17 फरवरी को भारत सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक नोटिफिकेशन जारी किया. इसके मुताबिक, अब 1 अप्रैल से तेल कंपनियां देश के हर प्रदेशों में सिर्फ ब्लेंडेड पेट्रोल ही बेच सकेंगी. सरकार के इस फैसले के बाद लोगों के मन में कई सवाल उठ सकते हैं, मसलन ब्लेंडेड पेट्रोल क्या है?
मोदी सरकार ने देशभर के पेट्रोल पंप पर सिर्फ इसी तेल को बेचने की इजाजत क्यों दी? इससे क्या फायदा है? इन सवालों के जवाब जानने से पहले एक कहानी के जरिए जानते हैं कि ब्लेंडेड पेट्रोल के इस्तेमाल की परंपरा किस देश में कब और कैसे शुरू हुई.
जंग से बदले हालात के चलते दुनिया को ब्लेंडेड पेट्रोल मिला
साल 1973 की बात है. अरब और इजराइल के बीच जंग छिड़ी थी. इजराइल का समर्थन कर रहे अमेरिका और कई अन्य पश्चिमी देशों को सऊदी अरब ने पेट्रोलियम की सप्लाई बंद कर दी. सऊदी के इस फैसले से दुनियाभर के तेल बाजार में असंतुलन पैदा हो गया.
बाकी देशों की तरह इसका असर ब्राजील पर भी पड़ा, लेकिन इस देश के वैज्ञानिकों ने आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है, वाली कहावत को सच साबित कर दिखाया. दरअसल, ब्राजील ने पेट्रोल-डीजल की जगह ईंधन के रूप में ब्लेंडेड और फ्लेक्सी पेट्रोल इस्तेमाल करने का रास्ता खोज निकाला. इसके बाद देश में बड़े पैमाने पर यहां ब्लेंडेड पेट्रोल और प्लेक्सी फ्यूल बनाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किए गए.
1975 में ब्राजील ने तेल के मामले में खुद को आत्मनिर्भर बनाने के लिए नेशनल अल्कोहल प्रोग्राम लॉन्च किया. ब्राजील ने शुरुआत में गन्ने से एथेनॉल बनाने का काम शुरू किया. फिएट, फॉक्सवैगन, जीएम और फोर्ड जैसी कंपनियों ने एथेनॉल से चलने वाली गाड़ियां बनानी शुरू कर दीं. देखते ही देखते ब्राजील तेल के मामले में पूरी तरह से आत्मनिर्भर देश हो गया.
वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड स्टडी के मुताबिक 2030 तक अनुमान है कि ब्राजील में कुल तेल की डिमांड का 72 फीसद हिस्सा बायोफ्यूल होगा. इसका मतलब ये हुआ कि 72 फीसद हिस्सा ब्लेंडेड फ्यूल या फ्लेक्सी फ्यूल होगा. अब ब्राजील को देखकर ही भारत समेत बाकी देश बायोफ्यूल के इस्तेमाल की ओर बढ़ रहे हैं. भारत सरकार का ब्लेंडेड पेट्रोल इस्तेमाल का फैसला भी कुछ इसी तरह के प्रयासों से प्रभावित हैं.
क्या होता है ब्लेंडेड पेट्रोल या फ्लेक्सी फ्यूल?
ब्लेंडेड पेट्रोल या फ्लेक्सी फ्यूल को बायोफ्यूल भी कहते हैं. इसकी खासियत यह है कि यह तेल के कुओं से नहीं, बल्कि किसानों के खेतों से आता है. अमेरिकी एनर्जी डिपार्टमेंट के मुताबिक, ब्लेंडेड पेट्रोल और फ्लेक्सी फ्यूल एक ही चीज नहीं हैं. हालांकि, दोनों में पेट्रोलियम के साथ इथेनॉल मिलाया जाता है. दोनों में मुख्य अंतर इसमें मिलाए जाने वाले एथेनॉल की मात्रा को लेकर है.
ब्लेंडेड पेट्रोल (Blending): इसमें कम मात्रा में एथेनॉल यानी 10 से 20 फीसद तक ही मिलाया जाता है, जो सामान्य गाड़ियों में इस्तेमाल हो सकता है.
फ्लेक्सी फ्यूल (Flex Fuel): इसमें एथेनॉल की मात्रा 20 से 85 फीसद तक होती है, जिसके लिए गाड़ियों में विशेष इंजन की आवश्यकता होती है.
भारत सरकार ने अभी तेल कंपनियों के लिए क्या निर्देश दिए हैं?
PTI के मुताबिक, 1 अप्रैल, 2026 से तेल कंपनियों को पेट्रोल में 20 फीसद तक एथेनॉल मिलाकर (E20 तेल) बेचना होगा और साथ ही तेल की तय गुणवत्ता मानकों को पूरा करना होगा. भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के मुताबिक, इन तेलों का न्यूनतम रिसर्च ऑक्टेन नंबर (RON95) होना चाहिए.
तेल में RON95 का मतलब उच्च गुणवत्ता वाले पेट्रोल से है, जो इंजन को बेहतर सुरक्षा और परफॉर्मेंस देता है. RON असल में पेट्रोल की क्वालिटी और उसकी ताकत नापने का एक पैमाना या 'स्कोर' है. जब गाड़ी के इंजन में पेट्रोल जलता है, तो कई बार दबाव के कारण वह स्पार्क प्लग के चिंगारी देने से पहले ही सुलग जाता है. इससे इंजन के अंदर एक तरह की खटपट या अजीब सी आवाज़ आने लगती है, जिसे तकनीकी भाषा में 'नॉकिंग' कहते हैं.
अब सवाल यह है कि 95 RON ही क्यों जरूरी है?
अगर पेट्रोल का RON कम है, तो इंजन में नॉकिंग ज्यादा होगी, जिससे गाड़ी का माइलेज गिरेगा और इंजन जल्दी खराब होगा. इसके उलट, RON जितना ज्यादा होगा, पेट्रोल उतना ही दबाव सह पाएगा और सही समय पर जलेगा. यानी आपकी गाड़ी का इंजन एकदम स्मूथ चलेगा, आवाज कम करेगा और उसकी लाइफ भी बढ़ेगी.
अब सवाल यह है कि 95 RON ही क्यों जरूरी है? दरअसल, अभी हम जो नॉर्मल पेट्रोल डलवाते हैं, उसका RON 91 के आस-पास होता है. प्रीमियम पेट्रोल का RON 95 या उससे ज्यादा होता है. अब सरकार पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिला रही है. इथेनॉल की खूबी यह है कि वह पेट्रोल का ऑक्टेन नंबर नैचुरली बढ़ा देता है. 95 RON वाले इस नए E20 पेट्रोल से न सिर्फ आपकी गाड़ी की परफॉर्मेंस और पिकअप बेहतर होगा, बल्कि धुआं भी कम निकलेगा.
तेल में मिलाया जाने वाला एथेनॉल क्या होता है?
एथेनॉल इको-फ्रैंडली फ्यूल है. एथेनॉल एक तरह का अल्कोहल है, जिसे पेट्रोल में मिलाकर गाड़ियों में फ्यूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है. एथेनॉल का उत्पादन गन्ने या दूसरे सड़े अनाजों से होता है. एथेनॉल ब्लेंडिंग वाले पेट्रोल से आम आदमी को भी बड़ा फायदा होगा. ये मुख्य रूप से तीन तरह के होते हैं…
1G एथेनॉल: फर्स्ट जनरेशन एथेनॉल गन्ने के रस, मीठे चुकंदर, सड़े आलू, मीठा ज्वार और मक्का से बनाया जाता है.
2G एथेनॉल: सेकेंड जनरेशन एथेनॉल सेल्युलोज और लिग्नोसेल्यूलोसिक मटेरियल जैसे - चावल की भूसी, गेहूं की भूसी, कॉर्नकॉब (भुट्टा), बांस और वुडी बायोमास से बनाया जाता है.
3G बायोफ्यूल: थर्ड जनरेशन बायोफ्यूल को एलगी से बनाया जाएगा. अभी इस पर काम चल रहा है.
एथेनॉल मिलाने से क्या फायदा है?
पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से पेट्रोल के उपयोग से होने वाले प्रदूषण को कम करने में मदद मिलेगी. इसके इस्तेमाल से गाड़ियां 35 फीसद कम कार्बन मोनोऑक्साइड का उत्सर्जन करती हैं. सल्फर डाइऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन का उत्सर्जन भी इथेनॉल कम करता है. इथेनॉल में मौजूद 35 फीसदी ऑक्सीजन के चलते यह फ्यूल नाइट्रोजन ऑक्साइड के उत्सर्जन को भी कम करता है.
इसके अलावा एनर्जी एक्सपर्ट नरेंद्र तनेजा का कहना है कि E20 योजना के तहत पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से प्रति लीटर तक 3.50 रुपए तक कीमत कम होने की संभावना होती है. हालांकि, यह सब कुछ तेल कंपनियों पर निर्भर करता है. दरअसल, एथेनॉल की कीमत पेट्रोलियम पदार्थों से कम होती है. ऐसे में जब एक लीटर में 20 फीसद एथेनॉल मिलाया जाएगा तो कीमत कम होना स्वाभाविक है. एथेनॉल पर पेट्रोलियम पदार्थों की तुलना में कम टैक्स लगते हैं. इसके कारण भी E20 तेल की कीमत कम होती है.

