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क्या बांग्लादेश चुनाव में 'बिहार मॉडल' अपनाना चाहती है जमात-ए-इस्लामी?

बिहार में NDA की जीत में 'जंगल राज' का खौफ एक बड़ा हथियार साबित हुआ था. अब बांग्लादेश के आम चुनाव में जमात-ए-इस्लामी भी BNP के खिलाफ कुछ वैसा ही दांव चल रही है

बांग्लादेश चुनाव प्रचार
बांग्लादेश चुनाव प्रचार
अपडेटेड 12 फ़रवरी , 2026

पिछले साल जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार विधानसभा चुनाव में मोर्चा संभाला था, तो उनका चुनावी दांव मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासन के वादों से ज्यादा 'अतीत की चेतावनी' पर टिका था. लगभग हर बड़ी रैली में BJP और उसकी सहयोगी JDU ने 1990 के दशक के 'जंगल राज' की यादें ताजा कीं, जिसका ठीकरा उस दौर की RJD सरकार पर फोड़ा गया.

संदेश बिल्कुल साफ था - अगर सत्ताधारी NDA के खिलाफ वोट दिया, तो राज्य में फिर से अराजकता, रंगदारी और माफिया राज के दरवाजे खुल जाएंगे. भले ही अब RJD की कमान लालू प्रसाद यादव या राबड़ी देवी के बजाय उनके छोटे बेटे तेजस्वी यादव के हाथ में है, लेकिन NDA के प्रचार ने 'अतीत और वर्तमान' के फर्क को धुंधला करने की पूरी कोशिश की. अव्यवस्था का यह डर सियासी तौर पर बेहद असरदार रहा. बिहार के जानकारों का मानना है कि मतदाताओं ने शायद खौफ या सावधानी के चलते ही NDA को भारी बहुमत से वापस सत्ता सौंपी.

अब ठीक कुछ महीनों बाद, भारत की पूर्वी सीमा पर 12 फरवरी को होने वाले बांग्लादेश के आम चुनाव में भी बिल्कुल वैसी ही चुनावी रणनीति देखने को मिल रही है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के अलावा चुनाव में एक और बड़ा खिलाड़ी जमात-ए-इस्लामी है, जिसने अपनी पूरी मुहिम एक ही दलील पर टिका दी है कि बांग्लादेश को 2001 से 2006 के BNP शासन वाले दौर में वापस नहीं जाना चाहिए. ताज्जुब की बात यह है कि जमात खुद स्वर्गीय बेगम खालिदा जिया के नेतृत्व वाली उस सरकार में साझीदार थी.

जमात का 'प्लेबुक' रैलियों, घर-घर जाकर किए जा रहे प्रचार और सोशल मीडिया के जरिए लगातार मतदाताओं को उस पुराने दौर की याद दिला रही है. पार्टी नेता अक्सर उस वैश्विक शर्मिंदगी का जिक्र करते हैं जब 'ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल' ने BNP शासन के दौरान बांग्लादेश को भ्रष्टाचार के मामले में सबसे खराब रैंकिंग दी थी.

दिलचस्प बात यह है कि वही इंडेक्स 2025 में भी बांग्लादेश को 13वां सबसे भ्रष्ट देश बताता है. इसलिए जमात की दलील दोतरफा है. पहला, उसका दावा है कि BNP की वापसी से भ्रष्टाचार फिर से जड़ें जमा लेगा. दूसरा, वह अगस्त 2024 में अवामी लीग सरकार के पतन के बाद से BNP के स्थानीय और मझोले स्तर के नेताओं पर लग रहे रंगदारी के आरोपों की ओर इशारा करती है.

कुल मिलाकर ये दावे ही जमात की उस अपील का आधार हैं, जिसे वह 'अतीत से पूरी तरह नाता तोड़ना' कहती है. 'बदलाव के लिए वोट' पार्टी का मुख्य नारा बन गया है. वादा बिल्कुल सीधा है: या तो भ्रष्टाचार मुक्त सरकार या फिर उसी बदनाम राजनीतिक चक्र की वापसी.

ढाका की सड़कों से उठती आवाजें

मैं 9 फरवरी को चुनाव कवर करने ढाका पहुंचा. पूरा शहर चुनावी गहमागहमी से गूंज रहा था। एयरपोर्ट से कावरान बाजार जाते समय, करीब 16 किमी के सफर में सोहाग नाम का एक नौजवान टैक्सी चला रहा था.

कार की खिड़की से बाहर दिखते चुनावी पोस्टरों के बीच उसने मुझसे कहा, "हमने BNP और अवामी लीग, दोनों की सरकारें देखी हैं. अब हमें जमात को एक मौका देना चाहिए."

सोहाग ढाका जिले की उन 20 सीटों में से एक का वोटर है, जो देश की संसद (जातीय संसद) की कुल 350 सीटों का हिस्सा हैं. उसकी चिंता साफ़ थी. उसने कहा, "अगर BNP लौटी, तो रंगदारी और भ्रष्टाचार भी लौट आएगा."

यही भाव तब भी देखने को मिला जब मैं बांग्लादेश चुनाव आयोग के दफ्तर जा रहा था. उबर बाइक चलाने वाला 23 साल का सजीबुल उन 5 करोड़ युवा मतदाताओं में से एक है, जो पहली बार वोट डालेंगे. उन्होंने कहा, "मैं BNP को वोट देना चाहता था, लेकिन उन्होंने शुरुआत में जनमत संग्रह का विरोध किया. मैं चाहता हूं कि जनमत संग्रह पास हो, यह हमारे लिए जरूरी है."

संसदीय चुनाव के साथ ही होने वाला यह राष्ट्रीय जनमत संग्रह राज्य की संस्थाओं में सुधारों के लिए लाया गया है.

सजीबुल अब अपना मन बदल चुके हैं. उन्होंने जोर देकर कहा, "इसीलिए मैं जमात को वोट दूंगा." सजीबुल ढाका-14 जैसी हाई-प्रोफाइल सीट का वोटर है, जहां जमात के मीर अहमद बिन कासिम का मुकाबला BNP की संजीदा इस्लाम तुली से है.

एक 'खामोश' अभियान?

BNP और सिविल सोसाइटी के एक धड़े ने इस नैरेटिव का कड़ा विरोध किया है. उनका तर्क है कि जमात गुपचुप तरीके से एक इन्फ्लुएंस ऑपरेशन चला रही है, जिसमें कैब ड्राइवरों, रिक्शा चालकों और होटल स्टाफ को पैसे देकर पार्टी की तारीफ करवाई जा रही है.

मुझे खुद होटल के दो ऐसे कर्मचारी मिले जिन्होंने बड़े भरोसे के साथ दावा किया कि जमात चुनाव नतीजों को पलट सकती है.

आलोचक इन दावों को एक सोचे-समझे 'परसेप्शन कैंपेन' का हिस्सा बताते हैं. नई नेशनल सिटीजन्स पार्टी के पूर्व नेता अनिक रॉय कहते हैं, "यह एक साइलेंट कैंपेन है." अनिक जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे हैं, जिसने शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंका और उन्हें भारत में शरण लेने पर मजबूर कर दिया. अनिक का मानना है कि इस हवा का असर शायद वोटों में न दिखे.

जमात इन आरोपों को सिरे से खारिज करती है. पार्टी नेताओं का कहना है कि यह समर्थन स्वाभाविक है क्योंकि लोग BNP और अवामी लीग, दोनों से थक चुके हैं. वहीं, जमात के कुछ रणनीतिकार दबी जुबान में BNP नेताओं को 'ओवरकॉन्फिडेंट' बताते हैं.

बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ राजनयिक ने अधिक संतुलित आकलन पेश किया. उन्होंने कहा, "जमात के पक्ष में बह रही इस अंडरकरंट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता."

युवाओं और ग्रामीण इलाकों में पैठ तमाम चर्चाओं के बावजूद BNP सार्वजनिक रूप से आत्मविश्वास से लबरेज है. BNP की रिसर्च और मॉनिटरिंग टीम के प्रमुख रेहान असद अंदरूनी और बाहरी सर्वे का हवाला देते हैं. उन्होंने कहा, "सोशल मीडिया ट्रैकिंग और जमीनी आकलन BNP के लिए 50-60 फीसद समर्थन दिखाते हैं, जबकि जमात को करीब 20 फीसद वोट मिल सकते हैं."

अगर यह '20 फीसद' सच साबित होता है, तो यह जमात के लिए एक बहुत बड़ी छलांग होगी. जमात ने 1986 से 2008 के बीच कई चुनाव लड़े हैं. उसका सबसे अच्छा प्रदर्शन 1991 में रहा था, जब उसे 12.2 फीसद (करीब 41 लाख) वोट मिले थे.

बांग्लादेश के 12.77 करोड़ मतदाताओं का 20 फीसद होने का मतलब है 2.5 करोड़ से ज्यादा वोट. अगर जमात इस आंकड़े के करीब भी पहुंचती है, तो यह उसके लिए अभूतपूर्व होगा.

ताजा सर्वे बताते हैं कि जमात ने ग्रामीण बांग्लादेश में गहरी पैठ बनाई है, जिससे वह धारणा टूट रही है कि उसका आधार केवल शहरी इलाकों या धार्मिक गढ़ों तक सीमित है.

छात्र राजनीति में आया बदलाव भी बहुत कुछ कहता है. हाल ही में देशभर के विश्वविद्यालय चुनावों में जमात के छात्र संगठन 'इस्लामी छात्र शिबिर' ने क्लीन स्वीप किया है. यह नतीजा युवा मतदाताओं के बीच एक बड़े वैचारिक बदलाव का संकेत है, खासकर उन परिसरों में जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से देश के राजनीतिक आंदोलनों को दिशा दी है.

हवा का रुख भांपते हुए BNP के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान ने अब अपनी पार्टी की ओर से जनमत संग्रह के पक्ष में प्रचार करने का ऐलान किया है. हालांकि, कई जानकार इसे एक रणनीतिक कदम के बजाय 'रिएक्टिव' मान रहे हैं, क्योंकि BNP को अहसास हो गया है कि युवाओं का एक बड़ा हिस्सा जनमत संग्रह के पक्ष में है.

बांग्लादेश एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष और अमेरिका में बांग्लादेश के पूर्व राजदूत एम. हुमायूं कबीर कहते हैं, "BNP और जमात, दोनों ने ही हाल के चुनावों में अपनी असली ताकत नहीं जांची है. पहली बार जमात एक मुख्य दावेदार के रूप में उभर रही है. यह चुनाव दोनों पक्षों को चौंका सकता है."

सियासी उथल-पुथल वाला चुनाव जमात के लिए अपने दम पर सरकार बनाना मुश्किल है. लेकिन अगर वह 100 से 110 सीटें हासिल कर लेती है, तो यह चुनावी गणित को पूरी तरह बदल देगा और जातीय संसद में 200 से ज्यादा सीटें जीतने के BNP के सपने को तगड़ा झटका दे सकता है.

बिहार में लालू-राबड़ी युग की वापसी के डर ने शायद BJP और JDU को भारी बहुमत दिलाने में मदद की थी. ठीक उसी तरह बांग्लादेश में जमात भी BNP के पुराने दौर के भ्रष्टाचार और अराजकता की यादें दिलाकर 'बदलाव' के लिए वोट मांग रही है.

यह रणनीति सत्ता दिलाएगी या सिर्फ चुनावी गणित बिगाड़ेगी, यह तो वक्त ही बताएगा. लेकिन ढाका की गलियों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक, जमात की इस खामोश लहर को अब खारिज नहीं किया जा सकता.

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