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फ्रांस बना रहा छठी पीढ़ी का फाइटर जेट, भारत भी बन सकता है प्रोजेक्ट का हिस्सा

फ्रांस की अगुवाई में छठी पीढ़ी के फाइटर जेट विकसित करने के लिए फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है और भारत भी इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने की तैयारी में है

छठी पीढ़ी का यह फाइटर जेट हवा में उड़ते सुपर कंप्यूटर जैसा होगा (फोटो : AI)
अपडेटेड 12 अगस्त , 2026

भारत ने छठी पीढ़ी की सैन्य हवाई शक्ति की दिशा में अब तक का सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाया है. रक्षा मंत्रालय (MoD) ने फ्रांस की अगुवाई वाले फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) में शामिल होने के लिए औपचारिक रूप से प्रयास शुरू कर दिए हैं. पिछले हफ्ते संसद में पेश की गई कार्रवाई रिपोर्ट में इसका जिक्र किया गया है.

यह सिर्फ एक और लड़ाकू विमान खरीदने की योजना नहीं है. यह इस बात की स्पष्ट स्वीकारोक्ति है कि भविष्य में सैन्य विमानों की निर्णायक प्रतिस्पर्धा पांचवीं पीढ़ी के विमानों से कहीं आगे की तकनीकों को लेकर होगी. 

इनमें कॉम्बैट क्लाउड, मानवयुक्त और मानवरहित विमानों की साथ मिलकर काम करने की क्षमता और सिस्टम-ऑफ-सिस्टम्स ढांचा शामिल हैं. आने वाले दशकों में हवाई वर्चस्व इन्हीं तकनीकों से तय होगा.

फ्रांस की अगुवाई वाला FCAS एक ‘सिस्टम ऑफ सिस्टम्स’ यानी अलग-अलग सैन्य प्रणालियों को जोड़कर एक साझा युद्ध प्रणाली बनाने की योजना है. इसके केंद्र में अगली पीढ़ी का लड़ाकू विमान होगा जो मानवरहित रिमोट कैरियर के साथ काम करेगा. 

ये सभी अंतरिक्ष, हवा, जमीन, समुद्र और साइबर क्षेत्र में मौजूद संसाधनों को जोड़ने वाले कॉम्बैट क्लाउड से जुड़े होंगे. इस नेटवर्क आधारित ढांचे का उद्देश्य बेहद चुनौतीपूर्ण युद्ध परिस्थितियों में सूचना पर वर्चस्व, समन्वित कार्रवाई और सुरक्षित बने रहने की क्षमता हासिल करना है.

जर्मनी के परियोजना से बाहर होने के बाद फ्रांस FCAS के लिए साझेदार तलाश रहा है. ऐसे में भारत की दिलचस्पी उस कार्यक्रम को नई गति दे सकती है, जो राजनीतिक और औद्योगिक स्तर पर कई जटिलताओं का सामना कर चुका है. 

भारत अभी पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट AMCA के प्रोटोटाइप पर काम कर रहा है
भारत अभी पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट AMCA के प्रोटोटाइप पर काम कर रहा है

भारत के लिए इसमें भागीदारी भविष्य में हवाई युद्ध में वर्चस्व कायम करने वाली तकनीकों से परिचित होने का अवसर हो सकती है. यह ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया में इस क्षेत्र में तेजी से प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है. 

अमेरिका अपनी अगली पीढ़ी की हवाई वर्चस्व प्रणाली को आगे बढ़ा रहा है जबकि चीन अपनी स्टील्थ तकनीक को तेजी से विकसित कर रहा है. वह पहले ही ऐसे प्रोटोटाइप का परीक्षण कर रहा है जो भविष्य के हवाई युद्ध की झलक देते हैं. 

अमेरिका F-22 की जगह बोइंग F-47 कार्यक्रम पर काम कर रहा है. माना जाता है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी वायुसेना भी छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान विकसित करने की कोशिश कर रही है. पिछले दो वर्षों में ऐसे दो विमान सामने आ चुके हैं. 

विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध का क्षेत्र लगातार ज्यादा भीड़भाड़ वाला और चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है और इसमें अनिश्चितता भी बढ़ रही है.

संसद की रक्षा संबंधी स्थाई समिति पहले ही सरकार को इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए कह चुकी है. समिति ने मौजूदा विमानों की तकनीकी क्षमता बढ़ाने के लिए उनके एडवांसमेंट की योजना बनाने के साथ-साथ छठी पीढ़ी के विमानों के विकास और अधिग्रहण की योजना को भी तेजी से आगे बढ़ाने की बात कही थी. 

कार्रवाई रिपोर्ट में रक्षा मंत्रालय ने कहा कि उसने FCAS कार्यक्रम में ‘सह-भागीदारी’ के लिए समन्वित प्रयास शुरू कर दिए हैं.

समिति ने अब FCAS में भारत की भागीदारी की विस्तृत स्थिति रिपोर्ट और छठी पीढ़ी के विमानों के विकास तथा अधिग्रहण के लिए रोडमैप और संभावित समयसीमा मांगी है. यह मांग एक बड़ी रणनीतिक चिंता को दिखाती है: भारत छठी पीढ़ी की तकनीक के परिपक्व होने तक इंतजार नहीं कर सकता कि वह इसमें किस तरह शामिल होना चाहता है.

इसकी सबसे बड़ी वजह चीन है. भारतीय वायुसेना के पास अभी भी लड़ाकू विमानों की काफी कमी है. उसके पास स्वीकृत 42 स्क्वाड्रन की तुलना में करीब 29 लड़ाकू स्क्वाड्रन हैं. उसके अग्रिम मोर्चे के बेड़े में करीब 250-260 Su-30MKI, 36 राफेल, बढ़ती संख्या में तेजस लड़ाकू विमान और पुराने Mirage 2000, MiG-29 और Jaguar विमान शामिल हैं.

भारतीय वायु सेना के बेड़े में अभी-भी मिराज जैसे पुराने फाइटर जेट शामिल हैं
भारतीय वायु सेना के बेड़े में अभी-भी मिराज जैसे पुराने फाइटर जेट शामिल हैं

पाकिस्तान के खिलाफ भारत को अभी भी स्पष्ट गुणात्मक बढ़त हासिल है. पाकिस्तान के पास करीब 20-25 लड़ाकू स्क्वाड्रन हैं. इनमें JF-17, F-16, J-10C और पुराने Mirage तथा F-7 विमान शामिल हैं. राफेल, Su-30MKI, आधुनिक हथियारों, सेंसर और नेटवर्क आधारित क्षमताओं का मेल भारत को बढ़त देता है.

लेकिन चीन एक बिल्कुल अलग चुनौती पेश करता है. पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की वायुसेना के पास 1,400 से अधिक लड़ाकू विमान हैं. इनमें बड़ी संख्या में आधुनिक 4-प्लस और 4.5 पीढ़ी के विमान शामिल हैं. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमानों का एक बड़ा बेड़ा पहले ही तैनात कर चुका है. 

अनुमान है कि चीन सेना के पास J-20 विमानों की संख्या करीब 500 है. इनका उत्पादन कथित तौर पर हर साल 100 से अधिक विमानों का हो रहा है और अनुमान है कि 2030 तक इनका बेड़ा करीब 1,000 तक पहुंच सकता है.

भारत के पास फिलहाल सर्विस में शामिल पांचवीं पीढ़ी का कोई लड़ाकू विमान नहीं है. यही वजह है कि छठी पीढ़ी के विमानों के सवाल को दूर की तकनीकी महत्वाकांक्षा मानकर नहीं छोड़ा जा सकता. 

जब तक भारत का स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) सेवा में शामिल होगा, तब तक चीन पांचवीं पीढ़ी के विमानों की बड़े पैमाने पर तैनाती से आगे बढ़कर स्वायत्त प्लेटफॉर्म, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), आधुनिक सेंसर और मानवयुक्त-मानवरहित विमानों के साथ मिलकर काम करने जैसी क्षमताओं पर आधारित ज्यादा उन्नत प्रणालियों की ओर बढ़ चुका हो सकता है.

AMCA अब प्रोटोटाइप विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है. पांच उड़ने वाले प्रोटोटाइप बनाने के लिए टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, लार्सन एंड टुब्रो और भारत फोर्ज को शॉर्टलिस्ट किया गया है. 

इंटीग्रेशन और फ्लाइट टेस्ट के लिए बुनियादी ढांचा भी आंध्र प्रदेश में तैयार किया जा रहा है. प्रोटोटाइप का निर्माण 2027 के आसपास शुरू होने की उम्मीद है. इसे 2028 में पेश करने का लक्ष्य है और पहली उड़ान 2028 से 2029 के बीच होने की उम्मीद है. 

चीन पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट J-20 को पहले ही अपने बेड़े में शामिल कर चुका है
चीन पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट J-20 को पहले ही अपने बेड़े में शामिल कर चुका है

अगर कार्यक्रम मोटे तौर पर तय समय के अनुसार आगे बढ़ता है, तो इसे 2030 के दशक के मध्य में वायुसेना में शामिल किया जा सकता है.

AMCA भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है लेकिन यह सफर का अंत नहीं है. असली सवाल यह है कि क्या भारत उन तकनीकों पर काम करना शुरू करता है जो इस विमान के सर्विस में आने से पहले ही उसके बाद की पीढ़ी को आकार देंगी. 

यहीं FCAS रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है. इसमें भागीदारी से भारतीय उद्योग और शोध संस्थानों को अगली पीढ़ी के इंजन, स्टील्थ, सेंसर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, कॉम्बैट नेटवर्किंग और स्वायत्त प्रणालियों की तकनीकों से परिचित होने का अवसर मिल सकता है. 

इससे भारत को अपने पिछले स्वदेशी एयरोस्पेस कार्यक्रमों में सामने आई लंबी विकास प्रक्रियाओं को दोहराने से बचने में भी मदद मिल सकती है.

भारत के लिए लक्ष्य सिर्फ भविष्य का एक लड़ाकू विमान हासिल करने तक सीमित नहीं होना चाहिए. लक्ष्य उस तकनीकी आधार को हासिल करना होना चाहिए जो ऐसा विमान बनाने के लिए जरूरी है. 

छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान F-35 या किसी अन्य पांचवीं पीढ़ी के विमान का सिर्फ ज्यादा तेज या ज्यादा स्टील्थ वाला संस्करण नहीं होगा. यह एक ऐसी व्यापक युद्ध प्रणाली का केंद्र होगा, जिसमें कई अलग-अलग तकनीकें और प्रणालियां एक साथ काम करेंगी.

भविष्य के लड़ाकू विमानों के बड़े, दो इंजन वाले और बेहद सुरक्षित प्लेटफॉर्म होने की उम्मीद है. ये भारी सुरक्षा वाले हवाई क्षेत्र में घुसने और लंबी दूरी तक अभियान चलाने में सक्षम होंगे. 

इनके डिजाइन में बेहतर लो-ऑब्जर्वेबल आकार, रडार तरंगों को सोखने वाला मटेरियल, इंफ्रारेड सिग्नेचर को नियंत्रित करने की तकनीक और विमान के भीतर हथियार रखने की क्षमता शामिल होने की संभावना है.

अगली पीढ़ी के अडैप्टिव-साइकिल इंजन से ज्यादा थ्रस्ट, बेहतर ईंधन दक्षता और काफी अधिक विद्युत शक्ति मिलने की उम्मीद है. यह अतिरिक्त बिजली महत्वपूर्ण होगी क्योंकि भविष्य के विमानों में ज्यादा उन्नत रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, कंप्यूटिंग ढांचा और संभावित रूप से डायरेक्टेड-एनर्जी हथियार लगे होंगे.

छठी पीढ़ी का फाइटर जेट एक उड़ते हुआ सेंसर और कमांड सेंटर की तरह भी काम करेगा
छठी पीढ़ी का फाइटर जेट एक उड़ते हुआ सेंसर और कमांड सेंटर की तरह भी काम करेगा (सांकेतिक तस्वीर)

लंबी दूरी भी महत्वपूर्ण होगी. बाहरी सहायता पर बहुत ज्यादा निर्भर हुए बिना दुश्मन के चुनौतीपूर्ण हवाई क्षेत्र में गहराई तक अभियान चलाने की क्षमता एक निर्णायक बढ़त बन सकती है. 

हालांकि इंजन और स्टील्थ इस बदलाव का सिर्फ एक हिस्सा हैं. छठी पीढ़ी के विमान से एक उड़ते हुए सेंसर और कमांड सेंटर के रूप में काम करने की उम्मीद है.

उन्नत एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (AESA ) रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सेंसर, पैसिव डिटेक्शन सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों को जोड़कर युद्ध क्षेत्र की एक वास्तविक समय की तस्वीर तैयार की जाएगी. 

पायलटों को कई प्रणालियों से मिली जानकारी की खुद व्याख्या करने के बजाय AI खतरे का पता लगाने, लक्ष्यों को प्राथमिकता देने, रास्ते की योजना बनाने और हमले से जुड़े फैसले लेने में तेजी से मदद करेगा.

विमान हवा में मौजूद सुपर कंप्यूटर की तरह काम कर सकता है. AI सिस्टम खतरे की पहचान करने, लक्ष्य तय करने और हमले की पूरी प्रक्रिया में मदद कर सकते हैं. बाहरी कमांड नेटवर्क से संपर्क टूटने पर भी AI जवाब सुझा सकेगा. सॉफ्टवेयर आधारित सिस्टम की मदद से बड़े हार्डवेयर बदलाव के बिना तेजी से नई क्षमताएं जोड़ी जा सकेंगी.

कॉकपिट में भी बड़े बदलाव होने की संभावना है. ऑगमेंटेड रियलिटी हेलमेट डिस्प्ले, आंखों की गतिविधि पर नजर रखने वाली तकनीक, हाथों के इशारों से नियंत्रण और मानव-मशीन संपर्क के दूसरे तरीकों से कई पारंपरिक नियंत्रणों की जगह ली जा सकती है. 

पायलट के बायोमेट्रिक डेटा से लगातार थकान, तनाव, हाइपॉक्सिया और जी-फोर्स के असर पर नजर रखी जा सकती है.

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बदलाव कॉकपिट के बाहर हो सकता है. छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान से दूसरे विमानों की कमान संभालने की उम्मीद है. मानवयुक्त-मानवरहित विमानों के साथ मिलकर काम करने की अवधारणा में एक मानवयुक्त लड़ाकू विमान कई स्वायत्त ‘लॉयल विंगमैन’ या रिमोट कैरियर को नियंत्रित करेगा. 

भारतीय वायुसेना फाइटर जेट की कमी पूरी करने के लिए फिलहाल तेजस MK-1A (ऊपर) और अतिरिक्त राफेल खरीदने पर विचार कर रही है
भारतीय वायुसेना फाइटर जेट की कमी पूरी करने के लिए फिलहाल तेजस MK-1A (ऊपर) और अतिरिक्त राफेल खरीदने पर विचार कर रही है

ये मानवरहित प्रणालियां टोही, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, हमले, भटकाने और दुश्मन की सुरक्षा व्यवस्था को दबाने जैसे मिशन कर सकती हैं.

भारी सुरक्षा वाले इलाके में एक महंगे लड़ाकू विमान को भेजने के बजाय कमांडर मानवयुक्त और मानवरहित प्लेटफॉर्म के नेटवर्क में जोखिम बांट सकते हैं. इससे हवाई युद्ध की अर्थव्यवस्था और रणनीति दोनों बदल जाएंगी. 

मानवयुक्त लड़ाकू विमान फैसले लेने और कमान का केंद्र होगा जबकि ऑटोनॉमस विमान उसकी पहुंच बढ़ाएंगे, उपलब्ध हथियारों की संख्या बढ़ाएंगे और दुश्मन की हवाई रक्षा के लिए चुनौती बढ़ाएंगे.

इसलिए छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को अलग-अलग विमानों के बजाय एक बड़े कॉम्बैट क्लाउड के भीतर हवा में मौजूद नोड के रूप में डिजाइन किया जा रहा है. यह क्लाउड हवा, अंतरिक्ष, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के क्षेत्रों को जोड़ेगा. 

भविष्य के लड़ाकू विमानों को ऐसे हथियारों की जरूरत होगी, जो उनकी ज्यादा दूरी और उन्नत सेंसर का फायदा उठा सकें. इसका मतलब अगली पीढ़ी की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, लंबी दूरी के सटीक हथियार, हाइपरसोनिक प्रणालियां और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरण हैं. हाई पावर इलेक्ट्रिकल ढांचा आगे चलकर युद्धक लेजर जैसी डायरेक्टेड-एनर्जी प्रणालियों को भी सक्षम बना सकता है.

लक्ष्य यह होगा कि दुश्मन के ऐसा करने से पहले ही उसका पता लगाया जाए, फैसला लिया जाए और हमला किया जाए. यह खास तौर पर ऐसे माहौल में महत्वपूर्ण है जहां केवल स्टील्थ से सुरक्षित रहने की गारंटी नहीं रह सकती. 

आधुनिक हवाई रक्षा प्रणालियां लगातार ज्यादा उन्नत हो रही हैं. वहीं पैसिव सेंसर, इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और लंबी दूरी की मिसाइलें उन्नत विमानों के लिए भी हवाई क्षेत्र को ज्यादा खतरनाक बना रही हैं. 

इसलिए भविष्य के लड़ाकू विमान को स्टील्थ के साथ छलावा, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, वितरित सेंसर, स्वायत्त प्रणालियां और लंबी दूरी के हथियारों को जोड़ना होगा.

भारत की तत्काल प्राथमिकता लड़ाकू विमानों की संख्या में कमी को दूर करना और तेजस Mk1A, अतिरिक्त राफेल और अपग्रेडेड Su-30MKI को तेजी से वायुसेना में शामिल करना है. लेकिन ये कदम आज के युद्धक्षेत्र की जरूरतों को पूरा करते हैं. FCAS कल के युद्धक्षेत्र को ध्यान में रखता है.

भारत अतिरिक्त राफेल खरीदने पर विचार कर रहा है. वहीं तेजस कार्यक्रम का विस्तार हो रहा है और AMCA धीरे-धीरे प्रोटोटाइप की दिशा में बढ़ रहा है. देश के लड़ाकू विमान बेड़े को फिर से मजबूत करने के लिए ये कार्यक्रम जरूरी हैं. लेकिन इनमें से कोई भी अकेले इस सवाल का जवाब नहीं देता कि पांचवीं पीढ़ी के बाद क्या होगा.

इसीलिए FCAS में भागीदारी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है, भले ही भारत आखिरकार विमान को उसके मूल स्वरूप में खरीदने का फैसला न करे. असली फायदा तकनीक, औद्योगिक क्षमता और अनुभव हो सकता है. 

अगर भारत भागीदारी का इस्तेमाल अडैप्टिव प्रोपल्शन, स्टील्थ सामग्री, ऑटोनॉमस सिस्ट, AI आधारित युद्ध प्रबंधन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, उन्नत सेंसर और कॉम्बैट क्लाउड ढांचे में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए कर सके तो इससे अपने भविष्य के हवाई युद्ध तंत्र के विकास में तेजी लाई जा सकती है.

इसलिए संसद की रक्षा संबंधी स्थाई समिति की ओर से रोडमैप और समयसीमा की मांग उचित है. भारत को न सिर्फ यह स्पष्टता चाहिए कि वह FCAS में शामिल होगा या नहीं, बल्कि यह भी तय करना होगा कि वह इस भागीदारी से क्या हासिल करना चाहता है और इन तकनीकों को अपने एयरोस्पेस कार्यक्रमों में किस तरह इस्तेमाल करेगा.

AMCA भारत को लंबे समय से प्रतीक्षित पांचवीं पीढ़ी के दौर में प्रवेश दिला सकता है. FCAS यह तय कर सकता है कि देश के पास छठी पीढ़ी में प्रवेश का विश्वसनीय रास्ता होगा या नहीं. उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की भागीदारी से विनिर्माण की मात्रा बढ़ाने और लागत के मामले में प्रतिस्पर्धा बेहतर करने में मदद मिल सकती है. देश की भागीदारी सिर्फ उन्नत लड़ाकू विमान खरीदने तक सीमित नहीं होगी. इससे भारतीय उद्योग और इंजीनियरों को भविष्य के युद्ध की तकनीकों पर काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय एयरोस्पेस नेटवर्क का हिस्सा बनने का मौका मिलेगा.

नई दिल्ली के सामने अब सवाल सिर्फ एक और लड़ाकू विमान खरीदने या बनाने का नहीं है. सवाल यह तय करने का है कि भारत उन्नत हवाई शक्ति का उपभोक्ता बना रहना चाहता है या उन देशों में शामिल होना चाहता है, जो पांचवीं पीढ़ी के बाद हवाई युद्ध का स्वरूप तय करेंगे.

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