लोकसभा में 10 फरवरी को जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार पर हमला बोला, तो बहस अचानक 1990 की अयोध्या की ओर मुड़ गई. BJP सांसद अरुण गोविल की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा, “हमारे रामजी कहां हैं? उन्हें सबसे पीछे बैठाया है, आगे नंबर दो पर बैठाना चाहिए.” सत्ता पक्ष से आवाज आई, “कारसेवकों पर गोली चलाने वाले ये बात कर रहे हैं.”
इस पर अखिलेश यादव भड़क गए. उन्होंने कहा, “जिन्होंने गोली चलवाई, वही आज राम मंदिर बनवा रहे हैं. आधी-अधूरी जानकारी लेकर मत आइए.” उनका संकेत था नृपेंद्र मिश्र की ओर, यानी वे आईएएस अधिकारी जो 1990 में मुलायम सिंह यादव के प्रमुख सचिव थे और आज अयोध्या में राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष हैं.
यही विरोधाभास नृपेंद्र मिश्र की सार्वजनिक छवि को जटिल बनाता है. एक ओर वे उस दौर के गवाह रहे जब अयोध्या में गोली चली, दूसरी ओर वे उस मंदिर के निर्माण की निगरानी करने वाले शीर्ष प्रशासक हैं, जिसकी मांग दशकों से की जाती रही. नौकरशाही में लगभग छह दशक बिताने वाले मिश्र का करियर कई राजनीतिक पड़ावों से गुजरा है, लेकिन उनकी पहचान एक ऐसे अफसर की रही है जिसे सत्ता के सबसे ऊपरी स्तर पर भरोसेमंद माना गया. मेरठ जिले में जन्मे नृपेंद्र मिश्र ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से रसायन विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएशन किया और विभाग में टॉपर रहे. सिविल सेवा की पात्रता के इंतजार के दौरान उन्होंने राजनीति विज्ञान में भी मास्टर्स किया. 1967 बैच के आईएएस अधिकारी के रूप में उत्तर प्रदेश कैडर मिला. करियर के बीच में वे हार्वर्ड विश्वविद्यालय गए और लोक प्रशासन में मास्टर डिग्री हासिल की. यह अकादमिक पृष्ठभूमि उनके प्रशासनिक कामकाज में साफ झलकती है, डेटा, संरचना और प्रक्रिया पर जोर.
उत्तर प्रदेश में प्रमुख सचिव (वित्त) के रूप में उन्हें शून्य-आधारित बजटिंग लागू करने, उत्पाद शुल्क और कर ढांचे को पुनर्गठित करने और कोषागार के कंप्यूटरीकरण के लिए जाना जाता है. सहयोगी बताते हैं कि वे फाइलों पर लंबे नोट लिखने के बजाय सीधे निर्णय लेने के लिए मशहूर थे. वाणिज्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहते हुए उन्होंने निर्यात-उन्मुख इकाइयों के प्रस्तावों को तेज गति से निपटाया. प्रशासनिक पदानुक्रम का सम्मान करते हुए भी वे अपने वरिष्ठों के सामने स्पष्ट राय रखने से नहीं हिचकते थे.
अयोध्या से मिश्र का जुड़ाव 1980 के दशक से है. तत्कालीन मुख्यमंत्री और जनता दल नेता मुलायम सिंह यादव के प्रमुख सचिव के रूप में, मिश्र 30 अक्टूबर, 1990 को नियंत्रण कक्ष में बैठे थे, जब एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें मंदिर के पास बड़ी संख्या में लोगों के इकट्ठा होने के बारे में फोन किया. हालांकि, स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई और मुलायम सिंह ने पुलिस को कार सेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया- 30 अक्टूबर को और फिर 2 नवंबर को- उनमें से कुछ की मौत हो गई.
मिश्र कहते रहे हैं कि शुरू में उनकी मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के साथ अच्छी बनती थी, लेकिन उनकी सलाह थी कि मुख्यमंत्री को BJP नेता लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार नहीं करना चाहिए, जो 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचने की योजना के साथ रथयात्रा पर थे. मिश्र का तर्क था कि केंद्र में वीपी सिंह के नेतृत्व वाली जनता दल सरकार समर्थन के लिए BJP पर निर्भर थी और आडवाणी को गिरफ्तार करने से BJP को समर्थन वापस लेना पड़ सकता है. हालांकि बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने 23 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश पहुंचने से लगभग एक सप्ताह पहले, 23 अक्टूबर, 1990 को समस्तीपुर में आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया था.
1991 में जब कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने भी मिश्र को प्रमुख सचिव बनाए रखा. हालांकि BJP और संघ परिवार के कुछ वर्गों में आपत्ति हुई. एक समय उन्हें लेकर तीखी टिप्पणियां भी हुईं. आखिरकार उन्हें लखनऊ से हटाकर ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण भेज दिया गया, वह भी बाबरी मस्जिद ढहने से ठीक पहले. यह दौर बताता है कि मिश्र राजनीतिक बदलावों के बीच भी प्रशासनिक निरंतरता का हिस्सा बने रहे.
केंद्र में नृपेंद्र मिश्र ने उर्वरक सचिव और दूरसंचार सचिव के रूप में काम किया. 2006 में वे भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के अध्यक्ष बने. तीन साल के कार्यकाल के बाद 2009 में उन्होंने सार्वजनिक जीवन में एक अलग भूमिका चुनी और पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन नाम से पहल शुरू की, जिसका उद्देश्य लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करना था. वे अखबारों में लेख लिखते रहे. 2014 में एक लेख में उन्होंने नरेंद्र मोदी का बचाव किया, जिसमें चुनावी हलफनामे को लेकर उठे सवालों का जवाब दिया गया था. यह लेख BJP नेतृत्व की नजर में आया.
मई 2014 में BJP को पूर्ण बहुमत मिला. सत्ता परिवर्तन के बीच अरुण जेटली का फोन नृपेंद्र मिश्र को आया और उन्हें गुजरात भवन बुलाया गया, जहां नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में ठहरे थे. 20 मई को हुई मुलाकात में मोदी ने अपनी प्राथमिकताओं, स्वच्छता, आवास, संस्थागत सुधार, प्रशासनिक पुनर्संरचना पर चर्चा की. कुछ ही दिनों में उन्हें प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव का प्रस्ताव मिला. हालांकि ट्राई अधिनियम के प्रावधानों के कारण कानूनी अड़चन आई, जिसे अध्यादेश के जरिए दूर किया गया. 27 मई 2014 को वे पीएमओ में शामिल हुए.
प्रधान सचिव के रूप में पांच वर्षों में मिश्र ने प्रधानमंत्री कार्यालय को नीतिगत समन्वय का केंद्र बनाने में भूमिका निभाई. उनके करीबी बताते हैं कि वे प्रधानमंत्री की अपेक्षाओं को नौकरशाही तक स्पष्ट तरीके से पहुंचाने में सक्षम थे. विमुद्रीकरण से लेकर जीएसटी तक कई बड़े फैसलों के दौरान वे समन्वयक की भूमिका में रहे. प्रधानमंत्री के मुफ्त योजनाओं को लेकर शुरुआती संकोच के बीच पीएम किसान और उज्ज्वला जैसी योजनाओं को आर्थिक और विकासात्मक तर्कों के साथ प्रस्तुत करने में उन्होंने भूमिका निभाई. उनका तरीका राजनीतिक बहस से अलग प्रशासनिक व्यवहारिकता पर जोर देने का रहा.
साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ. जनवरी 2020 में पीएमओ से हटने के कुछ ही महीनों बाद उन्हें पहले नेहरू मेमोरियल, जिसे अब प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय सोसायटी कहा जाता है, का अध्यक्ष बनाया गया. बाद में प्रधानमंत्री की मंजूरी से उन्हें श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के तहत निर्माण समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. फरवरी 2020 से अयोध्या उनका नियमित ठिकाना बन गया. सर्किट हाउस और निर्माण स्थल के बीच उन्होंने दर्जनों दौरे किए. उनके सामने चुनौती केवल मंदिर बनवाने की नहीं थी, बल्कि उसे हजार साल टिकाऊ बनाने की थी. एलएंडटी जैसे ठेकेदार, टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स जैसे सलाहकार, सी.बी. सोमपुरा जैसे वास्तुकार, डिजाइन एसोसिएट्स जैसे मास्टर प्लानर और केंद्र-राज्य की एजेंसियों के बीच तालमेल साधना आसान नहीं था. परियोजना का पैमाना और प्रतीकात्मक महत्व दोनों बड़े थे. 2024 के आम चुनाव से पहले मंदिर का प्रमुख चरण पूरा करना राजनीतिक रूप से भी अहम माना जा रहा था.
मिश्र निजी तौर पर धार्मिक व्यक्ति हैं और खुद को हनुमान भक्त बताते हैं. लखनऊ स्थित अपने आवास परिसर में उन्होंने वर्षों पहले एक छोटा मंदिर बनवाया था. लेकिन वे यह भी कहते हैं कि धर्म उनका निजी विषय है, प्रशासनिक निर्णयों का आधार नहीं. उनके शब्दों में, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण राष्ट्रीय महत्व का कार्य है जिसे वे देश के प्रति दायित्व की तरह देखते हैं. उनके जीवन का यह अध्याय उन्हें फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में ले आया है. अखिलेश यादव का लोकसभा में बयान इसी विरोधाभास को उजागर करता है, 1990 की गोलीकांड की स्मृति और 2020 के दशक का मंदिर निर्माण. आलोचक कहते हैं कि इतिहास का यह संयोग राजनीतिक है. समर्थक तर्क देते हैं कि एक पेशेवर अफसर का काम परिस्थितियों के अनुरूप जिम्मेदारी निभाना है.
नृपेंद्र मिश्र का करियर दरअसल भारतीय नौकरशाही के उस मॉडल को दिखाता है जिसमें व्यक्ति अलग-अलग राजनीतिक नेतृत्व के साथ काम करता है, लेकिन खुद को प्रशासनिक निरंतरता का हिस्सा मानता है. मुलायम सिंह यादव से लेकर कल्याण सिंह और फिर नरेंद्र मोदी तक, उन्होंने अलग-अलग विचारधाराओं वाली सरकारों में काम किया. हर दौर में उन पर भरोसा किया गया, कभी विवाद भी हुए. आज जब अयोध्या का मंदिर खड़ा है और उसका निर्माण लगभग पूरा हो चुका है, मिश्र का नाम उस परियोजना से स्थायी रूप से जुड़ गया है. लोकसभा में उठी आवाजों के बीच उनका नाम फिर चर्चा में है, एक ऐसे अफसर के रूप में जिसने सत्ता के अलग-अलग दौर देखे और आखिरकार देश की सबसे अहम प्रतीकात्मक परियोजनाओं में से एक की जिम्मेदारी संभाली.

