खाड़ी देशों में तेल टैंकरों और ऊर्जा प्लांट्स पर ताजा हमलों ने एक बार फिर जाहिर कर दिया है कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल गलियारे की स्थिति कितनी नाजुक है.
अपनी कुल जरूरत का 85 फीसद से ज्यादा कच्चा तेल आयात करने वाले भारत के लिए होर्मुज स्ट्रेट (जलसंधि) के आसपास का तनाव सिर्फ भू-राजनीतिक संकट नहीं, बल्कि एक गंभीर आर्थिक संकट का संकेत भी है.
भारत में खाड़ी देशों से आने वाले तेल के करीब आधे से अधिक हिस्से का आयात ईरान और ओमान के बीच स्थित इसी संकरे जलमार्ग से होता है. यही कारण है कि इस क्षेत्र में किसी भी रुकावट को नीति निर्माताओं और तेल कंपनियों के लिए तत्काल चिंता का विषय बना देता है.
पिछले एक हफ्ते में खाड़ी के समुद्री मार्गों के रास्ते गुजरने वाले कई टैंकरों और मालवाहक जहाजों ने ड्रोन या मिसाइल हमलों की सूचना दी है. इन हमलों में होर्मुज स्ट्रेट के पास कुछ जहाजों को नुकसान पहुंचा है, जबकि अन्य को ओमान की खाड़ी और आसपास के जलक्षेत्रों में संभावित खतरों का सामना करना पड़ा है. कई खाड़ी देशों में ऊर्जा कंपनियों और उनके तेल टैंकरों पर भी ड्रोन हमले हुए हैं, जिससे व्यापक तनाव बढ़ने की आशंका है जो पूरे क्षेत्र में तेल उत्पादन और निर्यात को सीधे प्रभावित कर सकता है.
जंग का पहला असर सप्लाई की कमी के रूप में नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक्स (शिप-टैंकर की आवाजाही) पर देखने को मिल रहा है. खाड़ी में प्रवेश करने वाले जहाजों के लिए युद्ध-जोखिम बीमा प्रीमियम बहुत तेजी से बढ़ गए हैं. शिपिंग कंपनियां अब होर्मुज स्ट्रेट से होकर ट्रांसपोर्ट को कम कर रही हैं या अस्थाई रूप से रोक रही हैं. कंपनियां इस रास्ते से जाने के लिए तब तक तैयार नहीं है, जब तक उनके जहाजों के साथ नौसेना की एस्कॉर्ट (Naval Escorts) उपलब्ध न हो या सुरक्षा की स्पष्ट गारंटी न मिल जाए.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, टैंकर सुरक्षित रास्ते की प्रतीक्षा में कॉरिडोर के बाहर कतार में खड़े हैं. भारत, जो अपने रिफाइनरी कंपनियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए कच्चे तेल की नियमित सप्लाई पर निर्भर है, उसके लिए थोड़ी सी भी देरी हालात को जटिल बना सकती है.
होर्मुज स्ट्रेट के आसपास तनाव का असर तेल की कीमतों और ट्रांसपोर्ट लागत पर पड़ना शुरू हो गया है, जबकि अभी तक आपूर्ति में कोई बड़ी बाधा नहीं आई है. टैंकरों और ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमलों के चलते कच्चे तेल की कीमतों में घबराहट भरी प्रतिक्रिया देखने को मिली है.
9 मार्च को क्रूड ऑयल के मानकों पर नजर रखने वालों को उस समय निराशा हुई, जब क्रूड ऑयल की कीमतों में अचानक उछाल आया. दिन के कारोबार में ब्रेंट क्रूड 25-29 फीसद चढ़ गया और कुछ समय के लिए 110-119 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया. यह कीमत बीते चार वर्षों में उच्चतम था. हालांकि, अगले दिन कीमतें तेजी से गिरीं और ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 92-93 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया. ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि स्थिति नियंत्रण में आ रही है. उन्होंने संकेत दिया कि वाशिंगटन वैश्विक तेल आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा को रोकने के लिए काम कर रहा है.
इसका सबसे बड़ा असर माल ढुलाई और बीमा बाजारों पर पड़ रहा है. खाड़ी में प्रवेश करने वाले जहाजों के लिए युद्ध-जोखिम प्रीमियम कई गुना बढ़ गए हैं, कुछ मामलों में तो कच्चे तेल की कुल लागत में 1-2 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि हो गई है. खाड़ी से एशिया तक तेल ले जाने वाले बड़े कच्चे तेल वाहक जहाजों के लिए चार्टर दरें भी तेजी से बढ़ी हैं, क्योंकि जहाज मालिक संघर्ष वाले क्षेत्र में संचालन के लिए अधिक मुआवजे की मांग कर रहे हैं.
भारत हर रोज 50 लाख बैरल से अधिक कच्चे तेल का आयात करता है. ऐसे में कीमतों, माल ढुलाई और बीमा लागत में मामूली वृद्धि भी आयात बिल में काफी बढ़ोत्तरी कर सकती है. पेट्रोलियम मंत्रालय के विश्लेषकों का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर की वृद्धि से भारत का वार्षिक आयात बिल लगभग 15-16 अरब डॉलर बढ़ जाता है.
तेल की कीमतों में 5 डॉलर की वृद्धि से चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 0.1-0.15 फीसद तक बढ़ सकता है. इसके अलावा, परिवहन, उर्वरक और रसद लागत में वृद्धि के कारण उपभोक्ता मुद्रास्फीति में लगभग 20-25 बेसिस पॉइंट की वृद्धि हो सकती है.
केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए राजकोषीय गणना करते समय कच्चे तेल की कीमतों का अनुमान मोटे तौर पर 70-75 डॉलर प्रति बैरल के बीच लगाया था. ऐसे में साफ है कि कच्चे तेल की कीमतों में किसी भी तरह से होने वाली वृद्धि के कारण महंगाई और बजट घाटा संभालने में जटिलताएं उत्पन्न होने का खतरा है.
फिर भी, भारत के ऊर्जा योजनाकारों का तर्क है कि 1970 दशक के खाड़ी संकटों की तुलना में आज देश ऐसी बाधाओं से निपटने के लिए बेहतर स्थिति में है. पिछले कुछ वर्षों में भारत किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए जानबूझकर अपनी कच्चे तेल की स्रोत रणनीति में विविधता लाया है. सबसे बड़ा बदलाव रूस से आयात में वृद्धि है, जो यूक्रेन संघर्ष के बाद से भारत का सबसे बड़ा कच्चे तेल का आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है. हाल के महीनों में रूसी तेल भारत के कच्चे तेल आयात का लगभग 35-40 फीसद रहा है, जो 2022 के बाद भारी वृद्धि को दिखाता है.
इस बदलाव का महत्व केवल तेल खरीदने मात्र में ही नहीं है, बल्कि भौगोलिक दृष्टि से भी इसके अहम मायने हैं. बाल्टिक या आर्कटिक बंदरगाहों के रास्ते भारत पहुंचने वाले रूसी माल होर्मुज जलमार्ग से होकर नहीं गुजरते, जिससे खाड़ी देशों से होने वाली तेल आपूर्ति में व्यवधान के बावजूद भारत की तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा सुरक्षित रहता है.
साथ ही, भारतीय रिफाइनरियों ने संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राजील, मैक्सिको और पश्चिम अफ्रीका के उत्पादकों से तेल की खरीद बढ़ा दी है. ये सभी देश मिलकर अब भारत के कच्चे तेल की कुल मात्रा का लगभग आधा हिस्सा पूरा करते हैं, जिससे खाड़ी देशों से तेल की आपूर्ति धीमी होने पर रिफाइनरियों को आपूर्ति को संतुलित करने की सुविधा मिलती है.
भारत के रिफाइनरी कंपनियों को भी सरकार के इस फैसले से रणनीतिक लाभ है. करीब 25.5 करोड़ टन प्रति वर्ष की क्षमता के साथ, देश में दुनिया की कुछ सबसे जटिल रिफाइनरियां हैं. ये रिफाइनरी कंपनियां हर तरह के क्रूड को संसाधित यानी रिफाइन करने में सक्षम हैं. इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, रिलायंस इंडस्ट्रीज और नायरा एनर्जी जैसी कंपनियां हल्के, मध्यम और भारी कच्चे तेल के मिश्रणों को आसानी से रिफाइन कर सकती हैं. इससे आपूर्ति में दिक्कत आने पर सरकार खरीद रणनीतियों को तुरंत बदल सकती हैं.
नीतिगत स्तर पर भारत ने एक आपातकालीन रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी बनाया है. विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर में स्थित भूमिगत भंडारण सुविधाओं में लगभग 53 लाख टन कच्चे तेल का भंडार है, जो लगभग 9-10 दिनों की राष्ट्रीय खपत के बराबर है. रिफाइनर और तेल विपणन कंपनियों के पास मौजूद वाणिज्यिक भंडारों को मिलाकर, भारत का कुल तेल भंडार लगभग 55-60 दिनों की मांग को पूरा कर सकता है. सरकार दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए चांदीखोल और उडुपी में योजना बनाकर कुछ नए तेल भंडारों का भी विस्तार कर रही है.
खाड़ी संकट के बीच, भारत को अमेरिका से एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण राहत मिली है. ईरान जंग के बीच अमेरिका ने अनौपचारिक रूप से भारतीय रिफाइनरियों को रूस से आने वाले कच्चे तेल के कुछ ऐसे कार्गो हासिल करने की अनुमति दी है, जो पहले से ही लोड किए गए थे या समुद्र में फंसे हुए थे.
इससे भारतीय बंदरगाहों पर बिना किसी तत्काल प्रतिबंध संबंधी समस्याओं के उन्हें उतारा जा सकेगा. यह कदम वैश्विक ऊर्जा बाजारों में एक व्यावहारिक सोच को दर्शाता है. ऐसे समय में जब खाड़ी के शिपिंग कॉरिडोर में अनिश्चितता बनी हुई है, एशियाई बाजारों में अतिरिक्त रूसी तेल को बिकने देने से वैश्विक आपूर्ति में अचानक कमी को रोकने में मदद मिलेगा.
वैश्विक ऊर्जा एजेंसियां भी स्थिति पर बारीकी से नजर रख रही हैं. अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने संकेत दिया है कि अगर संघर्ष के कारण सप्लाई बाधित होती है, तो वह प्रमुख उपभोक्ता देशों को आपातकालीन तेल भंडार से तेल उप्लब्ध कराने की कोशिश करेंगे.
OPEC+ उत्पादक देशों, विशेष रूप से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता होने की संभावना है, जिसे संकट के दौरान वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित नहीं करने के लिए सक्रिय किया जा सकता है. विश्लेषकों का अनुमान है कि OPEC + देशों के पास इस वक्त हर रोज 40-50 लाख बैरल की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता है.
हालांकि, भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र भविष्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है. इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत जैसे देश भारत के दीर्घकालिक कच्चे तेल अनुबंधों का एक बड़ा हिस्सा आपूर्ति करते हैं. हालांकि, इन देशों से आने वाला तेल जामनगर, वडीनार और पारादीप जैसे भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचने से पहले होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है. ऐसे में इस जलमार्ग के लंबे समय तक बंद रहने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा.
फिलहाल, भारत के ऊर्जा क्षेत्र में माहौल चिंताजनक होने के बजाय सतर्कतापूर्ण है. रिफाइनरी कंपनियों का कहना है कि माल ढुलाई लागत और बीमा प्रीमियम में वृद्धि के बावजूद तेल लेकर जहाज बंदरगाहों पर आ रहे हैं. रूस और अटलांटिक बेसिन से वैकल्पिक आपूर्ति खाड़ी संकट के तात्कालिक प्रभाव को कम करने में मदद कर रही है. इस क्षेत्र से जुड़े एक सीनियर अधिकारी का मानना है कि कूटनीतिक दबाव और नौसैनिक तैनाती से स्थिरता बहाल हो जाएगी, इससे पहले कि भारत को अपने रणनीतिक भंडारों का भारी उपयोग करने के लिए मजबूर होना पड़े.

