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E20 पर विवाद के बीच E85 और E100 को मंजूरी क्यों?

E85 और E100 जैसे फ्यूल मिश्रणों की ओर बढ़ने के पीछे आर्थिक और पर्यावरणीय, दोनों वजहें हैं

E100 Flex Fuel Ethanol Petrol
सरकार ने E85 और E100 फ्यूल वाली गाड़ियों को मंजूरी दे दी है. Photo: ITG
अपडेटेड 28 अक्टूबर , 2026

भारत में अब ऐसे वाहनों को भी मंजूरी देने का रास्ता खुल गया है जो लगभग पूरी तरह एथेनॉल से चलेंगे. इससे पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के कार्यक्रम को एक कदम और आगे बढ़ाया गया है. हालांकि मौजूदा वाहनों में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिले पेट्रोल (E20) के इस्तेमाल को लेकर सरकार से अब भी सवाल पूछे जा रहे हैं.

नितिन गडकरी की अगुवाई वाले सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने 26 अक्टूबर को केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 में संशोधन की अधिसूचना जारी की. इससे फ्लेक्स-फ्यूल वाहन पेश करने का रास्ता खुल गया है. 

ये वाहन E85 (80 प्रतिशत एथेनॉल वाला फ्यूल) और E100 (मुख्य रूप से एथेनॉल से बना फ्यूल) पर चलने के लिए तैयार किए जाएंगे. संशोधनों के तहत E100 को भी E85 के साथ इमीशन सर्टिफिकेशन के दायरे में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है. इससे व्हीकल कंपनियां ऐसे वाहन पेश कर सकेंगे जो फ्यूल में एथेनॉल की अधिक मात्रा के साथ चलने में सक्षम होंगे.

अप्रैल से एथेनॉल मिश्रण का मुद्दा लगातार विवाद का विषय बना हुआ है. इस बहस में वाहन चालक, व्हीकल कंपनियां, विपक्षी नेता और अदालतें भी शामिल हो गए हैं. फ्यूल की खपत, इंजन के साथ उसकी अनुकूलता, उपभोक्ताओं के पास विकल्प और एथेनॉल उत्पादन से जुड़े आर्थिक हितों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं. 

इसके चलते सरकार को उस कार्यक्रम का बचाव करना पड़ा है जिसे वह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम मानती है. इस संदर्भ में सरकार का संदेश यही दिखता है कि वह इस कार्यक्रम को और मजबूती से आगे बढ़ा रही है.

ताजा अधिसूचना में एक अहम अंतर भी स्पष्ट किया गया है. E85 और E100 का इस्तेमाल केवल उन्हीं वाहनों में किया जाना है जिन्हें इन ईंधनों के लिए तैयार किया गया है और प्रमाणित किया गया है. मौजूदा पेट्रोल वाहनों को न तो इन ईंधनों पर चलाना अनिवार्य होगा और न ही उनमें कोई बदलाव करना पड़ेगा.

इस बहस का बड़ा हिस्सा E20 फ्यूल को लेकर रहा है. सरकार जहां तेल आयात कम करने और कृषि क्षेत्र को लाभ पहुंचाने के लिए पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने को बढ़ावा दे रही है, वहीं वाहन चालक यह जानना चाहते हैं कि कम एथेनॉल वाले फ्यूल पर चलने के लिए बनाए गए वाहनों पर इसका क्या असर पड़ेगा.

पुरानी कारों में माइलेज घटने और इंजन को संभावित नुकसान पहुंचने की शिकायतों ने इस विवाद को और बढ़ाया है. कम एथेनॉल वाले फ्यूल का विकल्प आसानी से उपलब्ध न होने से आलोचना और तेज हुई है. अब उपभोक्ता यह सवाल भी उठा रहे हैं कि उनके पास अपने वाहनों के लिए फ्यूल चुनने का कोई विकल्प है भी या नहीं.

राजनीति भी इस विवाद का हिस्सा बन गई है. विपक्षी नेताओं ने इस बदलाव को लागू करने के सरकार के तरीके पर सवाल उठाए हैं. वहीं फ्यूल के साथ वाहनों की अनुकूलता और उपभोक्ताओं के हितों से जुड़े मामले अदालतों तक पहुंच गए हैं. केंद्र सरकार बार-बार स्पष्टीकरण देती रही है कि एथेनॉल मिश्रण को तकनीकी परीक्षणों का समर्थन हासिल है और E20 से बड़े पैमाने पर इंजन को नुकसान पहुंचने का कोई प्रमाणित सबूत नहीं है.

सरकार ने माना है कि मूल रूप से E10 के लिए बनाए गए कुछ वाहनों में E20 के इस्तेमाल से फ्यूल दक्षता घट सकती है. हालांकि उसका कहना है कि इसका असर मामूली है. सरकार के मुताबिक एथेनॉल की ऑक्टेन रेटिंग अधिक होती है जिससे वाहन का परफॉर्मेंस बेहतर हो सकता है और इमीशन सुधरता है.

आलोचनाओं के बीच सरकार को वाहन निर्माता कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों को भी सामने लाना पड़ा है. इन अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से भरोसा दिलाया है कि उनके नए वाहन E20 के अनुकूल हैं. केंद्र ने कम एथेनॉल वाले पेट्रोल को विकल्प के रूप में दोबारा उपलब्ध कराने की मांग का भी विरोध किया है. 

उसका तर्क है कि देशभर के विशाल पेट्रोल पंप नेटवर्क पर अलग-अलग मात्रा में एथेनॉल मिले पेट्रोल की समानांतर आपूर्ति बनाए रखने से लॉजिस्टिक्स संबंधी दिक्कतें और अतिरिक्त लागत बढ़ेगी. इससे E20 को लागू करने का मूल उद्देश्य भी विफल हो जाएगा.

यह असहमति केवल वाहनों के इंजन तक सीमित नहीं है. एथेनॉल उत्पादन की अर्थव्यवस्था, खाद्यान्न का इस्तेमाल फ्यूल बनाने में करने और इससे डिस्टिलरी (शराब या एथेनॉल बनाने वाले संयंत्रों) तथा कृषि उत्पादकों को होने वाले लाभ पर भी सवाल उठे हैं. सरकार का कहना है कि खाद्य सुरक्षा से समझौता किए बिना एथेनॉल उत्पादन से किसानों और ग्रामीण इलाकों की आय को बढ़ावा मिलता है.

इस मामले में आर्थिक हित भी काफी बड़े हैं. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2014-15 से एथेनॉल मिश्रण के कारण कच्चे तेल का आयात कम होने से भारत को विदेशी मुद्रा में 1.97 लाख करोड़ रुपए से अधिक की बचत हुई है. 

इस कदम से करीब 3.16 करोड़ टन कच्चे तेल का विकल्प तैयार हुआ है और किसानों को 1.66 लाख करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान किया गया है. भारत ने एथेनॉल मिश्रण का 20 प्रतिशत लक्ष्य तय समयसीमा से पांच साल पहले ही हासिल कर लिया था.

हालांकि E85 और E100 की दिशा में उठाया गया ताजा कदम इस बदलाव का एक अलग चरण है. E20 के तहत मौजूदा पेट्रोल वाहनों में अधिक एथेनॉल मिला फ्यूल उपलब्ध कराया जाता है. इसका इस्तेमाल संबंधित वाहन की अनुकूलता पर निर्भर करता है. दूसरी ओर E85 और E100 के लिए ऐसे वाहनों की जरूरत होती है जिन्हें फ्यूल में एथेनॉल की काफी अधिक मात्रा के अनुकूल बनाया गया हो.

फ्लेक्स-फ्यूल वाहन अपने डिजाइन और प्रमाणन के आधार पर पेट्रोल और एथेनॉल के अलग-अलग अनुपात वाले फ्यूल पर चल सकते हैं. इसके लिए व्हीकल में मैकेनिकल बदलाव करने की जरूरत नहीं होती. 

इनके फ्यूल सिस्टम में ऐसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है जो एथेनॉल की अधिक मात्रा के अनुकूल होती है. वहीं एडवांस्ड इंजन मैनेजमेंट सिस्टम फ्यूल कंपोजिशन के हिसाब से एडजस्ट हो जाता है. इससे एक ही व्हीकल की टंकी में अलग-अलग स्वीकृत मिश्रण वाला फ्यूल इस्तेमाल किया जा सकता है.

ब्राजील और अमेरिका जैसे देशों में यह तकनीक पहले से इस्तेमाल में है. भारत में सरकार को उम्मीद है कि इसके आने से विशेष वाहन कलपुर्जों का घरेलू उत्पादन बढ़ेगा. साथ ही एथेनॉल उत्पादन के बुनियादी ढांचे और इससे जुड़ी सेवाओं को भी बढ़ावा मिलेगा.

इस योजना के पीछे पर्यावरण संबंधी तर्क भी है. एथेनॉल की अधिक मात्रा वाले फ्यूल से कार्बन मोनोऑक्साइड और कुछ हाइड्रोकार्बन जैसे प्रदूषकों को कम किया जा सकता है. हालांकि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कुल कितनी कमी आएगी, यह एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल और उत्पादन प्रक्रिया पर निर्भर करता है. 

सरकार ने एथेनॉल के इस्तेमाल का विस्तार करने की योजना को कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने, घरेलू स्तर पर फ्यूल उत्पादन को बढ़ावा देने और 2070 तक नेट जीरो इमीशन का लक्ष्य हासिल करने से जोड़ा है.

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