28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रोटेस्ट और संसद मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "छात्रों का यह विरोध प्रदर्शन शुरू में शांतिपूर्ण था. इस तरह के विरोध प्रदर्शनों को संविधान का संरक्षण प्राप्त है."
कोर्ट ने बताया कि ऐसे मामलों में आमतौर पर दो तरह की स्थितियां सामने आती हैं. पहली, कुछ लोग विरोध प्रदर्शन को बाधित करने के लिए उसमें शामिल होकर हिंसा फैलाते हैं. दूसरी, घायल पुलिसकर्मियों की ओर से भी याचिकाएं दायर की जाती हैं. ऐसे में सवाल है कि पूरे मामले की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं कराई जानी चाहिए?
इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने की. कोर्ट ने केंद्र सरकार के साथ-साथ असम, बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और केरल सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.
SIT गठन का संकेत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि छात्र प्रदर्शनों के दौरान छात्रों और पुलिसकर्मियों को लगी चोटों से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच आवश्यक है. सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि जांच के लिए एक पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया जा सकता है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि इन सभी आरोपों की जांच किसी समिति, आयोग या SIT द्वारा की जाएगी. जांच सबूतों के आधार पर और पूरी निष्पक्षता के साथ होनी चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि दूसरी ओर से यह दावा किया जा रहा है कि पत्थरों से भरा ट्रक किसी और ने वहां लाकर खड़ा किया था.
सीजेआइ ने बताया कि याचिकाओं में पैलेट गन, इलेक्ट्रिक बैटन, लाठीचार्ज, आंसू गैस, महिलाओं और पत्रकारों के साथ मारपीट जैसे गंभीर आरोप हैं. इनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होगी. उन्होंने कहा, "लोकतंत्र में प्रदर्शन होते रहते हैं. अगर जिम्मेदारी तय नहीं होगी तो जांच का कोई मतलब नहीं रहेगा."
दिल्ली समेत सभी राज्यों में छात्रों की रिहाई का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान अंतरिम निर्देश जारी करते हुए कहा कि जिन छात्रों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उन्हें रिहा किया जाए. साथ ही, विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने के आरोप में गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए लोगों को भी तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया.
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि यह मामला केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है बल्कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के नागपुर और बिहार से भी जुड़ा है. इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि चूंकि मामला कई राज्यों से संबंधित है इसलिए सभी याचिकाओं को दिल्ली हाईकोर्ट भेजने के बजाए सुप्रीम कोर्ट में एक साथ सुना जा रहा है.
छात्र आंदोलन पर सरकार का पक्ष
सरकार की ओर से पक्ष रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि छात्रों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है लेकिन कानून तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. उन्होंने बताया कि इस दौरान करीब 250 पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं. तुषार मेहता की दलील सुनने के बाद कोर्ट ने कहा, "इन सभी आरोपों की जांच होगी. साथ ही यह भी देखा जाएगा कि पुलिस पर हमला छात्रों ने किया था या आंदोलन में घुसे असामाजिक तत्वों ने."
इसके अलावा, कोर्ट ने सभी राज्यों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि छात्र प्रदर्शनकारियों की व्यक्तिगत जानकारी और डिजिटल डेटा, वीडियो फुटेज सुरक्षित रखे जाएं. फिलहाल इस डेटा को सार्वजनिक न किया जाए. साथ ही, प्रदर्शनकारियों की व्यक्तिगत जानकारी या अन्य विवरण भी प्रकाशित नहीं किए जाने चाहिए.
छात्रों की ओर से पेश हो रहे वकील ने क्या कहा?
याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि यह मामला केवल दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई से संबंधित नहीं है बल्कि पूरे देश में हुई कार्रवाई से संबंधित है. शंकरनारायणन ने कहा कि जंतर-मंतर क्षेत्र में धारा 144 CrPc/163 BNSS के तहत कोई कानूनी आदेश जारी नहीं किए गए थे.
उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी इस तरह के मामलो में भीड़ को तितर-बितर करने के दिशानिर्देश जारी किए हैं. इस दिशानिर्देश और पुलिस मैन्युअल के मुताबिक, पुलिस को पहले लाउडस्पीकर से लोगों को चेतावनी देनी चाहिए फिर वाटर कैनन का इस्तेमाल होना चाहिए.
इन तरीके से अगर प्रदर्शनकारी कंट्रोल में नहीं आते तो लाठी चार्ज और फिर आंसू गैस का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. उन्होंने दावा किया कि बिना नेम प्लेट और बिना वर्दी वाले पुलिसकर्मी हिंसा कर रहे थे और इनकी ज्यादतियों के अनगिनत वीडियो मौजूद हैं.

