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उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था ऊपर जा रही जबकि उसी जैसा पहाड़ी राज्य हिमाचल क्यों हुआ खस्ताहाल?

एक ओर हिमाचल प्रदेश सरकार गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहा है, जबकि दूसरी तरफ उत्तराखंड ने बीते दो दशक में अपनी अर्थव्यवस्था को दोगुना कर लिया है

उत्तराखंड के CM धामी और हिमाचल प्रदेश के सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू
उत्तराखंड के CM धामी और हिमाचल प्रदेश के सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू
अपडेटेड 13 फ़रवरी , 2026

हिमाचल प्रदेश सरकार का खजाना खाली होने की कगार पर है. इस बीच केंद्र सरकार ने राजस्व घाटा अनुदान (RDG) देने से इनकार कर दिया है. ऐसे में अब मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार के सामने राज-काज चलाने की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है.

हिमाचल प्रदेश के वित्त विभाग के मुताबिक, 2026-27 में राज्य सरकार 13,000 करोड़ रुपये कर्ज व ब्याज के तौर पर चुकाएगी, जबकि सुक्खू सरकार ने इस वित्त वर्ष में 10,000 करोड़ रुपये उधार लेने की योजना बनाई है. मतलब साफ है कि सरकार जितना कर्ज ले रही है, उससे ज्यादा देनदारी है.

जबकि इसके उलट हिमाचल प्रदेश के जितना क्षेत्रफल और उसी जैसे भौगोलिक इलाके वाले उत्तराखंड ने आर्थिक विकास के मोर्चे पर अपने पड़ोसी राज्य को कहीं पीछे छोड़ दिया है. 2025 में उत्तराखंड के मुकाबले हिमाचल प्रदेश पर करीब 26 हजार करोड़ ज्यादा कर्ज हो गया था.

PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक, 2025 में उत्तराखंड पर कुल कर्ज 75 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा था, जबकि इसी समय हिमाचल प्रदेश पर कुल कर्ज 1 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो गया था. हालांकि, दोनों ही राज्यों ने 2025-26 में कर्ज और ब्याज का थोड़ा हिस्सा चुकाया था.

ऐसे में जानते हैं एक जैसी इकोनॉमी, भौगोलिक स्थिति होने के बावजूद कैसे उत्तराखंड ने हिमाचल प्रदेश को पीछे छोड़ दिया और हिमाचल प्रदेश का खजाना खाली होने की क्या वजह है?

पड़ोसी पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश से कैसे आगे निकला उत्तराखंड?

इस सवाल का जवाब "द ग्रेट कन्वर्जेंस: ए केस स्टडी ऑफ उत्तराखंड एंड हिमाचल प्रदेश (2000 टू 2020)" नाम के एक रिसर्च पेपर में मिलता है. भारत सरकार की सचिव शमिका रवि और उत्तर प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी आलोक कुमार ने मिलकर इसे तैयार किया है.

इस रिसर्च पेपर के मुताबिक, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में अगर तुलना की जाए तो हिमाचल प्रदेश के पास कुल क्षेत्र करीब 55 हजार वर्ग किमी है, जबकि उत्तराखंड के पास थोड़ा कम 53 हजार वर्ग किमी है. वहीं, 2011 के जनगणना के मुताबिक, उत्तराखंड में हिमाचल प्रदेश से करीब 32 लाख ज्यादा लोग रहते हैं.

दोनों पहाड़ी राज्यों की भौगोलिक स्थिति काफी समान है. पर्यटन दोनों के लिए महत्वपूर्ण आय स्रोत है. इस सबके बावजूद, पिछले दो दशक में उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था ने हिमाचल प्रदेश से बेहतर प्रदर्शन किया है. उत्तराखंड की GSDP राज्य गठन के बाद से लगभग 24 गुना बढ़ी है. परिणामस्वरूप, उत्तराखंड ने प्रति व्यक्ति आय में हिमाचल को पीछे छोड़ दिया है. 2024-25 में हिमाचल की प्रति व्यक्ति आय लगभग ₹2.57 लाख अनुमानित है, जबकि उत्तराखंड की ₹2.74 लाख.

रिसर्च पेपर के मुताबिक, 2003 में दोनों ही राज्यों को केंद्र से समान रियायती औद्योगिक पैकेज (CIP) मिलना शुरू हुआ. इसके बावजूद उत्तराखंड ने हिमाचल प्रदेश को पीछे छोड़ दिया. ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों राज्यों ने विकास के अलग-अलग रास्ते अपनाए, जिसके परिणामस्वरूप आर्थिक परिणाम बिल्कुल भिन्न हुए.

2003 के आसपास दोनों पहाड़ी राज्यों ने लगभग एक जैसी औद्योगिक नीतियों की घोषणा की. हालांकि, उत्तराखंड ने टाउन प्लानिंग और लैंड यूज रेगुलेशन से जुड़े नियम हिमाचल प्रदेश से अलग बनाए. एक ओर हिमाचल प्रदेश सरकार ने कंपनियों को किसानों से सीधे जमीन खरीदने के नियम बना दिए. सरकार सिर्फ जमीन खरीदने और बेचने के वाले के बीच मध्यस्थता की भूमिका निभाती थी.

वहीं, उत्तराखंड सरकार ने मात्र तीन साल में 8,000 एकड़ बंजर भूमि पर औद्योगिक बुनियादी ढांचे का निर्माण करके सबको चौंका दिया. इसके तहत सड़कें, 220KV विद्युत संयंत्र, पेयजल आपूर्ति प्रणाली, जल निकासी, सीवेज और प्रदूषित जल उपचार संयंत्र, लॉजिस्टिक पार्क, आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्र तथा अन्य संबंधित सुविधाएं शामिल हैं. कंपनियों को रियायती दरों पर जमीनें सारी सुविधाओं के साथ मिली.

इन सब कारणों से उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में बीते दो दशक में 9.5 गुना तक की वृद्धि देखी गई, जबकि हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था में अपने पड़ोसी राज्य के मुकाबले करीब आधी यानी 4.6 गुना की मामूली वृद्धि ही देखने को मिली. इन सबके कारण हिमाचल प्रदेश अपने पड़ोसी राज्य उत्तराखंड से पिछड़ता चला गया. उत्तराखंड ने 22 वर्षों में अपने राजस्व को 18 गुना से अधिक बढ़ाने में कामयाबी हासिल की, हिमाचल प्रदेश ने इतने ही समय में 5.5 गुना वृद्धि हासिल की.

इसके अलावा, हिमाचल प्रदेश के घाटे और कर्ज में जाने की एक बड़ी वजह सब्सिडी भी है. 16वें वित्त आयोग के रिपोर्ट मुताबिक, 2022-23 से 2024-25 वित्त वर्ष के बीच हिमाचल प्रदेश ने प्रति व्यक्ति आय पर कुल सब्सिडी 4729 रुपए का दिया है. इसमें बिजली पर 1307 और सोशल सिक्योरिटी पर 1505 रुपए है. वहीं. इसी समय में उत्तराखंड ने 3318 रुपए प्रति व्यक्ति सब्सिडी पर खर्च किए हैं. यानी हिमाचल प्रदेश ने उत्तराखंड से 1411 रुपए ज्यादा खर्च किए हैं. उत्तराखंड ने बिजली पर महज प्रति व्यक्ति 16 रुपए जबकि सोशल सिक्योरिटी पर 1230 पर खर्च किए हैं.

बढ़ रहे कर्ज के बीच हिमाचल प्रदेश का राजस्व घाटा अनुदान क्यों रोका गया?

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG)की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य का कर्ज 2022-23 में 86,589 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,04,729 करोड़ रुपये हो गया है. इसमें से 29,046 करोड़ रुपये सुक्खू के सत्ता संभालने के बाद से तीन वर्षों में उधार लिए गए हैं. हालांकि, उनका कहना है कि इन निधियों का 70 फीसद हिस्सा पिछली BJP सरकार के जरिए लिए गए ऋण और ब्याज को चुकाने में इस्तेमाल किया गया था.

राजस्व घाटा अनुदान यानी RDG संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत केंद्र सरकार के जरिए राज्यों को राजस्व आय और व्यय के बीच अंतर को पाटने के लिए दिया जाता है. 16वें वित्त आयोग ने अगले 5 साल यानी 2026-31 तक के लिए राजस्व घाटा अनुदान (RDG) को पूरी तरह से बंद करने की बात कही है. केंद्र का तर्क है कि राज्य अनुदान पर निर्भर न रहकर आय बढ़ाने पर फोकस करे, इसलिए ये सख्त फैसला लिया गया है.

वहीं, सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा, "अगर हम अपने जंगलों का दोहन उसी तरह करें जैसे कुछ अन्य राज्यों ने किया है, तो हम दो साल में 1 लाख करोड़ रुपये कमा सकते हैं. इसके बजाय, हम स्वच्छ हवा, जल सुरक्षा और जलवायु नियंत्रण के माध्यम से प्रतिवर्ष देश को 1.65-1.90 लाख करोड़ रुपये की पारिस्थितिक सेवाएं प्रदान करते हैं. RDG को पूरी तरह से हटाना इस योगदान की अनदेखी है."

हिमाचल सरकार के पास अब आगे की क्या राह है?

हिमाचल प्रदेश सरकार के प्रिंसिपल सेक्रेटरी (फाइनेंस) देवेश कुमार ने राज्य की इस हालत को बेहद चिंताजनक बताया है. उन्होंने कहा कि राज्य को इस परिस्थिति से निपटने के लिए तुरंत सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा के नाम पर चलाए जाने वाली स्कीम को बंद करने की जरूरत है. इतना ही नहीं उन्होंने अलग-अलग सामाजिक पेंशन पर रोक लगाने का सुझाव दिया है. देवेश का कहना है कि बिना कठोर कदम उठाए सरकार इस संकट से नहीं निपट पाएगी. देवेश कुमार ने इसके लिए कुछ सुझाव भी दिए हैं -

- सब्सिडी में कटौती: बिजली सब्सिडी (₹1,200 करोड़) और सामाजिक सुरक्षा पेंशन (₹1,661 करोड़) जैसी अन्य गैर-जरूरी सब्सिडियों को खत्म या कम करने की सलाह दी गई है.
- प्रशासनिक खर्च में कमी: पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार के अनुसार सरकारी दफ्तरों, बोर्ड/निगमों को मर्ज या बंद करना और नई भर्तियों पर रोक लगाकर फिजूलखर्ची कम करना.
- पेंशन सुधार: यूनिफाइड पेंशन स्कीम को अपनाना या नई पेंशन स्कीम (NPS) में लौटना ताकि भविष्य में उधार की सीमा बढ़ाई जा सके.
- केंद्र से राजनीतिक हस्तक्षेप की मांग: मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर RDG बहाल करने या 'ग्रीन बोनस' (हिमालयी राज्यों के लिए विशेष फंड) की मांग कर सकते हैं.

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