गाजियाबाद में 3 फरवरी की देर रात तीन नाबालिग बहनों की मौत की खबर सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं थी. यह उस चुप संकट की ओर इशारा थी, जो पिछले कुछ वर्षों से बच्चों और किशोरों के भीतर पनप रहा है. शुरुआती जांच में सामने आई डायरी और हाथ से लिखी चिट्ठी ने संकेत दिया कि ये बहनें लंबे समय से हॉरर-सर्वाइवल मोबाइल गेम्स, उनसे जुड़े यूट्यूब कंटेंट और विदेशी डिजिटल कल्चर में गहराई तक डूबी हुई थीं.
जांच से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, डायरी के पन्नों में गेम्स के नाम, टास्क जैसे नोट्स और आपस में साझा किए गए संकेत मिलते हैं. यह सिर्फ खेल नहीं था, बल्कि उनकी साझा दुनिया थी. क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट इसे एक ऐसे पैटर्न के तौर पर देखते हैं, जहां बच्चा धीरे-धीरे असली दुनिया से कटने लगता है और आभासी दुनिया उसकी पहचान, दोस्ती और भावनात्मक सहारा बन जाती है.
बहनों के पिता चेतन कुमार कहते हैं, “हमें लगा था कि बच्चे खेल रहे हैं, जैसे आजकल सब खेलते हैं. उन्होंने पढ़ाई छोड़ी नहीं थी, घर में भी सब सामान्य ही लगता था. हमें अंदाजा नहीं था कि ये गेम्स उनके दिमाग पर इतना गहरा असर डाल रहे हैं.” चेतन के मुताबिक लड़कियां पिछले दो से तीन साल से टास्क-बेस्ड गेम्स खेल रही थीं और कोरियन कल्चर की तरफ उनका झुकाव बढ़ता जा रहा था. वे एक-दूसरे को कोरियन नामों से बुलाती थीं. हमें यह बच्चों की मासूम पसंद लगती थी.
गेम्स जो डर और ‘ज़िंदा रहने’ को रोमांच बनाते हैं
डायरी में जिन चार गेम्स का जिक्र है, वे सभी हॉरर या पज़ल-सर्वाइवल जॉनर के हैं. पॉपी प्लेटाइम, द बेबी इन येलो, एविल नन और आइस स्क्रीम जैसे गेम्स खिलाड़ियों को डरावने, बंद माहौल में रखते हैं, जहां लगातार खतरे का एहसास बना रहता है. क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट बताते हैं कि ऐसे गेम्स में डर को चुनौती और रोमांच के रूप में पेश किया जाता है. खिलाड़ी हर समय “बचने”, “भागने” और “छिपने” की स्थिति में रहता है. लंबे समय तक इस तरह के कंटेंट में डूबे रहने से बच्चे का तनाव स्तर बढ़ सकता है, खासकर तब जब उसकी उम्र कम हो और भावनात्मक परिपक्वता विकसित न हुई हो.
सिर्फ गेम खेलना ही नहीं, ये बहनें यूट्यूब पर उन्हीं गेम्स की लाइव स्ट्रीमिंग भी देखती थीं. ऐसे वीडियो अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर डर, सस्पेंस और प्रतिक्रिया दिखाते हैं. लखनऊ के वरिष्ठ साइकोथेरेपिस्ट डॉ. देवाशीष शुक्ल कहते हैं, “लाइव स्ट्रीमिंग कंटेंट बच्चों को यह एहसास देता है कि डर भी एक तरह का एंटरटेनमेंट है. लगातार ऐसा कंटेंट देखने से संवेदनशीलता कम हो सकती है और बच्चा असली और आभासी अनुभव के फर्क को समझने में कमजोर पड़ जाता है.”
क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट पुलकित शर्मा साफ शब्दों में कहते हैं, “हिंसक या हॉरर गेम्स और आत्महत्या के बीच सीधा संबंध स्थापित करना सही नहीं है. लेकिन जब बच्चा लगातार ऐसी दुनिया में जी रहा हो, तो इसे खतरे के संकेत के तौर पर जरूर देखा जाना चाहिए.” उनके मुताबिक, समस्या तब गंभीर होती है जब गेमिंग बच्चे के जीवन का केंद्रीय हिस्सा बन जाती है और पढ़ाई, परिवार, दोस्ती और नींद पीछे छूटने लगती है.
गाजियाबाद से पहले लखनऊ के मोहनलालगंज में सामने आया मामला भी कुछ ऐसा ही संकेत देता है. सितंबर 2024 में एक 13 साल का बच्चा ऑनलाइन गेमिंग की लत में फंस गया. पिता के मोबाइल से बड़ी रकम ऑनलाइन गेमिंग में खर्च हो गई. जब पैसे कम होने का पता चला और मामला सामने आया, तो बच्चा गहरे दबाव में आ गया. पुलिस और डॉक्टरों के मुताबिक, यह मामला दिखाता है कि कैसे आर्थिक नुकसान, डर और अपराधबोध बच्चों के मानसिक संतुलन को तोड़ सकता है. यह भी सामने आया कि बच्चा लंबे समय से मोबाइल पर घंटों गेम खेल रहा था.
तेजी से बढ़ते मामले और बदलता पैटर्न
गाजियाबाद, नोएडा और लखनऊ जैसे शहरी इलाकों में अस्पतालों की ओपीडी में ऐसे मामले तेजी से बढ़े हैं. नोएडा जिला अस्पताल से जुड़े मनोचिकित्सक डॉ. साकेतनाथ तिवारी बताते हैं, “कोविड से पहले महीने में तीन-चार केस आते थे. अब हर महीने 15 से 20 बच्चे ऑनलाइन गेमिंग, बेटिंग ऐप्स या विदेशी डिजिटल कल्चर की लत के साथ आ रहे हैं.” उनके मुताबिक, बच्चों का स्क्रीन टाइम अचानक बढ़ा है. “पहले बच्चा स्कूल, खेल और दोस्तों में बंटा रहता था. अब सब कुछ स्क्रीन पर सिमट गया है,” वे यह भी कहते हैं. कोरियन वेब सीरीज, म्यूजिक और गेम्स का असर बच्चों के व्यवहार में साफ दिख रहा है. डॉ. देवाशीष शुक्ल बताते हैं, “कुछ बच्चे इस कल्चर में इतने डूब जाते हैं कि उनकी भाषा, पहनावा और सोच बदलने लगती है. कई कॉलेज स्टूडेंट्स भी इसमें फंसे हैं. वे पूरा दिन कोरियन ड्रामा या नॉवेल में बिताते हैं और चाहकर भी इससे बाहर नहीं निकल पा रहे.” उनके मुताबिक, कई ड्रामों में भावनात्मक उतार-चढ़ाव बहुत ज्यादा होता है, जो संवेदनशील बच्चों में उदासी और अवसाद को बढ़ा सकता है.
केजीएमयू के साइकियाट्री विभाग के डॉ. पवन कुमार गुप्ता कहते हैं, “अधिकतर मामलों में या तो माता-पिता बहुत सख्त होते हैं या बिल्कुल लापरवाह. दोनों ही स्थितियों में बच्चा अपनी बात साझा नहीं कर पाता.” उनके मुताबिक आज के हालात में पैरेंटल साइको-एजुकेशन जरूरी है. अभिभावकों को समझना होगा कि बच्चों के व्यवहार में बदलाव क्यों आ रहा है. सिर्फ मोबाइल छीन लेना समाधान नहीं है. कई अभिभावक भी मानते हैं कि उन्हें डिजिटल दुनिया की गंभीरता का अंदाजा देर से हुआ. गाजियाबाद के एक अभिभावक कहते हैं, “हमें लगा था कि बच्चा घर में है, सुरक्षित है. अब समझ आता है कि खतरे घर के भीतर भी हो सकते हैं.”
विशेषज्ञ कुछ सामान्य संकेतों की ओर ध्यान दिलाते हैं, जिन्हें समय रहते पहचान लिया जाए तो हालात संभाले जा सकते हैं. मोबाइल या लैपटॉप पर जरूरत से ज्यादा समय बिताना, पढ़ाई में रुचि कम होना, ग्रेड गिरना, रोकने पर गुस्सा आना, दोस्तों और परिवार से दूरी बनाना, देर रात तक जागना और नींद पूरी न होना. केजीएमयू की मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. श्वेता सिंह कहती हैं, “इन लक्षणों को नजरअंदाज करना सबसे बड़ी गलती होती है.”
सरकारी पहल और सीमाएं
ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल एडिक्शन से जुड़े बढ़ते मामलों के बीच स्वास्थ्य मंत्रालय ने पिछले दो वर्षों में कई स्तरों पर दखल की कोशिश की है. केंद्र और राज्य सरकार का फोकस इस समस्या को मानसिक स्वास्थ्य के दायरे में लाकर इलाज और काउंसलिंग के जरिए संभालने पर रहा है. लेकिन विशेषज्ञों और जमीनी मामलों का कहना है कि पहल और प्रभाव के बीच अभी भी बड़ा अंतर है.
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार ने टेली मानस (Tele-MANAS) हेल्पलाइन शुरू की. यूपी में इसे स्वास्थ्य विभाग और जिला सर्विलांस यूनिट के जरिए लागू किया गया. 14416 नंबर पर कॉल कर बच्चे, अभिभावक या कोई भी व्यक्ति मानसिक तनाव, अवसाद, चिंता और डिजिटल एडिक्शन से जुड़ी समस्याओं पर काउंसलिंग ले सकता है. गाजियाबाद के जिला सर्विलांस अधिकारी डॉ. आर. के. गुप्ता बताते हैं, “टेली मानस के जरिए हर महीने बड़ी संख्या में कॉल आ रही हैं. कोविड के बाद बच्चों और किशोरों में स्क्रीन एडिक्शन, गेमिंग और नींद की समस्या सबसे आम शिकायत बन गई है. फोन पर शुरुआती काउंसलिंग दी जाती है और जरूरत पड़ने पर नजदीकी अस्पताल या विशेषज्ञ के पास रेफर किया जाता है.” स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग मिलकर स्कूल हेल्थ प्रोग्राम चलाते हैं, जिसमें बच्चों की शारीरिक और मानसिक सेहत पर ध्यान देने की बात कही जाती है.
लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर सरकारी और निजी स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य अब भी प्राथमिकता नहीं बन पाया है. डॉ. पवन कुमार गुप्ता कहते हैं, “स्कूलों में काउंसलर या तो हैं ही नहीं, या फिर नाम मात्र के हैं. ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल एडिक्शन को अब भी अनुशासन की समस्या समझा जाता है, मानसिक स्वास्थ्य की नहीं.” विशेषज्ञ मानते हैं कि मौजूदा सरकारी पहल जरूरी हैं, लेकिन अपर्याप्त हैं.
मुख्य सीमाएं ये हैं, रिएक्टिव अप्रोच यानी ज्यादातर हस्तक्षेप तब होते हैं जब समस्या गंभीर हो चुकी होती है. जिला स्तर पर चाइल्ड साइकियाट्रिस्ट और साइकोलॉजिस्ट की भारी कमी है. स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग के बीच तालमेल कागजों तक सीमित, इसके अलावा उम्र सीमा, इन-ऐप खरीदारी और कंटेंट वॉर्निंग पर सख्ती नहीं है. डॉ. श्वेता सिंह कहती हैं, “हेल्पलाइन जरूरी है, लेकिन वह आखिरी कदम होना चाहिए. पहला कदम घर और स्कूल होना चाहिए.” स्वास्थ्य विभाग से जुड़े अधिकारी भी मानते हैं कि अब रणनीति बदलने की जरूरत है. विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि स्कूल स्तर पर नियमित मेंटल हेल्थ स्क्रीनिंग, अभिभावकों के लिए डिजिटल लिटरेसी प्रोग्राम और बच्चों के लिए सुरक्षित स्क्रीन यूज गाइडलाइंस बनाई जाएं.
ऑनलाइन गेमिंग से जुड़ी मौतों के मामले पहले भी अलग-अलग राज्यों से सामने आते रहे हैं, जो यह दिखाते हैं कि यह समस्या किसी एक शहर या उम्र तक सीमित नहीं है.
अगस्त 2025 | इंदौर, मध्यप्रदेश
इंदौर में सातवीं कक्षा के एक छात्र ने ऑनलाइन गेम में 2800 रुपये हारने के बाद अपनी जान गंवा दी. छात्र ने अपनी मां के डेबिट कार्ड को गेमिंग आईडी से लिंक कर रखा था और हारी गई राशि सीधे खाते से कट गई थी. उसे डर था कि परिजनों को इसकी जानकारी मिलने पर उसे डांट पड़ेगी. परिजनों के मुताबिक बच्चा लंबे समय से मोबाइल पर गेम खेलने में जरूरत से ज्यादा समय बिता रहा था.
जून 2025 | राजस्थान
राजस्थान में ऑनलाइन गेमिंग की लत और बढ़ते कर्ज के दबाव में एक युवक ने पत्नी के साथ जीवन समाप्त कर लिया. युवक पर 4 से 5 लाख रुपये का कर्ज हो गया था. उसने इस तनाव की जानकारी घटना से पहले अपनी साली को फोन पर दी थी. परिवार के अनुसार, गेमिंग की वजह से आर्थिक हालात लगातार बिगड़ते जा रहे थे.
फरवरी 2025 | बिजनौर, उत्तर प्रदेश
बिजनौर के एक कारोबारी ने ऑनलाइन गेमिंग में भारी रकम गंवाने के बाद जान दे दी. कारोबारी एक करोड़ रुपये से अधिक की राशि हार चुका था और नुकसान की भरपाई के लिए उसने जमीन तक बेच दी थी. आर्थिक दबाव और लगातार नुकसान उसकी मानसिक स्थिति पर भारी पड़ गया.
जून 2025 | कुशीनगर, उत्तर प्रदेश
कुशीनगर में एक 18 वर्षीय छात्र का मामला सामने आया, जो लंबे समय से ऑनलाइन गेमिंग की लत से जूझ रहा था. परिजनों के मुताबिक उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता था और वह अधिकतर समय मोबाइल पर ही रहता था.

