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भारतीय वायुसेना ने शुरू की अगले 50 साल की तैयारी; कैसे बदलेगा हवाई बेड़ा?

भारतीय वायुसेना करीब 1 लाख करोड़ रुपये से मध्यम परिवहन विमान (MTA) कार्यक्रम शुरू करने जा रही है, जिसका मकसद अगले पचास वर्षों में भारत के सैन्य विमानन क्षेत्र को नया रूप देना है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 5 जून , 2026

दशकों से भारतीय वायुसेना (IAF) का परिवहन बेड़ा सोवियत काल के एंटोनोव एएन-32 और इल्यूशिन Il-76 विमानों पर निर्भर रहा है. ये विमान लद्दाख की बर्फीली ऊंचाइयों से लेकर हिंद महासागर के आपदा प्रभावित क्षेत्रों तक हर जगह सेवा दे चुके हैं.

अब ये विमान काफी पुराने हो गए हैं और अपनी उम्र के आखिरी चरण में पहुंच चुके हैं. इसलिए भारतीय वायुसेना एक बहुत महत्वपूर्ण सौदे की तैयारी कर रही है. करीब 1 लाख करोड़ रुपए से वायुसेना मध्यम परिवहन विमान (MTA) कार्यक्रम शुरू करने जा रही है.

यह कार्यक्रम अगले 50 वर्षों में भारत के सैन्य विमानन क्षेत्र को पूरी तरह से नया रूप दे सकता है. यह कार्यक्रम सिर्फ पुराने विमानों को बदलने भर का नहीं है. इसका मकसद सेना के बेड़े में एक नई पीढ़ी की हवाई क्षमता बनाने का है जो सैनिकों, टैंकों, हथियारों, सामान और मानवीय सहायता को बहुत तेजी से लंबी दूरी तक ले जा सके.

साथ ही, आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत देश में ही एक मजबूत एयरोस्पेस निर्माण तंत्र विकसित करना भी इसका मकसद है. इस डील के लिए होने वाली प्रतियोगिता में ब्राजील की एयरोस्पेस कंपनी एम्ब्रेयर सबसे आगे है. वह अपना सी-390 मिलेनियम टैक्टिकल ट्रांसपोर्ट विमान महिंद्रा ग्रुप के साथ साझेदारी में पेश कर रही है. एम्ब्रेयर का वादा है कि वह भारत को क्षेत्रीय स्तर पर उत्पादन, रखरखाव और निर्यात का हब बना देगी.

यह मौका ऐसे समय पर आया है जब डिफेंस कंपनी एम्ब्रेयर अपने सबसे अच्छे दौर में है. कुछ हफ्ते पहले ही उसने ब्राजील के बाहर अपना सबसे बड़ा रक्षा निर्यात ऑर्डर पाया है. यह सौदा संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ हुआ है. इसके तहत कुल 20 C-390 मिलेनियम विमान के ऑर्डर किए जाने की खबर है. इनमें 10 पक्के ऑर्डर और 10 ऑप्शन शामिल हैं.

एम्ब्रेयर डिफेंस के वरिष्ठ अधिकारी कैटानो स्पुल्डारो नेटो ने इंडिया टुडे से कहा, "UAE से होने वाला C-390 विमान को लेकर यह डील उनके लिए एक बड़ी सफलता है. दुनिया भर में इस विमान पर लोगों का भरोसा बढ़ रहा है." नेटो के मुताबिक, इस विमान के दुनिया में अब तक 12 देश ग्राहक बन चुके हैं, जिनमें कई NATO देश शामिल हैं. यूरोप, मध्य पूर्व और एशिया में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है.

भारतीय सरकार की रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने MTA कार्यक्रम के लिए पहले ही स्वीकृति (AoN) दे दी है. एम्ब्रेयर को उम्मीद है कि आने वाले कुछ महीनों में औपचारिक RFP (प्रस्ताव के लिए अनुरोध) जारी कर दिया जाएगा. IAF का MTA कार्यक्रम 60 से 80 मध्यम परिवहन विमानों की तलाश कर रहा है जो 18 से 30 टन तक का पेलोड ले जा सकें.

ये विमान हल्के टैक्टिकल एयरलिफ्टर और भारी सामरिक परिवहन विमानों के बीच के महत्वपूर्ण अंतर को भरेंगे. An-32 बेड़े को बदलने और Il-76 की संख्या बढ़ाने के अलावा, यह कार्यक्रम भारत की दूर-दराज की सीमाओं को तेजी से सैनिकों से मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएगा. साथ ही सैन्य अभियानों को लंबे समय तक चलाने और मानवीय संकटों में तुरंत मदद पहुंचाने की क्षमता को काफी बढ़ाएगा.

इस खरीदारी की एक अहम खासियत स्वदेशी मैनुफैक्चरिंग पर जोर है. ये विमान भारतीय घरेलू कंपनियों के साथ साझेदारी में ही बनाए जाएंगे. इससे देश में लंबे समय तक एयरोस्पेस निर्माण, रखरखाव और सप्लाई चेन की मजबूत क्षमता विकसित होगी. अभी देश में इस साझेदारी के लिए तीन बड़े दावेदार सामने आए हैं.

पहला- एम्ब्रेयर और महिंद्रा मिलकर C-390 मिलेनियम विमान पेश कर रहे हैं. दूसरा- लॉकहीड मार्टिन और टाटा एडवांस्ड सिस्टम C-130 जे सुपर हरकुलस की पेशकश कर रहे हैं, जो पहले से भारत के पास है. तीसरा- एयरबस A400M एटलस भी एक खास विमान ऑफर करने वाला है. इसतरह वह भारत में अपनी बढ़ती औद्योगिक मौजूदगी का फायदा उठाना चाहता है.

इस सेक्टर से जुड़े विशेषज्ञों का अनुमान है कि अंतिम ऑर्डर 40 से 80 विमानों के बीच हो सकता है. इससे यह अमेरिका के बाहर पिछले कई दशकों का सबसे बड़ा सैन्य परिवहन विमान कार्यक्रम बन जाएगा. अगर एम्ब्रेयर को यह सौदा मिलता है, तो कंपनी भारत में फाइनल असेंबली लाइन, रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल (MRO) की सुविधाएं तथा स्वदेशी सप्लायर इकोसिस्टम स्थापित करेगी. एयरबस-टाटा के C-295 कार्यक्रम के विपरीत, जो बाय ग्लोबल फ्रेमवर्क के तहत सौदा ऑफर कर रही है. खबर है कि MTA कार्यक्रम बाय इंडियन कैटेगरी के अंतर्गत चलाया जाएगा. इससे भारतीय उद्योग को बहुत बड़ी भूमिका और अवसर मिलेगा.

एम्ब्रेयर कंपनी के अधिकारी नेटो ने कहा, “हम इस प्रोग्राम में पूरी तरह बराबर के पार्टनर हैं. हमारा मकसद सिर्फ भारत में विमान जोड़ना नहीं बल्कि यहां क्षमता, इंफ्रास्ट्रक्चर और इस सेक्टर में भारत को एक्सपर्टीज बनाना है.” कंपनी कहती है कि यह विमान 21वीं सदी का आधुनिक डिजाइन है, इसलिए इसमें बेहतर इलेक्ट्रॉनिक्स, मिशन की लचीलापन, आसान रखरखाव और कम खर्च आता है.

इसकी सबसे बड़ी खूबी इसका प्लग-एंड-प्ले सिस्टम है, जिसकी वजह से एक ही विमान को जल्दी-जल्दी अलग-अलग कामों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. माल ढोने, हवा में ईंधन भरने, बीमारों को ले जाने, आग बुझाने और खास ऑपरेशनों के लिए.

कॉन्ट्रैक्ट मिलने से बहुत पहले एम्ब्रेयर भारत में अपने सप्लायर्स का नेटवर्क बढ़ा रही है. हाल में उसने भारत फोर्ज कंपनी को एयरक्राफ्ट पार्ट्स बनाने का काम दिया है और इससे पहले हिंडाल्को के साथ हाई-क्वालिटी एयरोस्पेस सामग्री के लिए समझौता किया था. एम्ब्रेयर IAF की नेत्र (NETRA) एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) फ्लीट को भी बढ़ावा देना चाहती है. यह EMB-145 प्लेटफॉर्म पर बनेगी, जिस पर DRDO का स्वदेशी नेत्र सिस्टम लगा होता है. छह और नेत्र Mk-1A विमानों के प्रस्ताव को DAC ने मंजूरी दे दी है, अब अंतिम फैसले का इंतजार है.

बता दें कि भारतीय वायुसेना (IAF) इसका इस्तेमाल आसमान में गश्त लगाने, दुश्मन के विमानों पर नजर रखने और सीमा की निगरानी करने के लिए करती है. साथ ही एम्ब्रेयर कंपनी अपना कॉम्बैट लाइट एयरक्राफ्ट A-29 सुपर टुकानो भी भारतीय वायुसेना के अधिकारियों को दिखा रही है. यह टर्बोप्रॉप विमान सीमा निगरानी, आतंकवाद विरोधी अभियानों और काउंटर ड्रोन मिशनों के लिए इस्तेमाल होता है. इसमें गैस-टर्बाइन इंजन का इस्तेमाल प्रोपेलर को घुमाने के लिए किया जाता है.

इसे अब तक करीब 20 देशों में निर्यात किया जा चुका है. अब इसकी मार्केटिंग बढ़ाने के लिए इसमें एंटी UAV (ड्रोन-रोधी) क्षमताओं को शामिल किया गया है. हालांकि भारत में अभी इस तरह के एयरक्राफ्ट की कोई आधिकारिक जरूरत नहीं है फिर भी एम्ब्रेयर का मानना है कि बदलते सुरक्षा चुनौतियों के कारण भविष्य में अवसर पैदा हो सकते हैं.

आधुनिक युद्ध की चुनौतियों और हाल के वैश्विक संघर्षों ने ड्रोन से निपटने के लिए प्रभावी समाधानों की तत्काल जरूरत को उजागर किया है. दुनिया भर की सेनाएं ड्रोन जैसे खतरनाक और लगातार बने रहने वाले खतरे से निपटने के लिए भारी संसाधन खर्च कर रही हैं. वे अक्सर महंगे फाइटर जेट्स जैसे हाई-एंड प्लेटफॉर्म्स को ड्रोन मारने के लिए लगाती हैं जिससे हर मिशन का खर्च बहुत ज्यादा हो जाता है.

एम्ब्रेयर डिफेंस के वरिष्ठ अधिकारी कैटानो स्पुल्डारो नेटो के मुताबिक, " कॉम्बैट लाइट एयरक्राफ्ट A-29 सुपर टुकानो UAS ड्रोन को प्रभावी तरीके से और बहुत कम लागत में नष्ट करने के लिए आदर्श साधन माना जा रहा है. यह विमान पहले से ही कई दूसरे मिशनों में भी सक्षम हैं, जैसे क्लोज एयर सपोर्ट, सशस्त्र टोह, उन्नत प्रशिक्षण और कई अन्य भूमिकाओं में.”

उन्होंने आगे कहा कि A-29 की मौजूदा क्षमताओं और नए सेंसर्स (जैसे टारगेट कोऑर्डिनेट्स प्राप्त करने वाले डेटालिंक, लेजर ट्रैकिंग और डिजिग्नेशन के लिए EO/IR सेंसर, लेजर-गाइडेड रॉकेट्स तथा विंग पर लगे .50 कैलिबर मशीन गन्स) की मदद से एम्ब्रेयर ने एक ऑपरेशनल कॉसेप्ट (CONOPS) तैयार किया है. इससे मौजूदा और भविष्य के A-29 ऑपरेटर जब चाहें, अपने विमान में काउंटर ड्रोन मिशन की क्षमता आसानी से जोड़ सकते हैं.

अब तक A-29 सुपर टुकानो विमान दुनिया भर की 22 देशों की वायुसेनाओं के जरिए इस्तेमाल किया जा रहा है. इनमें ब्राजील, चिली, इक्वाडोर, कोलंबिया, डोमिनिकन रिपब्लिक जैसे देश शामिल हैं. इनके अलावा, हाल ही में पैराग्वे, उरुग्वे तथा पनामा की वायुसेना में भी यह विमान शामिल हो चुका है.

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