिक्योरिटी और इंडस्ट्रियल कॉम्पिटिशन से जुड़े अंदरूनी दबावों का सामना कर रहा है. चीन ने 'स्केल-ड्रिवन' अप्रोच अपनाई है. उसने 2030 से पहले एमिशन को पीक पर ले जाने और 2060 तक 'कार्बन न्यूट्रलिटी' हासिल करने का वादा किया है, और इस दशक के अंत तक 1,200 गीगावाट से ज्यादा विंड और सोलर क्षमता लगा रहा है. साथ ही, वह अपने इंडस्ट्रियल बेस को सपोर्ट करने के लिए कोयले पर भी भारी निर्भरता बनाए हुए है.

दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाएं इस ट्रांजिशन की मजबूरियों को दिखाती हैं. ब्राजील के क्लाइमेट वादे वनों की कटाई रोकने पर टिके हैं, जिसमें 2005 के स्तर से 2025 तक एमिशन में 48 प्रतिशत और 2030 तक 53 प्रतिशत की कमी का लक्ष्य है. दक्षिण अफ्रीका ने 2030 तक 350 से 42 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर की 'एब्सोल्यूट एमिशन' रेंज तय की है, लेकिन वह अभी भी कोयले पर बहुत ज्यादा निर्भर है, जो उसकी बिजली पैदावार का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा है. इनमें से हर मॉडल महत्वाकांक्षा और मजबूरी के बीच एक अलग बैलेंस दिखाता है.

भारत की अप्रोच इन सबके बीच में बैठती है. यह न तो यूरोप की तरह आक्रामक एब्सोल्यूट कटौती करता है, न ही ब्राजील की तरह 'लैंड यूज' बदलावों पर निर्भर है, और न ही चीन के मैन्युफैक्चरिंग दबदबे वाले 'स्केल-फर्स्ट' मॉडल पर चलता है. इसके बजाय, यह लगातार ग्रोथ के साथ-साथ एक सधे हुए डीकार्बोनाइजेशन को मिलाने की कोशिश करता है. बीच का यह रास्ता सिर्फ एक पॉलिसी चॉइस नहीं है. यह भारत के विकास के चरण, एनर्जी की जरूरतों और आर्थिक प्राथमिकताओं से तय हुई एक स्ट्रक्चरल जरूरत है.

तुलनात्मक रूप से देखें तो, भारत का प्रति व्यक्ति एमिशन अभी भी करीब 2 टन कार्बन डाइऑक्साइड है, जो चीन के 7 टन से ज्यादा और यूरोपियन यूनियन के 6 टन से ज्यादा के मुकाबले काफी कम है. साथ ही, भारत उन चुनिंदा प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है जो मोटे तौर पर अपने पेरिस वादों को पूरा करने या उनसे आगे निकलने के ट्रैक पर है. कम प्रति व्यक्ति एमिशन और विश्वसनीय प्रोग्रेस का यह कॉम्बिनेशन भारत को ग्लोबल क्लाइमेट नेगोशिएशंस में एक मजबूत स्थिति देता है. यह देश को एक्शन दिखाने के साथ-साथ बराबरी की मांग करने का मौका देता है.

'कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज' (COP) का बदलता एजेंडा भी इसी बदलते परिदृश्य को दिखाता है. अब फोकस टारगेट सेट करने से हटकर उन्हें लागू करने पर शिफ्ट हो रहा है. क्लाइमेट फाइनेंस अभी भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है, जहां वादे किए गए और असल में दिए गए फंड के बीच एक लगातार गैप है. कार्बन मार्केट्स ज्यादा अहम होते जा रहे हैं, क्योंकि देश अपने टारगेट्स को कुशलता से पूरा करने के तरीके खोज रहे हैं. कार्बन बॉर्डर टैक्स जैसे 'ट्रेड-लिंक्ड' उपाय नई उलझनें पैदा कर रहे हैं, जो क्लाइमेट एक्शन को बाजार तक पहुंच के साथ जोड़ रहे हैं. जैसे-जैसे क्लाइमेट के असर तेज हो रहे हैं, एडाप्टेशन और रेजिलिएंस की जरूरत भी बढ़ती जा रही है.

भारत का अपडेटेड NDC उसे इस एजेंडे में एक मजबूत स्थिति से शामिल होने का मौका देता है. वह साफ दिखने वाली अपनी प्रोग्रेस का हवाला दे सकता है और साथ ही ज्यादा निष्पक्ष ग्लोबल नियमों के लिए दबाव डालना जारी रख सकता है. उसी समय, इस ट्रांजिशन का आर्थिक पहलू भी अब ज्यादा मुखर हो रहा है. भारत के एनर्जी ट्रांजिशन के लिए 2030 तक लगभग 300 बिलियन डॉलर के इन्वेस्टमेंट की जरूरत का अनुमान है, जिसमें जनरेशन, स्टोरेज, ट्रांसमिशन और नई टेक्नोलॉजी शामिल हैं. इस कैपिटल (फंड) को जुटाना बहुत क्रिटिकल होगा, खासकर एक ऐसे ग्लोबल माहौल में जहां फाइनेंस अब बहुत 'सिलेक्टिव' होता जा रहा है.

इसलिए, कैबिनेट ने 25 मार्च को जिसे मंजूरी दी है, वह सिर्फ टारगेट्स का रिवीजन नहीं है. यह भविष्य की दिशा का ऐलान है. भारत एक ऐसा रास्ता चुन रहा है जो किसी भी अति से बचता है. न तो वह ट्रांजिशन में देरी कर रहा है और न ही अपनी क्षमता से ज्यादा वादे कर रहा है. वह अपनी क्लाइमेट पॉलिसी को औद्योगिक विकास, एनर्जी सिक्योरिटी और जियो-पॉलिटिकल स्थिति के साथ मजबूती से जोड़ रहा है.

एक ऐसी दुनिया में जहां क्लाइमेट पर पुरानी सहमति कमजोर पड़ रही है और नए गठजोड़ अभी आकार ले रहे हैं, वहां 'बीच का यह रास्ता' भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक पसंद साबित हो सकता है.

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