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भारत के ड्रीम फाइटर की राह में इंजन बना रोड़ा

भारत के पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान AMCA का डिजाइन अमेरिकी  एयरोस्पेस कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) के F414 इंजन के हिसाब से तय किया गया गया है

The AMCA is being designed as a fifth-generation stealth combat aircraft with advanced battlefield capabilities aimed at matching emerging global air power standards. (File photo)
फिफ्थ जेनरेशन फाइटर जेट AMCA को 2030 तक भारत वायु सेना में शामिल किया जाना है (फाइल फोटो)
अपडेटेड 26 जून , 2026

भारत और अमेरिकी डिफेंस कंपनी GE एयरोस्पेस के बीच देश के महत्वाकांक्षी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के लिए इंजन की कीमत को लेकर खींचतान चल रही है. रक्षा अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि इस समय GE-F414 इंजन को बदलना कोई विकल्प नहीं है.

पांच AMCA प्रोटोटाइप के लिए 15 इंजन खरीदने की बातचीत शुरू हो चुकी है. रक्षा सूत्रों का कहना है कि स्टेल्थ लड़ाकू विमान का डिजाइन पहले ही F414 इंजन के अनुसार तय किया जा चुका है. इससे GE की सौदेबाजी की स्थिति मजबूत हुई है लेकिन भारत कीमत को लेकर सख्ती से बातचीत करने के पक्ष में है.

हालांकि अमेरिकी कंपनी से कीमत को लेकर बातचीत कुछ समय पहले शुरू हो चुकी थी और अगले दो महीनों में पूरी होने की उम्मीद है. माना जा रहा है कि GE ने इंजन की कीमत ज्यादा बताई है, जिससे AMCA परियोजना की कुल लागत बढ़ सकती है.

एक सूत्र ने कहा, "इस समय हमारे पास इंजन बदलने का विकल्प नहीं है. ऐसा करने पर विमान की एयरोडायनामिक्स, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, कंपन की विशेषताएं और थ्रॉटल कंट्रोल सिस्टम सहित कई हिस्सों में बड़े बदलाव करने पड़ेंगे. थ्रॉटल कंट्रोल सिस्टम एक महत्वपूर्ण तकनीक है जो वाहन के इंजन में जाने वाली हवा और ईंधन की मात्रा को नियंत्रित करती है."

सूत्रों के मुताबिक, इस विमान में 'प्लग-एंड-प्ले' तकनीक नहीं है. प्लग-एंड-प्ले एयरक्राफ्ट से मतलब उन विमानों से है, जिन्हें बिना किसी जटिल सेटअप या लंबे असेंबली समय के सीधे उड़ान के लिए तैनात किया जा सकता है. रफाल लड़ाकू विमान को 'प्लग एंड प्ले' माना जाता है. इसका अर्थ है कि विमान को बेस पर पहुंचते ही हथियार, मिसाइल और अन्य उपकरण पल भर में जोड़े जा सकते हैं, जिससे न्यूनतम समय में वे इमर्जेंसी फ्लाइट के लिए तैयार हो जाते हैं.

AMCA का डिजाइन तय हो जाने के बाद, भविष्य में अगर कोई दूसरा इंजन चुना जाता है तो उसे विमान की मौजूदा संरचना के अनुरूप ढालना होगा. विमान का डिजाइन इंजन के हिसाब से दोबारा तैयार नहीं किया जा सकता है. यही वह बात है, जिसके कारण अमेरिकी कंपनी इंजनी की कीमत उम्मीद से कई गुना ज्यादा बता रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि विमान का डिजाइन पहले ही इस इंजन के मुताबिक बनाया जा चुका है.

एक अन्य अधिकारी ने कहा कि किसी लड़ाकू विमान में इंजन उसकी मूल डिजाइन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. ऐसे में किसी लड़ाकू विमान का इंजन को बदलना सामान्य इंजन बदलने से कहीं अधिक कठिन होता है.

इंजन के आकार, वजन, गुरुत्व केंद्र, थ्रस्ट, एयरफ्लो, कंपन, तापीय विशेषताओं और ईंधन खपत में अंतर विमान की संरचना, प्रदर्शन, संचालन क्षमता और रखरखाव को प्रभावित करता है. इसलिए विमान और इंजन को एक संयुक्त प्रणाली के रूप में दोबारा जांचना पड़ता है.

अधिकारी ने बताया कि इंजन बदलने के लिए फॉर्म, फिट और फंक्शन को दोबारा से जांचना होता है. इसके अलावा, सभी मैकनिकल और इलेक्ट्रिकल इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट्स (ICDs) का भी सत्यापन करना होता है. इसका मतलब यह जांचकर सुनिश्चित करना है कि दो या दो से अधिक सिस्टम या सब-सिस्टम एक-दूसरे के साथ कैसे तालमेल बिठा रहे हैं या तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं. 

इंजन माउंट, जोड़, एयर इनटेक और एग्जॉस्ट सिस्टम, ईंधन, हाइड्रोलिक और इलेक्ट्रिकल सिस्टम, डिजिटल कंट्रोल, सॉफ्टवेयर तथा FADEC (फूल ऑथारिटी डिजिटल इंजन कंट्रोल), एक्सेसरी गियरबॉक्स, पंप, जनरेटर और स्टार्टर सिस्टम जैसे सभी उपकरणों की अनुकूलता सुनिश्चित करनी पड़ती है.

उन्होंने कहा कि बदलाव के बाद दोबारा से तैयार किए जा रहे इस विमान का एयरोडायनामिक्स, एयर इनटेक की अनुकूलता, फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, कंपन, ताप प्रबंधन, ईंधन प्रणाली, ग्राउंड ट्रायल और उड़ान परीक्षण सहित व्यापक परीक्षण करना होता है.

ऐसा इसलिए क्योंकि इंजन बदलने से विमान की कई सिस्टम एक साथ प्रभावित होती हैं. यही कारण है कि किसी विमान में इस तरह के किसी बदलाव को बड़ा डिजाइन चेंज माना जाता है और सर्विस में लेने से पहले पूरी तकनीकी जांच और प्रमाणन जरूरी होता है.

इंडिया टुडे ने जब इस मामले पर GE एयरोस्पेस से संपर्क किया तो कंपनी के प्रतिनिधियों ने यह कहते हुए टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि भारत सरकार के साथ अभी बातचीत चल रही है. दूसरी ओर, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) पहले से ही GE एयरोस्पेस के साथ '80 फीसद तकनीक ट्रांसफर' कार्यक्रम के तहत भारत में 99 GE-F414 इंजन बनाने को लेकर बातचीत कर रही है. F414 लड़ाकू विमान इंजन के संयुक्त उत्पादन के समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद से दोनों पक्ष लगभग तीन वर्षों से बातचीत कर रहे हैं और अब कार्यक्रम के अहम बिंदुओं पर सहमति के करीब पहुंच गए हैं.

पिछले अप्रैल में GE एयरोस्पेस ने कहा था कि भारत में भविष्य के लड़ाकू विमानों के लिए F414 जेट इंजन के संयुक्त उत्पादन को अंतिम रूप देने की दिशा में HAL के साथ अच्छी प्रगति हुई है. एक वरिष्ठ रक्षा अधिकारी ने कहा, "ये दोनों पूरी तरह अलग-अलग बातचीत हैं. कुछ स्वार्थी तत्व यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि AMCA कार्यक्रम मुश्किल में है ताकि पहली बार लड़ाकू विमान कार्यक्रम में भाग ले रही निजी कंपनियों से जुड़ी प्रक्रिया को प्रभावित किया जा सके."

हालांकि यह मामला इस बात को भी जाहिर करता है कि लड़ाकू विमान की महत्वपूर्ण तकनीकों, खासकर इंजन के मामले में भारत अब भी विदेशी कंपनियों पर निर्भर है. ऐसी निर्भरता से स्वदेशी रक्षा परियोजनाएं व्यावसायिक दबाव में आ सकती हैं और विदेशी कंपनियों की सौदेबाजी की स्थिति मजबूत हो जाती है.

रक्षा मंत्रालय ने AMCA के पांच प्रोटोटाइप बनाने के लिए तीन निजी क्षेत्र के नेतृत्व वाले समूहों को रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी किया है. इनमें पहला समूह लार्सन एंड टुब्रो के साथ भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, दूसरा टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और तीसरा समूह भारत फोर्ज के साथ BEML हैं. पिछले महीने जारी RFP के मुताबिक, चुनी गई कंपनी को अनुबंध पर हस्ताक्षर होने के 30 महीने के भीतर विमान की पहली उड़ान करानी होगी.

सरकार ने AMCA के प्रोटोटाइप विकास चरण के लिए 15,000 करोड़ रुपए से अधिक की मंजूरी दी है. इसके तहत पांच उड़ान योग्य प्रोटोटाइप बनाए जाएंगे. सात साल तक चलने वाले परीक्षण अभियान में ये प्रोटोटाइप लगभग 1,800 उड़ानें भरेंगे, जिनके जरिए विमान के फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, स्टेल्थ क्षमता, सेंसर, रडार, हथियारों के एकीकरण और इंजन के प्रदर्शन का परीक्षण किया जाएगा.

AMCA भारत की सबसे महत्वाकांक्षी स्वदेशी लड़ाकू विमान परियोजना है. इसका उद्देश्य भारतीय वायुसेना को पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ लड़ाकू विमान उपलब्ध कराना है. एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और उद्योग जगत के सहयोग से इस दो इंजन वाले विमान को विकसित किया है. इसमें कम रडार पहचान, अंदरूनी हथियार कक्ष, आधुनिक एवियोनिक्स, सेंसर फ्यूजन, AI आधारित निर्णय सहायता प्रणाली और सुपरक्रूज क्षमता जैसी विशेषताएं होंगी.

सरकार के जरिए पूर्ण इंजीनियरिंग विकास चरण को मंजूरी और पर्याप्त धनराशि आवंटित किए जाने के बाद यह परियोजना अब विकास के महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है. विमान के  इंजीनियरिंग वर्क, सिस्टम इंटिग्रेशन और उत्पादन से जुड़े डिजाइन पर काम जारी है. इस कार्यक्रम की खास बात यह है कि सरकार ने इसमें सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र की एयरोस्पेस कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने का फैसला किया है, जिससे भारत के रक्षा औद्योगिक ढांचे को मजबूत किया जा सके.

फिलहाल ध्यान प्रोटोटाइप विकास, तकनीक के परीक्षण और उत्पादन के लिए जरूरी औद्योगिक व्यवस्था तैयार करने पर है. इंजन का विकास अभी भी इस परियोजना की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है. इसके लिए स्वदेशी क्षमता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है.

दशक के अंत तक प्रोटोटाइप की पहली उड़ान होने की उम्मीद है. इसके बाद परीक्षण की प्रक्रिया चलेगी. अगर सबकुछ सही रहता है तो AMCA को 2030 के दशक के मध्य तक भारतीय वायुसेना में शामिल किए जाने की संभावना है. यह भारत की उन्नत एयरोस्पेस आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम होगा.

वहीं, AMCA Mk-2 में 110-120 किलोन्यूटन (kN) थ्रस्ट क्षमता वाला अधिक शक्तिशाली इंजन लगाया जाएगा जिसे अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के तहत विकसित किया जा रहा है. इस कार्यक्रम के लिए फ्रांस की एयरोस्पेस कंपनी सैफरन और ब्रिटेन की रॉल्स-रॉयस प्रमुख दावेदार बनकर उभरी हैं.

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